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Showing posts from February, 2026

नज़र रखिए

अपने जज़्बात पे नज़र रखिये, दिल की हर बात पे नज़र रखिये, अश्क़ बहना तो बे-गुनाही है, सिर्फ़ तादात पे नज़र रखिये, ग़म पसे पर्दा-ए-हिजाब रहें, अपने हालात पे नज़र रखिये, दर्द हद से गुज़रना ठीक नहीं, इसकी इफ़रात पे नज़र रखिये, दिन का ढलना तो तयशुदा ही है, अब तो बस रात पे नज़र रखिये, #उर्मिलामाधव.... 1.3.2015

शामिल नहीं

मैं किसी भी जंग में शामिल नहीं, और किसी भी ख़्वाब पै माइल नहीं, जिसको हसरत है वो रख्खे ताज-ओ-तख़्त, ख़्वाहिशों की मैं कभी काइल नहीं, उर्मिला माधव 

आसान हूं

सब समझते हैं बहुत आसान हूँ, जैसे मैं दिलजोई का सामान हूँ, दिल्लगी करते हैं मुझसे बेसबब, बेरुख़ी का मैं अजब उन्वान हूँ, मेरी जानिब से सभी आज़ाद हैं, मैं तो अपने आप में ज़िंदान हूँ, मेरा अपना आशियाँ आबाद है मैं ही सदियों से बहुत वीरान हूँ, ये समझ कर भूल मत करना कभी, तुर्शी-ए-अहबाब से ...हलकान हूँ, लोग मिलते हैं तो हंस देती हूँ बस, पर किसी हरक़त से कब अनजान हूँ... उर्मिला माधव.. 2.3.2017

बेवफ़ा दोस्त

बे-वफ़ा दोस्त को ...सीने से लगाए रख्खा, उसने भी झूठ को हर दर्जा निभाये रख्खा, उसकी ख़ामोश सी रंजिश को हवा देते रहे, हमने मुस्कान को होठों पै सजाये रख्खा, हम दिखाने में कसर किसलिए रखते बोलो, हमने हर लम्हा उसे दोस्त जताए रख्खा , हमको हर बात की हर बार ख़बर होती रही, हमने हंस-हंसके हर इक राज़ छुपाये रख्खा, उर्मिला माधव... 1.3.2015...

फीकी लगती है

जब उलझन हो दुनिया फीकी लगती है, हमको ये सब ख़ुद पर बीती लगती है, कहते हो तुम अच्छी है तो अच्छी होगी, लेकिन हम को बेहद तीखी लगती है.. उर्मिला माधव

ग़ैरों की छोड़िए

ग़ैर की छोड़िये,अपनों की ज़ुबाँ क्या कहने पैने अलफ़ाज़ हैं,कब दिल से निकल पाते हैं चाहे हम जितना समेंटें ये मगर बिखरेंगे, ख़ाब तो ख़ाब हैं,बस नींद में पल पाते हैं जो भी ग़ैरों पे उठाते हैं सरासर उंगली, ऐसे शैतान कहाँ खुद को बदल पाते हैं ? उर्मिला माधव

साथ इतना देदिया

मुश्किलों ने साथ इतना दे दिया, दिल मेरा तनहा नहीं रहने दिया, वो जो भरता था वफादारी का दम, उसने मुझको सच नहीं कहने दिया, दिल जला तो सब धुंए मे आ गए, आग का दरिया यूँ ही बहने दिया.. #उर्मिलामाधव..

हम भी करके देखते हैं

फिर से हिफ़्ज़े आबरू अब हम भी करके देखते हैं, ख़ुद के ही खूं से वज़ू अब हम भी करके देखते हैं, आदमी का क़द गिरा तो कितना छोटा हो गया, फ़िर से इसको ख़ूबरु अब हम भी करके देखते हैं, सोचते हैं अपने दिल का ढूंढ लें कोई बदल, इक ज़रा सी जुस्तजू अब हम भी करके देखते हैं, लोग कहते हैं यहां पर इश्क़ करना है सवाब, दिल बुरीदह सुर्ख़रू अब हम भी करके देखते हैं, उर्मिला माधव

मैं अश्कबर हूं

मैं अश्कबर हूँ न कोई देखे, यूँ रुख पे चिलमन गिराई हमने, न कोई आहों का दर्द जाने, यूँ बात हँसके छुपाई हमने। हमें मुहब्बत थी आँधियों से, तो कैसे तूफ़ाँ से बच निकलते, कि अपने जज़्बे पै धूल रखके, ये शम्मे महफ़िल सजाई हमने। वो संगदिल थे ये मेरी किस्मत, तो फ़िर ज़माने को क्या बताते, क्यूँ रो रहे हैं यूँ दिल ही दिल में, ये बात सबसे छुपाई हमने ।।......उर्मिला माधव.. 28.2.2013

आज ये ज़ाहिर हुआ है

आज ये ज़ाहिर हुआ है यक-ब-यक, साथ भी देगी नहीं जब सांस तक , राब्ते अब तक रहे जो राह से, क्या चलेंगे आख़री एहसास तक ??   कोई भी यकता नहीं इस खेल में, हो गए ख़ामोश ख़ासम ख़ास तक..... उर्मिला माधव... 28.2.2014. यकता---अद्वितीय  राबता---सम्बन्ध

संवरते रहे

चाह मिलने की लेकर संवरते रहे, सीढियां घर की चढ़ते-उतरते रहे , उनकी गलियों का नक्शा लिए हाथ में, कुछ लकीरों से कागज़ को भरते रहे.. क्यूंकि हिम्मत हमारी दगा दे गयी, दिल ही दिल में अकेले बिखरते रहे, उर्मिला माधव... 28.2.2014..

तबीयत हट गई सबसे

तबीअत हट गयी सबसे, नहीं दिलचस्पियाँ बाक़ी बहुत समझीं, मगर फिर भी रहीं बारीक़ियां बाक़ी कभी किरदार मुश्किल था, कभी दिल पढ़ नहीं पाये ब-ज़ाहिर रौशनी हर सू, मगर तारीकियाँ बाक़ी हज़ारों किस्म के जल्वे, नुमायाँ रू ब रू हर पल मगर रब की निज़ामत में रहीं, वीरानियाँ बाक़ी मक़ाम ए ज़िन्दगी आसाँ नहीं, इतना भी सुन लीजे हज़ारों मर गए फिर भी रहीं क़ुर्बानियाँ बाक़ी जमा खर्चे ज़बानी देख के इंसाँ की फ़ितरत के लगा हमको अभी तक हैं बहुत तरतीबियां बाक़ी ... * उर्मिला माधव

ख़्वाब तो हो

सबसे पहले दिल में कोई ख़ाब तो हो,   उसके भी पाने को दिल बेताब तो हो, अव्वल तो ये दुनियां मुश्किल लगती है, और ज़ुबाँ पर अपनी फिर आदाब तो हो, पिछली बातें इतनी चुभती रहती हैं, उनको गारत करने को सैलाब तो हो, देखके जिसको सर सजदे में झुक जाए, इस दुनियां में ऐसा कुछ नायाब तो हो, चाल ख़ता हो जाए, फिर हम उठ जाएं, जिस्म हमारा इतना सेहत् याब तो हो.. उर्मिला माधव

नज़्म

आपकी दुनिया कली में फूल में सिमटी हुई है, हम तुम्हारी ज़िंदगी की राह से बिल्कुल अलग हैं, लफ़्ज़ तो ये एक ही है तुम मुहब्बत कह रहे हो, हम मगर इसको इबादत सोच कर ही चल रहे हैं, इसलिए सब ख़ाब अपने तिश्नगी में ढल रहे हैं, हम अदाओं की अदा से दूर कब के हो चुके हैं, दिल की उरियानी का हमको शौक़ ही बाक़ी नहीं, जो भी इसको जिस तरह चाहे समझ ले मान ले .. उर्मिला माधव 

तशरीफ़ जब भी लाएंगे

मेरे घर तशरीफ़ जब भी लायेंगे, ग़म दरीचों पै रखे मिल जायेंगे, क्या ही इस्तक़बाल होगा आपका,  जब दर-ओ-दीवार भी गिर जायेंगे, और कहीं मलबे के नीचे ढेर में, कुछ निशाँ नाचीज़ के मिल जायेंगे, #उर्मिला माधव... 27.2.2015...

फ़क़त रेशम सी गांठें थीं

फ़क़त रेशम सी गांठें थीं...ज़रा सी खोल ली जातीं,  जो बातें दिल को चुभती थीं,जुबां से बोल लीं जातीं, अगरचे खौफ़ इतना था...कोई दिल पर न लेजाये,  कहीं कहने से पहले एहतियातन...तोल ली जातीं, मुहब्बत को सलीके से....निभाना ही नहीं था तब,  ज़रुरत क्या थी ऐसी मुश्किलें खुद मोल ली जातीं, फरेब-ओ-मख्र में,फंसना,फंसाना शौक था जिनका,  दरीचे झाँकने को तब.........ज़मीनें गोल ली जातीं, किसीका क़त्ल करने को...हुनर की क्या ज़रुरत थी,  कि बस हाथों की तलवारें....ज़हर में घोल ली जातीं... #उर्मिला माधव... 27.2.2015...

जबरन पैदा हो गए

सभी कन्याओं को समर्पित.... जबरन पैदा होगये वरना हमको लोग भगा देते, अगर ज़रा भी बस में होता जिंदा ही दफ़ना देते, क़िस्मत के आगे दुनिया का जोर न चल पाया वर्ना, लोगों के जो बस में होता,वहीँ कहीं सुलटा देते.... #उर्मिला माधव... 27.2.1015

ढूंढिए इस शहर में

ढूंढिए इस शह्र में अब रूह-ए-बिस्मिल कौन है  और ज़रा बतलाइये किसके मुक़ाबिल कौन है मैंने मीज़ानों से पूछा,ताक़ पर रख कर ज़मीर अपनी इन बर्बादियों में और शामिल कौन है खुद हवाले करके जिसने,कश्तियाँ तूफ़ान में बादबां से जाके पूछा मेरा साहिल कौन है, ये नसीमे ख़ारो ख़स किसने जलाया आग में आबशारों ने ये सोचा ,इतना जाहिल कौन है, बर्फ़ का सीना पिघल कर एक दरिया हो गया, कौन ठहरा था यहाँ पर,इतना माइल कौन है, Urmila Madhav.... 27.2.2016

अपनी कोई बिसात थी ही नहीं

अपनी कोई बिसात थी ही नहीं, बस तो फ़िक़्र-ए-हयात थी ही नहीं, अब मुहब्बत भी कोई क्या करता, मुझमें तो ख़ास बात थी ही नहीं, ये तो किस्मत की ख़ास ख़ूबी है, इसमें कोइ चाँद रात थी ही नहीं, सबसे कमतर थी,साफ ज़ाहिर है, शब् थी,शब-ए-बरात थी ही नहीं, चूँकि कुछ हैसियत से ऊपर थे, यूँ भी हक़ में ज़कात थी ही नहीं, उर्मिला माधव, 28.2.2017

बड़े अदब से मुझे

बड़े अदब से मुझे ये बता रहा है कोई, अभी न जाओ अभी मिलने आ रहा है कोई, मुझे सुपुर्द-ए- ज़मीं, देर से किया जाए, के वक़्ती तौर का रिश्ता जता रहा है कोई, अजब चलन है ज़माने का इक ज़माने से, मरे हुए की लहद क्यूँ सजा रहा है कोई, मुझे ख़बर है मिरा और क्या-क्या होना है, के जिस्म-ओ-जान का किस्सा मिटा रहा है कोई, इसी जहान में मुझसे है कोई वाबस्ता, लो मेरी मौत का क़र्ज़ा चुका रहा है कोई, मैं अब तो ख़ाक हूँ नज़रों में इस ज़माने की, अजब जुनून है के अब भी आ रहा है कोई.. उर्मिला माधव

मेरी आदत से अनजान

मेरी आदत से अनजान, यार बुरा माने तो मान, अच्छा बुरा,समझना सीख, वरना तेरी तू ही जान, कच्ची गोली खेला है क्या? हुई नहीं अब तक पहचान? तुझको अक़्ल नहीं जो अपनी, आ हम से लेले नादान, कौन सफ़ाई दे ऑ क्योंकर? बड़का बनता है भगवान... उर्मिला माधव

बेसबब उलझे रहे

बेसबब उलझे रहे एक ख्वाब मेँ हम रात भर किस जहाँ मेँ खो गए समझे नहीं हम रातभर दम-ब-दम हम जा रहे थे जानिब-ए-मन्जिल मगर जाने वो क्या राह थी चलते रहे हम रात भर कोई सहलाता रहा सर गोद मेँ रख कर मेरा और उसी अन्दाज़ मेँ सोते रहे हम रात भर प्यार का वो गीत कोई रात भर गाता रहा और उस आवाज़ को सुनते रहे हम रात भर।।                                       उर्मिला माधव

मुरली वाले राधा के हैं

एक मतला तीन शेर--- ============ मुरली वाले राधा के हैं, ये बतलाओ हम किसके हैं?? :( खुशियाँ लेकर नाच रहे सब, दुनियाँ भरके गम किसके हैं?? :( करें मुहब्बत सर पर रखलें  इतने हसीं सनम किसके हैं?? :( आला ख़ुद को कहे सितमगर, दिल पर हुए सितम किसके हैं?? :( उर्मिला माधव... 26.2.2014...

ये हकीक़त है आलिम नहीं हूँ मगर,

तीन शेर---- ये हकीक़त है आलिम नहीं हूँ मगर, बढ़ के पीछे हटूं........ये ज़रूरी नहीं, आप अपनी कहें,और मैं अपनी कहूं, ज़ावियों से कटूं.........ये ज़रूरी नहीं, हो ये मुमकिन कि सानी नहो आपका!! फिर भी मैं जा सटूं......ये ज़रूरी नहीं, उर्मिला माधव... 26.2.2014...

पांव मेरे हैं ज़मीं पर

एक मतला एक शेर पाँव मेरे हैं ज़मीं पर,आसमां पर है नज़र, पीठ दुनिया की तरफ है,पर नहीं हूँ बे-ख़बर, है इरादों में बुलंदी और चमक,आँखों में है, किस तरह होगी भला परवाज़ मेरी मुख़्तसर, उर्मिला माधव  26.2.2015..

ख़ातून दिल्ली की

दिल्ली की औरत------ एक नज़्म हालत-ए-हाज़िरा पर... लो मेरी दास्तां सुन लो मैं हूँ ख़ातून दिल्ली की, हिली जाती है अब बुनियाद,अफ़लातून दिल्ली की, नहीं महफूज़ अस्मत है,के दिल में ख़ास दहशत है, क़दम बाहर निकालूँ जो तो बस अंजाम वहशत है, समझ में कुछ नहीं आता के किस दर्ज़ा जिया जाए, सम्हाले ग़म कोई कितने,ज़ह्र कितना पिया जाये, ये दिल्ली आज तक लाशों के अंबारों पे रख्खी है, अभी तक आबरू औरत की मीनारों पे रख्खी है, न जाने क्या दिया अजदाद ने,दिल्ली को विरसे में, मेरा दिल चाहता है काश इसको समझूँ फिर से मैं, जहाँ औरत की अव्वल ज़ात को सस्ता समझते हैं, करे दिलजोई मर्दों की,यही रस्ता समझते हैं, मगर मुझमें भी है सीता,कोई रज़िया कोई राधा, बिना मेरी मुहब्बत के वजूद-ए-मर्द है आधा, मैं शीरीं हूँ,मैं लैला हूँ,में दुर्गा हूँ,मैं अम्बा हूँ, अगर सच जानना चाहो तो मैं चिड़ियों का चम्बा हूँ, मगर जब याद आता है के मैं औरत हूँ दिल्ली की, बहुत ख़तरे में रहती हूँ,के मैं ग़ैरत हूँ दिल्ली की, के मैं औरत हूँ दिल्ली की।।। के मैं औरत हूँ दिल्ली की।।। उर्मिला माधव... 26.2.2016

प्यार का जाम पियो

प्यार का जाम पियो,गर वो पिला दे कोई, इतना एहसास रहे ग़म न बढ़ा दे कोई... ख़ुद पस-ए-पर्दा रहो, धूल बहुत उड़ती है, अपनी ठोकर से कहीं ख़ाक उड़ा दे कोई, सांस तरतीब से आ जाये के इतना तो रहे, दर्द क्या कम है के कुछ और हवा दे कोई, उर्मिला माधव..

याद अब भी आता है

तू मुझे याद अब भी आता है, रोज़ ख्वाबों में मुस्कुराता है, दिल मगर टूट जो गया है अब, लाख चाहूँ न गुनगुनाता है, बीते लम्हों की याद आते ही, हौसला रोज़ डगमगाता है, तेरी आमद से ये हुआ आख़िर, कुछ अँधेरा भी जगमगाता है, की है हर दायरे की पैमाइश, ज़ाविया देख लडखडाता है, मैं हिफाज़त के साथ सोती हूँ, ख़्वाब में कौन बडबडाता है, मैं मगर रोज़ उठके चलती हूँ, दर मेरा कौन खटखटाता है.... उर्मिला माधव.... 25.2.2016

हरगिज़ सिला नहीं है

ऐसे नहीं है हरगिज ये दिल हिला नहीं है  तेरी पुकार सुन कर ये दिल हिला नहीं है  देखा नहीं ख़ुदा ने मुझको कभी तड़पते, वो जो मेरी ज़िंदगी है मुझसे मिला नहीं है, वो छीनता रहा है मुझसे हज़ार नेमत, सब कुछ किया गवारा, उससे गिला नहीं है.. ये दिल भरा हुआ है तकलीफ़ की रिदा से, रातों के जागने का ये तो सिला नहीं है, खामोश तो हैं लेकिन तुझमें ही मुब्तिला हैं  ये बात बस दिगर है कोई सिलसिला नहीं है  उर्मिला माधव 

दो मिनट की ये ग़ज़ल

दो मिनट की ये ग़ज़ल है क्या बताएं, आप सब बढ़िया कहें, हम मुस्कुराएँ, जो भी है जैसा भी है कुछ तो लिखा है, कुछ नहीं लिख्खें तो कैसे दिल लगाएं? गम लिखें,खुशियाँ लिखें कुछ भी लिखेँ पर, बात अपनी जब लिखेँ, सब को पढायेँ । आप सब भी दोस्त हैं तो सोचना क्या, अपने ग़म में आपकी हों संग दुआयें, ख़ास अपनी दास्ताँ कुछ है नहीं बस, इसलिए हम सोचते हैं क्या छुपायें..... उर्मिला माधव.... 10.9.2014..

छाले देखना

जब कभी पिछले रिसाले देखना, हंसने वालों के भी छाले देखना, मुस्कुराहट पर फ़क़त जाना नहीं, हो सके तो आह-ओ-नाले देखना, महफ़िलों औ-क़ह्क़हों के शोर में, आंसुओं वाले......निवाले देखना, कुछ फ़सीलें तो झड़ी होंगी मगर, रंग पर्दों के निराले.........देखना, बिन चरागों के वहीँ मिल जायेंगे, जाके उनके घर के आले देखना.... उर्मिला माधव.... 19.9.2014

परवाह बोलो

मैं किसीकी क्यूँ करूँ परवाह, बोलो, एक तरफ़ा कब निभी है चाह, बोलो, जानिब-ए-मंजिल मुझे जाना ही होगा, ज़िन्दगी भर क्यूँ तकूँ अब राह, बोलो, ज़िन्दगी को दर्द-ए-गम का वास्ता दूँ ? क्या वो आइन्दा न देगी आह, बोलो, जो मिले सौगात दे बस आंसुओं की, ये कहो कब तक करूं मैं वाह, बोलो, ज़िन्दगी मेरी में रख्खूँ या न रख्खूँ इसके मिटने पै भी लूँ इस्लाह बोलो? उर्मिला माधव... 29.9.2014..

ज़िंदगी का फ़लसफ़ा

ज़िन्दगी का फ़लसफ़ा बिलकुल जुदा रख्खा गया, आदमी का आदमी से सिलसिला रख्खा गया, ज़ीस्त में कुछ इस तरह रंगीनियाँ रख्खी गईं, जिसमें इंसानों को हरदम मुब्तिला रख्खा गया, बुत बनाया पथ्थरों से और फिर दैर-ओ-हरम, सर-ब-सजदा होने को नाम-ए-खुदा रख्खा गया, फिर अदालत भी बनी सब पर हुकूमत के लिए, पंडितों मुल्लाओं को तब नाखुदा रख्खा गया, ज़िन्दगी और मौत के जलवों से है ये क़ायनात, इन्तेहा का नाम तब फिर इब्तेदा रख्खा गया.... उर्मिला माधव... 1.10.2014...

तिरछी नज़र

तिरछी नज़र की धार पे क़ुर्बान हो गए, यूँ दिल की खुदकुशी पे पशेमान हो गए, अपने मिजाज़ में तो कभी आशिक़ी न थी,  पर ऐसा कुछ हुआ के परेशान हो गए, अंदाज़ अपनी रूह के बस ज्यों के त्यों रहे क्यूं हम जूनून-ए-इश्क़ का सामान हो गए, वो याद हमको आये तो मुश्किल गुज़र गई  हम ख़ुद भी अपने आप से बईमान हो गए फिर यूँ हुआ के रूह से हमने लड़ाई की, हम ख़ुद भी अपने आप पे हैरान हो गए, एक रोज़ उनके घर गए,मेहमान हो गए.. दुनियां को दरकिनार भी हमने किया बहुत ज़िंदान-ए-इश्क़ क्या हुए सुल्तान हो गए

अब तज़ब्ज़ुब से दम निकलता है

अब तज़बज़ुब से दम निकलता है, ज़ेहन-ओ-दिल तिश्नगी से जलता है, मेरे ख़ैमे में इतने सूरज हैं, इनकी गर्मी से ग़म पिघलता है, सब बुझाती हूँ अपने हाथों से, रेज़ा-रेज़ा हो जिस्म गलता है, इतना आसान कब है दह्र-ए-सहन, नक़्श-ए-पा रोज़ ही बदलता है, सब लिबासों में छुपके रहते हैं, ऐसा किरदार मुझको खलता है, क्या तमाशा है कुल ज़माना भी, हर कोई उफ़,अदा से चलता है चश्म-ए-पुरनम भी खूँ बहाया करे, वक़्त पर, वक़्त ही पै ढलता है.... उर्मिला माधव... 28.5.2017..... तज़बज़ुब--- असमंजस

थकते क़दम

जाने कितनी दूरियां हैं,और मेरे थकते क़दम, राह की दुश्वारियों मैं.....आसरा तकते क़दम, राह मैं कोई रहनुमां होता तो कट जाता सफ़र, और ये भी था ज़रूरी.....देख कर रखते क़दम, है अगर इमकान तो....मजबूरियाँ होतीं सहल, वरना ख़ाली हसरतों से..चल नहीं सकते क़दम,   मुश्किलों से हटके चलने का हुनर आता अगर,  क्यूँ धतूरों के ज़हर को..बे-वजह चखते क़दम, ज़िन्दगी राह-ए-अज़ल का क़र्ज़ है...ऐ दोस्तों, ये वो रस्ता है जहाँ......पीछे नहीं हटते क़दम, उर्मिला माधव... 8.10.2013.. इमकान---सम्भावना ..

मिर्ज़ा ग़ालिब की ज़मीन पर

आली जनाब मिर्ज़ा ग़ालिब साहब की ज़मीनपर कही गई फिल्बदीह की एक ग़ज़ल... kis-se kya-kya kaha kare koii yun hi kab tak jalaa kare koii, zindagi bhar kii ye musiibat hai, gam se kab tak maraa kare koi, kab kahan pe ye saans ruk jaaye  itna kab tak daraa kare koii, gar ye himmat jawaab de jaaye, aisii haalat main kya kare koii, apni jaanib se bas nibaah rahe, chaahe jitnaa dagaa kare koii , waqt bhii waqt par badalna hai, sabr kuchh to zaraa kare koii, aashiqii ishq ek fajiihat hai, khud ko kyun mubtila kare koii, #उर्मिलामाधव 10.10.2015

दर हक़ीक़त

दर हकीक़त वक़्त भी पाबंदियों के साथ है, दिन हुआ दिन में हमेशा,रात में ही रात है, उर्मिला माधव... 22.2.2014...

कितने मुखौटे

कितने मुखौटे लेके जीते हैं, ज़ख्म सींते है, अश्क़ पीते हैं, खूब हँसते हैं, मन में रीते हैं, कैसी-कैसी, दुहाई देते हैं, हर तरह ढूंढते, सुभीते हैं, सांस रूकती है, फिर भी जीते हैं, तुम भी जीते हो, हम भी जीते हैं, बात इतनी है, बस फजीते हैं... उर्मिला माधव... 22.2.2014...

वाह वाह करते रहे

लोग सब वाह-वाह करते रहे, हम हज़ारों गुनाह करते रहे, जैसे भी हो सका जहां भर में, इक मुहब्बत की चाह करते रहे, रोने वालों को सबने रोने दिया, अपने जीने की राह करते रहे, रोने-धोने से क्या गुज़र होती, ज़िन्दगी ख़्वाब गाह करते रहे, सच्ची खुशियां कहाँ मयस्सर थीं, सिर्फ़ ग़म से निबाह करते रहे,   अपनी दुनियां बुलंद करने को, ख़ुद से ख़ुद ही सलाह करते रहे, तेरी दुनियां के सारे तुर्रम खां, देख कर,आह-आह करते रहे, उर्मिला माधव... 7.10.2015

जगाए गए

रात हम नींद से जगाये गए, बा-जबर होश में भी लाये गए, हम जहाँ थे वहां पे थे ही नहीं, ख़ाब में खोये से बताये गए, अपनी दुनियां में लौट आये हम, उनकी यादों से जब हटाये गए, उर्मिला माधव

घर जाते हैं

हम जो बारिश में कभी भीग के घर जाते हैं, यक़ता आँखों की चमक देख के डर जाते हैं, आईना देखें नहीं,इतनी क़सम दी खुद को,  लाख़ बचते हैं मगर फिर भी उधर जाते हैं,  हमने लोगों से कभी कोई भी शिकवा न किया, अपनी आहट से मगर, लोग बिखर जाते हैं, हमको अंदाज़ा मगर इसका कभी हो न सका, किसकी चाहत के कहीं ख़्वाब से मर जाते हैं, ग़म की रफ़्तार तो ठहरेगी नहीं, ज़ाहिर है, चलते-चलते ही कहीं, हम ही ठहर जाते हैं.... उर्मिला माधव....

मिट्टी का एक बर्तन

मिट्टी का एक बर्तन बाज़ार से लेआओ, और उसके चन्द टुकड़े तुम राख में दबाओ और रेशमी क़फ़न से एक लाश को सजाओ, सन्दल,अग़र की ख़ुशबू,लोबान भी जलाओ, ग़र हो सके जो मुमकिन तो हार भी चढ़ाओ, तह में दबा लहद के कुछ वक़्त भूल जाओ, शाम-ओ-सहर पहुँच कर तुम मर्सिया भी गाओ, रस्मो रिवाज़ सारे उस लाश के निभाओ, एक रोज़ तह उलट कर देखो ज़रा लहद को, जो एक भी मिले तो लेकर शिनाख़्त आओ, उस लाश-ए-बे क़फन का कुछ तो निशान लाओ, मर्ग-ए-बशर की हालत तफ़सील से बताओ, झूठी बयानबाज़ी कुछ काम न करेगी, इन्सान की हक़ीक़त इन्सान को सुनाओ, अब बर्तनों के टुकड़े भी खोद कर लेआओ, क्या ख़ाक़ होगए हैं,बर्तन के चन्द टुकड़े बर्तन की हैसियत से इन्सान को मिलाओ, ये तल्ख़िए हक़ीक़त हर शख़्स को दिखाओ।....उर्मिला माधव. 0.2.2013.

जब हुस्न का आलम था

जब हुस्न का आलम था,ज़ुल्फ़ों में पेच-ओ-ख़म था, दिल कूचा-ए- जानम था,सर पे न कोई ग़म था, क़दमों तले जहाँ था,बाँहों में आसमां था, परवाज़ बे-अलम थी,मेरे साथ एक सनम था, क्या दास्ताँ सुनाऊँ,आँधी सी एक आई, सब लेगई उड़ाके,तक़दीर का क़रम था, जब होश हमको आया,दुनियां बदल गई थी, सब लेगया बहाके मेरे साथ जो सनम था ।।  #उर्मिला माधव.. 20.2.2015

किससे कितनी कहां निभानी है

किससे,कितनी,कहाँ निभानी है, फ़िक़्र क्या,ज़ीस्त आनी-जानी है, ये तो रिश्ते हैं, .....ग़म गुसारी के, इसमें दुनियां .....कहाँ सुहानी है? तुम समझते हो हम ही नादाँ है? दिल ....तजुर्बों की राजधानी है जितनी निभनी थी निभ गई हमसे, अब ये ........गुज़री हुई कहानी है, ज़िन्दगी हमसे सिर्फ़ वाबस्ता, ये समझना भी बे मआनी है... उर्मिला माधव।।।

अगर दूरी मुआफ़िक़ है

अगर दूरी मुआफ़िक है तो दूरी बरमला करदे, भला फिर रंज-ओ-ग़म कैसा सभी कुछ बेमज़ा करदे, दर-ओ-दीवार की सीलन,वहीँ कुछ झांकती शाखें, सही क्या है इमारत पर ज़रा कुछ तब्सरा करदे, उर्मिला माधव.. 20.2.2017

आईना हूं देख लो

ख़ुद ही सूरत,ख़ुद-ब-ख़ुद ही आईना हूँ देख लो, ख़ुद रुबाई खुद-ब-ख़ुद हम्द-ओ-सना हूँ देख लो, पाक़-ओ-ताहिर दिल ये मेरा ग़ैर का तालिब नहीं, ख़ुद मुहब्बत ख़ुद-ब-ख़ुद ही आशना हूँ देख लो, ख़ुद-ब-खुद दीवानगी हूँ,होश भी हूँ,ख़ुद-ब-खुद ख़ुद तग़ाफ़ुल ख़ुद-ब-ख़ुद ही मैं अना हूँ देख लो, उड़ नहीं सकता है मेरे ख़ूबरू हाथों का रंग, ख़ुद ही रंगत,ख़ुद-ब-ख़ुद ही मैं हिना हूँ देख लो, मुश्किलें भी ख़ुद ही आकर मुझ में पिन्हाँ हो गईं, ख़ुद हिफाज़त ख़ुद-ब-ख़ुद ही मैं फ़ना हूँ देख लो, उर्मिला माधव...

अच्छा नहीं है बार बार

अपने दिल को तोडना अच्छा नहीं है बारबार, दर्द की जद में हो चाहे...फैसला हो एक बार, :: हर अना को तोड़ कर इमकान मत कीजे जनाब, हर कोई है मस्त ख़ुद में,कौन किसका ग़मगुसार, :: ज़हमतें क्यों मोल लेना,चाहे-अनचाहे हुज़ूर, मुब्तिला गैरों में रहना,किसलिए दीवानावार? :: दह्र से उम्मीद रखना .......हैं महज़ नादानियां, और अब क्या चाहिए,जब ओढ़नी है तार-तार, :: क्या किसीके दर पै जाना अपने ग़म के वास्ते, खुद ही मुंसिफ़,ख़ुद अदालत,हो रहो ख़ुद पैरोकार... उर्मिला माधव

आई गई

उसकी गलियों की बात आई-गई, खाक़ इस दिल की फिर उड़ाई गई.. कितनी शर्मिंदगी से गुज़रा किये, उसकी तसवीर साथ पाई गई, इक अजब शक़्ल से मुखातिब थे, आईना दे के जो दिखाई गई, मैं हूँ क़िरदार उस कहानी का, जो के अंजाम तक न लाई गई, मेरी आखों में तिरे अंदाज़ को देख, कैसे-कैसों की पारसाई गई, उर्मिला माधव

फ़क़त रेशम सी गांठें थीं

फ़क़त रेशम सी गांठें थीं...ज़रा सी खोल ली जातीं, जो बातें दिल को चुभती थीं,जुबां से बोल लीं जातीं, अगरचे खौफ़ इतना था...कोई दिल पर न लेजाये, कहीं कहने से पहले एहतियातन...तोल ली जातीं, मुहब्बत को सलीके से....निभाना ही नहीं था तब, ज़रुरत क्या थी ऐसी मुश्किलें खुद मोल ली जातीं, फरेब-ओ-मख्र में,फंसना,फंसाना शौक था जिनका, दरीचे झाँकने को तब.........ज़मीनें गोल ली जातीं, किसीका क़त्ल करने को...हुनर की क्या ज़रुरत थी, कि बस हाथों की तलवारें....ज़हर में घोल ली जातीं...  उर्मिला माधव

बतानी है यारो

यही बात दिल को बतानी है यारो, बहुत बे-वफ़ा जिंदगानी है यारो, ये सांसों की रफ़्तार का आना-जाना, फ़क़त वक़्त की खींचातानी है यारो, हों हालात कुछ भी नहीं फ़र्क इससे, के लहज़ा-ब-लहज़ा निभानी है यारो, मुहब्बत से हो रु-ब-रु सब ज़माना, यूँ ही लमहा-लम्हा बितानी है यारो, जिसे हम समझते हैं जागीर अपनी, यहीं सब पड़ी छोड़ जानी है यारो, हों खामोश आहें या,पुर सोज़ ऑंखें,  न ग़ैरों को हरगिज़ दिखानी है यारो, अगर बंद हो जाएँ,मिज़्गाँ -ए-इंसां, तो शम भर में बीती कहानी है यारो... समझता है जिसको मुक़म्मल ज़माना, वो बस चार दिन की जवानी है यारो... उर्मिला माधव

अब ताज़ीराते हिंद की तस्वीर देखिए

अब ताज़ीरात-ए-हिन्द की तस्वीर देखिये, हर ज़ाविये से मिट रही तक़दीर देखिये, कुछ ठीकरों में बेचता इंसान अपने ख्वाब, चलती कहाँ है कोई भी तदबीर देखिये, उफ़ गर्द में निहां है यहाँ आदमी की ज़ात, हर पाँव अब हुआ है यूँ ज़ंजीर देखिये, रहजन हों सलातीन तो बुनियाद भी है खाक़, लुटती हुई वतन की ये जागीर देखिये, औक़ात अब बशर की कहाँ कोई है जनाब, कुछ शोहदों के हाथ में शमशीर देखिये, उर्मिला माधव... जाविया--- कोण निहां--छुपा हुआ सलातीन--- सुल्तान का बहुवचन बशर---इन्सान शमशीर---तलवार

किया करते हैं हम

तनहाई में बात किया करते हैं हम, बस यादों के साथ जिया करते हैं हम, इतनी भीड़ जमा रहती है किस्सों की, इनको ही दिन रात दिया करते हैं हम, यहां किसीकी कोई ज़रूरत है ही कब, प्यार सनम का याद किया करते हैं हम, सहरा में भी दरया का अहसास रहे, अश्कों की बरसात पिया करते हैं हम, महफ़िल की शिरक़त भी भारी लगती है, ख़ल्वत को ख़िदमात दिया करते हैं हम, उर्मिला माधव 20.2.2020

डर जाओगे तुम

कभी हम न होंगे तो डर जाओगे तुम, नहीं जो किया है वो कर जाओगे तुम, हमें तुम सताते हो हर बार छुप कर, अगर हम न आएं, बिखर जाओगे तुम, रवैया तुम अपना बदलने लगे हो, अगर हम बदल लें किधर जाओगे तुम, तबीयत हमारी है नासाज़ हर पल, सभी हम से कहते हैं मर जाओगे तुम, मगर ये भी सच है कि मर ही गए हम  तो फिर उम्र भर ना संवर पाओगे तुम उर्मिला माधव 

वो परिंदा घर गया

वो परिंदा घर गया जो गाह तेरी देखता था, उसका जज़्बा मर गया जो आह तेरी देखता था, तेरी आँखें, तेरा चेहरा, तेरी ज़ुल्फ़ें ख़ूब रू, वो मुसाफ़िर मर गया जो राह तेरी देखता था, उर्मिला माधव

तेरी याद अभी तक

क्यूँ मुझको सताती है,तेरी याद अभी तक, आँखों को रुलाती है ,कोई बात अभी तक, हर रात के हिस्से में,तेरा नाम लिखा है, वीरान सी आँखों मे हैं,जज़्बात अभी तक, एक दर्द उभरता है,करवट भी बदलने से, बिस्तर का सिरहाना है,तेरी बाँह अभी तक, आजाओ दिल ये मेरा,पुरज़ोर धड़कता है, ये चीख़ के भरता है,बहुत आह अभी तक, दुश्वार हुआ जीना,मुझे याद तुम न आओ, मैं मुब्तिला ए ग़म हूँ,न हूँ शाद अभी तक।। .......उर्मिला माधव.. 18.2.2013

दर्प से अकड़े हुए चेहरे

दर्प से अकड़े हुए चेहरे, थक तो जाते होंगे, लगता है भय पास जाने से, अकड़ सकती है और,अकड़ी हुई गर्दन, उचित कुछ दूरियां,सद्भावना वश, जी रहे अहम् में,कुछ बहम में, घाव भीतर सीं रहे,चुप्पियों के, मिलन से अधिक,जीवन को प्राथमिकता, गर्दन टूट सकती है अधिक अकड़ने से, और फिर मृत्यु !! नहीं-नहीं दूरी उचित है, ऐसे व्यक्तित्व, दया और क्षमा के पात्र ही तो हैं, जाओ क्षमा करते हैं, तुम्हारे जीवन की रक्षा आवश्यक है... क्षमा-क्षमा-क्षमा... गर्दन सीधी करलो ..... #उर्मिलामाधव...

अच्छा नहीं है बार बार

अपने दिल को तोडना अच्छा नहीं है बारबार, दर्द की ज़द में हो चाहे फ़ैसला हो एक बार, :: हर अना को तोड़ कर इमकान मत कीजे जनाब, हर कोई है मस्त ख़ुद में,कौन किसका ग़मगुसार, :: ज़हमतें क्यों मोल लेना,चाहे-अनचाहे हुज़ूर, मुब्तिला गैरों में रहना,किसलिए दीवानावार? :: दह्र से उम्मीद रखना हैं महज़ नादानियां, और अब क्या चाहिए,जब ओढ़नी है तार-तार, :: क्या किसीके दर पै जाना अपने ग़म के वास्ते, खुद ही मुंसिफ़,ख़ुद अदालत,हो रहो ख़ुद पैरोकार... उर्मिला माधव।

पीर भरा निश्वास है प्रियवर

पीर भरा निश्वास है प्रियवर, गर्व भरा हुंकार नहीं है, मौन हमारा परिलक्षित है,अपितु कोई आकार नहीं है  मन में युद्ध बहुत सारे हैं शांत चित्त रहते हैं फिर भी कोलाहल हम कर सकते थे, किंतु ये शिष्टाचार नहीं है, आप रहें स्वछंद सदा ही, जिससे हो व्यवहार आपका घर संसार आपका प्रियवर अपना ये अधिकार नहीं है.. उर्मिला माधव

सख़्त है फ़ैसला हमारा भी

सख़्त है फ़ैसला हमारा भी, अब न देखेंगे हम इशारा भी. जो भी दो नाव साथ चुनता है, उसको मिलता नहीं कनारा भी. वो समझते हैं हम ही नादाँ हैं, जब छुपाते हैं वो नज़ारा भी. हमको वो रोज़ सुनना पड़ता है, जो न करते हैं हम गवारा भी.. अपनी जानिब से अब विदाई है, उनको सहना है  ये ख़सारा भी. उर्मिला माधव

ज़िंदगी में नहीं हो

अभी तक तो इस ज़िंदगी में नहीं हो, हज़ारों बरस से जहां हो, वहीं हो, कहां तुमने आकर बताया है हमको, मेरा दिल ही घर है यहां हो, यहीं हो, ये दिल है तुम्हारा कभी आके कह दो, बदन का भी क्या है ये चाहे कहीं हो, कभी हमसे पूछा भी है तुमने आकर? नहीं दिख रही हो, क्या ज़िंदा नहीं हो? उर्मिला माधव 

दामन मेरा

दामन मेरा तार तार भी हो सकता था, मेरे ग़म पर आबशार भी रो सकता था, अच्छा ही है,रब ने मुझे बचाया आख़िर, यही तमाशा बार-बार भी हो सकता था, थोड़े कुछ एहसास बचे हैं अच्छा है, वर्ना ये दिल ऐतबार भी खो सकता था, उर्मिला माधव, 16.2.2015

वो भी शायद रहगुज़र में साथ थे

वो भी शायद रहगुज़र में साथ थे, मैंने उनको पर कभी देखा न था, क्यूँ न देखा उनको मेरी आँख ने, इस क़दर मेरा चलन,ओछा न था, क्यों किसीकी ज़िन्दगी में झांकना, मेरी नज़रों में ये सब अच्छा न था, दूर से पंजों के बल वो देखते थे, हाथ चूंके मुझ तलक,पहुंचा न था, जाने क्या-क्या कह गए,बेसाख़्ता, एक भी तो लफ़्ज़ पर सच्चा न था, मेरे क़द की कर गए फीता कशी, गो के मैंने क़द कभी नापा न था, उर्मिला माधव,

ख़ुद से मैं कितनी बार लड़ती हूं (नज़्म)

ख़ुद से मैं कितनी बार लड़ती हूं, तब कहीं दूर तुमसे होती हूं, तुम मगर क्या बताऊं, कैसे हो, किस क़दर मुश्किलें बढ़ाते हो  कितने अरमान से बुलाते हो  रू ब रू दर्द बनके आते हो, दिल की बुनियाद फिर हिलाते हो, चोट पत्थर पे फिर लगाते हो, मुझको बर्दाश्त फिर नहीं होता  वो जो मासूम जैसा चेहरा है, मेरी आंखों का जिसपे पहरा है, उसको फिर देखने को आती हूं तुमको फिर हर तरह मनाती हूं अबसे आगे उदास मत होना.. उर्मिला माधव

तुमने दीवानगी नहीं देखी

तुमने दीवानगी नहीं देखी, इश्क़ की बानगी नहीं देखी, तुमको देखूं तो सांस रुकती है  और न देखूं तो दम निकलता है, जब मैं मर जाऊं तब चले आना  अपने सीने में दफ़्न कर देना.. फिर न कोई दूसरा समाएगा... उर्मिला माधव

गुज़ारी है

हमने रोते हुए ग़ुज़ारी है, वो ही रफ़्तार अब भी जारी है, हमपे रह-रहके वार होते हैं, कैसी दुनियाँ की ग़मगुसारी है, दोस्तों से ज़ियादा दुश्मन हैं, सिर्फ़ तनहाई ही हमारी है?..... उर्मिला माधव..

फ़ैसले होते नहीं हैं

फ़ैसले होते नहीं हैं, सिर्फ़ सूरत देख कर, दिल न जोड़ा जाए हरगिज़, ऐश ओ इशरत देख कर, बुत है, आदमक़द सही, तो पूजना क्यों कर उसे, कुछ न सोचा झुक गया बस अपनी चाहत देख कर, ग़ैर से वाबस्ता रहके, कौन रह पाया है ख़ुश, जो हमेशा ही मिला हो, ज़ाती हसरत देख कर, मुस्कुरा के आ गया तो दिल ही रौशन हो गया, हम पिघल के रह गए इक ख़ास क़सरत देख कर, दिल कुशादा था हमारा, उसके जी की क्या ख़बर, सब समझने लग गए हम उसकी फ़ितरत देख कर, उर्मिला माधवफ़ैसले होते नहीं हैं, सिर्फ़ सूरत देख कर, दिल न जोड़ा जाए हरगिज़, ऐश ओ इशरत देख कर, बुत है, आदमक़द सही, तो पूजना क्यों कर उसे, कुछ न सोचा झुक गया बस अपनी चाहत देख कर, ग़ैर से वाबस्ता रहके, कौन रह पाया है ख़ुश, जो हमेशा ही मिला हो, ज़ाती हसरत देख कर, मुस्कुरा के आ गया तो दिल ही रौशन हो गया, हम पिघल के रह गए इक ख़ास क़सरत देख कर, दिल कुशादा था हमारा, उसके जी की क्या ख़बर, सब समझने लग गए हम उसकी फ़ितरत देख कर, उर्मिला माधव

राबितों के मानी

राबितों के उसने जो मानी हमें समझा दिए, दिल के टुकड़े करके हमने क़ब्र में दफ़ना दिए, नाख़ुदा उसको कहा ऑ हो गए हम ख़ुद हक़ीर, हमने अपनी सोहबत के हौसले दिखला दिए, क्या कमी थी बंदगी में ये बता बंदानवाज़, तूने जो इलज़ाम के तोहफ़े हमें पकड़ा दिए तंग इतनी हो गई झोली तेरी परवर दिगार, हैफ़,इज़्ज़त के जनाज़े पाँव से ठुकरा दिए, तेरी चौखट पर झुके है,इसके ये मानी नहीं, गम के शोले जिसने चाहा ज़ीस्त में भड़का दिए, हम न बदलेंगे कभी ये अपना शाहाना मिज़ाज सुन सरे महफ़िल इरादे हमने।भी बतला दिए... उर्मिला माधव..

चिलमन दरूं

चिलमन दरूं गिरा के किया आपने गुनाह, इस बे-अदब अदा का भला क्या करेंगे आह !!, इन फ़ासलों के साथ ही चलना है गर हमें, किसकी करेंगे आरज़ू,किसकी तकेंगे राह, करने से पहले आपने सोचा तो होगा ख़ूब हरक़त को आफ़रीं है,अदावत की वाह-वाह !! इसके हुए मआनी के उल्फ़त हुयी तमाम, अब देखनी है आपकी बदली हुयी निगाह, हमको किया अमीर भी इफ़रात से जनाब, रख्खेंगे अब सहेज के ये आह और कराह,  उर्मिला माधव...

बहुत है

तुमसे मुझको प्यार बहुत है, इक पल का दीदार बहुत है, पूरी दुनियां से क्या करना, तुम हो इक दिलदार बहुत है, बिना तुम्हारे हर पल तनहा, दिल समझो बीमार बहुत है, उर्मिला माधव, 13.2.2017

हम तो कितनी बार गए हैं

हम तो कितनी बार गए हैं, उसके घर के दरवाज़े तक, वो ही कभी न आया फिर के अपने किये हुए वादे तक.. दर्द में पिन्हा होकर भी बस खामोशी से देखा सब कुछ, ख़ुद को हमने क़सम दिलाई, नहीं टूटना ग़म साधे तक.. उर्मिला माधव

रात को रोज़ मुस्कुराती है

रात को रोज़ मुस्कुराती है, सहर होते ही रूठ जाती है, मेरे घर की मुँडेर पर आकर, शाम होते ही झिलमिलाती है, अपनी आदत के मुताबिक आकर, मेरी रातों को जगमगाती है, उसकी आमद से ऐसा लगता है, जैसे वो गीत गुनगुनाती है, अपने क़दमों की मीठी आहट से, मेरी यादों को छेड़ जाती है, दिल की ख़्वाहिश है मेरे साथ रहे, क्या कहें फ़िर भी लौट जाती है, वो मेरा सब्र आज़माती है, मेरी हालत पै खिलखिलाती है, ऐसी ये चाँदनी है जो हरदम, ज़िन्दगानी से खेल जाती है, कोई जीता हो कोई मरता हो, वो यूँ ही रोज़ आती जाती है. उर्मिला माधव.. 12.2.2013

कितनी सारी गहमा गहमी

एक मतला तीन शेर, -------------------- कितनी सारी गहमा-गहमी हाय दैय्या, दुनिया कैसी सहमी-सहमी हाय दैय्या, प्यार कहाँ पर मिलता है,इस मेले में, सबकी आँखों में बे-रहमी हाय दैय्या, जब हमने पहचाना,सबको ठीक नहीं, क्यूँ हम पालें ये ख़ुशफ़हमी,हाय दैय्या, क्या पहचान बताऊँ सबको दुनिया की, सबकी आँखें लगती बहमी,हाय दैय्या, उर्मिला माधव... 12.2.2014....

वक़्त आता है

वक़्त आता है गुज़र जाताहै, वो जो गुज़रा है किधर जाता है ? भूल पाने की लियाक़त ही कहाँ, दिल के कोने में ठहर जाता है, क्या कहें आँख में रुकता ही नहीं, ख्वाब रह-रहके बिखर जाता है, उर्मिला माधव ... 12.2.2016

दुश्मनी का दायरा

Dushmani ka daayra kuchh kam nahin, Farq bas itna hai , mujhko ghm nahin, **** दुश्मनी का दायरा कुछ कम नहीं, फ़र्क़ बस इतना है, मुझको ग़म नही, Zarq dil par chahe jitna ho magar, Ispe bhii gardan men koi kham nahin, **** ज़र्क़ दिल पर चाहे जितना हो मगर, इसपे भी ....गर्दन में कोई ख़म नहीं... Urmila Madhav.. 12.2.2017

देख जाने वाले

देख जाने वाले तुझको सोचना क्या ज़िन्दगी है, जाने क्या-क्या छूटता है, जिस्म-ओ-जां से राब्ता भी टूटता है, अपनी मुट्ठी में मुक़द्दर बांधता है, कुछ नहीं रुकता है, ये भी जानता है, रोज़ रोता और बिलखता ज़िन्दगी पर, कुछ नहीं रुकता है, ये भी जानता है चाहे जितनी हों तिरी मजबूरियां, जिस से रहनी हैं, रहेंगी, दूरियां, कुछ नहीं रुकता है तू भी जानता है उर्मिला माधव

दुहाई है

वक़्त ने भी वो अदा दिखलाई है,दुहाई है, मेरे हिस्से मैं फ़क़त रुसवाई है दुहाई है, चाँद भी मेरी तरह तनहाई मैं डूबा लगा, किसने फिर ये चांदनी फैलाई है दुहाई है, जिसकी ख़ातिर मुन्तजिर थे उम्र भर , वो मुहब्बत ही कभी ना पाई है दुहाई है, पथ्थरों के रास्ते,पत्थर के घर हैं जा-ब-जा, अपने दिल को बात ये समझाई है दुहाई है , ये ज़माने की अदालत है अरे ओ नासमझ , मरते दम तक भी नहीं सुनवाई है दुहाई है, उर्मिला माधव ...

ख़ुदा समझते हैं

वो जो खुद को खुदा समझते हैं, ज़ीस्त को मयक़दा समझते हैं  सारी दुनिया नशे मैं गाफिल है, बात ये तयशुदा समझते हैं , कौन बिखरा हुआ है अन्दर तक, बस इसे ग़मज़दा समझते हैं, तोड़ देते हैं दिल जो आदम का, दहर को बुतक़दा समझते हैं, वो जो पत्थर तराशा करते हैं, आंसुओं को अदा समझते हैं..... उर्मिला माधव... 11.2.2014...
हमारे हाथ में ख़ुशबू तुम्हारे हाथों की  दिलाए याद मुझे सिर्फ़ गुज़री रातों की,

अज़्म नहीं

समझा था मैंने अज़्म है और आफ़ताब है, तू आया मेरे दिल को लगा इंक़लाब है  किस तरहा तोड़ डाला तुझे इल्म ही नहीं, आंखों में अश्क़ दिल भी मिरा आब–आब है, खुर्शीद बनके चमके मिरे दिल की चाह थी  तेरा बयान हद है, शबाब ओ शराब है... मेरी दुआ है तेरे लिए उस जगह ठहर, तू आज जिस जगह है बहुत कामयाब है, उसके तईं भी सोच जिसे चाहता है तू, क्या साथ देगा तेरा, कहां सेहत्याब है.. उर्मिला माधव 

आह पंछी की समझ कर

एक मतला दो शेर... -------------------- आह पंछी की समझ कर भी रहे खामोश हम, कोई सूरत ही नहीं थी देते क्या..आगोश हम, वो तमाशा देखने वालों में ही गिनता रहा, दायरों की बंदिशें थीं नईं हुए पुरजोश हम, होगयीं बेचैनियाँ पर क्या सुनाते हाले ग़म, देख कर उसको तड़पता भूल बैठे होश हम.... उर्मिला माधव... 10.2.2014..

जिस्म तो एक है

जिस्म तो एक है लिबास बहुत, जो भी सजता हो, वो है ख़ास बहुत, उंसियत राई भर नहीं रहती, लोग बनते हैं ग़म शनास बहुत, बेसबब, झूठ-मूठ लफ़्फ़ाज़ी, हमको आती नहीं है रास बहुत, तेरी दुनियां को अब धता ही सही, इससे आने लगी है बास बहुत, आईना शक़्ल पढ़ता रहता है, हमने रख्खा है इसको पास बहुत, ज़िन्दगी बेवफ़ाई करती है, कौन करता है इससे आस बहुत, उर्मिला माधव..

हुए हज़ारों टुकड़े दिल के

एक मतला दो शेर----- हुए हज़ारों टुकड़े दिल के,और क़हर से क्या होता है?? हम मानिंन्द हुए मुर्दे के,और ज़हर से क्या होता है?? जिसकी हो जागीर हमेशा रहे उसी की मरते दम तक, कोई इस्तक़बाल कहे बस और शहर से क्या होता है??  दीवारों से बने हुए हैं,ताजमहल और मंदिर मस्जिद, आमद-रफ्त बशर की क़ायम और दहर से क्या होता है ?? उर्मिला माधव... 24.2.2014..

बीमार कर गए

उफ़ ज़िन्दगी के मरहले बीमार कर गए, ऐसा लगा कि ग़म का परस्तार कर गए दामन में सिर्फ खार हैं.....पैरों में आबले, रस्ता बहुत कठिन था मगर पार कर गए, कुछ आरज़ू थी...कुछ थे इरादे बहुत बड़े, कुछ रास्ते के गम मुझे खुद्दार कर गए, सब लोग क्या कहेंगे......यही डर बहुत रहा, क्या-क्या सुनेंगे हम जो अगर हार कर गए, किसको अज़ीज़ होगी कहो ये अज़ल की राह, हम से ही सिर फिरे हैं...जिगर वार कर गए ...  उर्मिला माधव ... १४.९.२०१३

आस पास रह गया

ग़म हमारी ज़िंदगी के आस-पास रह गया, बस लबों से हंस दिए, दिल उदास रह गया। मुश्किलें थी और थी बस दर्द की वाबस्तगी, कौन अपनी ज़िंदगी में ग़म शनास रह गया। आह,चीखें रंजो ग़म सब बर्फ़ हो के जम गए, जिस्म गल के गिर गया है बस लिबास रह गया। उर्मिला माधव

ज़माने को मैंने

उसे सिर्फ़ अपना बनाने को मैंने, रखा ठोकरों पर ज़माने को मैंने, मुहब्बत की राहें बुलाती रही पर, मना कर दिया सब ज़माने को मैंने, कभी भी ज़हन पे न ताले लगाए, कि तौहीन उसकी बचाने को मैंने, हमेशा ही परदों के पीछे रखा बस, ख़ता कर दिया हर निशाने को मैंने.. कोई मेरे अंदाज़ कब पढ़ सका था, अंधेरों में रख्खा ठिकाने को मैंने, उर्मिला माधव 

बालियां कानों की

बालियां कानों की मेरे हिल रही हैं, कान आहट पर लगे हैं, क्या मिरा कोई दोस्त है क्या, नहीं, शायद नहीं है, हवा आई है मुझसे बात करने, ठहर कर हाल मेरा पूछती है, इशारा कर रही है उन दरख़्तों की तरफ़, जो मुसाफ़िर को दिलासा दे रहे हैं, मुझे समझा रही है, कहीं दुनियां किसीकी दोस्त है क्या ? नहीं शायद नहीं है, बहुत से आए थे, लेकिन गए सब, अभी बाक़ी हैं, कितने और आने, कोई रुकता नहीं है, ज़रा उठ्ठो, नज़र भर कर तो देखो, तुम्हारे वास्ते भी रुक गया क्या ? नहीं शायद नहीं है, ये मीलों रास्ते चलकर जो आए हो यहां तक, तुम्हारे साथ कितने चल रहे थे, कोई साथी बचा है क्या अभी तक? नहीं शायद नहीं है, तो फ़िर क्या सोचना है तुम अभी तक भी तो तनहा ही चले हो, किसीके साथ की आदत बची है? नहीं शायद नहीं है नहीं शायद नहीं है... उर्मिला माधव 8.2.2018

यही बात दिल को बतानी है

यही बात दिल को बतानी है यारो, बहुत बे-वफ़ा ज़िंदगानी है यारो, ये सांसों की रफ़्तार का आना-जाना, फ़क़त वक़्त की खींचातानी है यारो, हों हालात कुछ भी नहीं फ़र्क़ इससे, के लहज़ा-ब-लहज़ा निभानी है यारो, मुहब्बत से हो रु-ब-रु सब ज़माना, यूँ ही लम्हा - लम्हा बितानी है यारो, जिसे हम समझते हैं जागीर अपनी, यहीं सब पड़ी छोड़ जानी है यारो, हों ख़ामोश आहें या,पुर सोज़ आंखें न ग़ैरों को हरगिज़ दिखानी हैं यारो, अगर बंद हो जाएँ,मिज़्गाँ -ए-इंसां, तो शम भर में बीती कहानी है यारो... समझता है जिसको मुकम्मल ज़माना, वो बस चार दिन की जवानी है यारो... उर्मिला माधव

ग़ैर मुल्क में चर्चे इसके

ग़ैर मुल्क में चर्चे इसके ....नूर-ए-हिन्दुस्तान हुई, लाशों के अंबार पै बैठी ....दिल्ली क़ब्रिस्तान हुई, लाल किले की दीवारों से ..परचम भी लहराता है, किसे ख़बर है,इसके पीछे,किसकी जां क़ुर्बान हुई... उर्मिला माधव  7.2.2015..

हम तखय्युल की ताब रखते हैं

हम तखैय्युल की ताब रखते हैं, अपने दिल में ही ख़ाब रखते हैं, ज़ख्म-ए-उल्फ़त के सब सवालों का, हर मुकम्मल जवाब रखते हैं, दिल कभी टूट कर न रोये कहीं, क़तरा-क़तरा हिसाब रखते हैं.. ज़ेरे लब मुस्कुराया करते हैं, दिल में लाखों अज़ाब रखते हैं, ज़िन्दगी चूँकि तुझको जीना है, खुद ही खाना ख़राब रखते हैं, मौत दावा करेगी क्या हम पर, जिसको हम इन्तिख़ाब रखते हैं, #उर्मिलामाधव  folowers1

घर के ही खटराग

घर के ही खट राग बहुत हैं, अपने दिल के दाग बहुत हैं, घर-घर जांयें,दरीचे झांकें, हम ही कब बेदाग़ बहुत हैं?  ये घर को मद्फन कर डालें, अब ज़हरीले नाग बहुत हैं, अब चलती हैं खालिस बातें, जिन बातों में झाग बहुत हैं, हर लब के अलफ़ाज़ दबा दें, फटे गले के काग बहुत हैं.... उर्मिला माधव... 6.2.2014...

खुशामद का दौर

 ख़ुशामद का दौर है अब तो, क़द्दे आमद का दौर है अब तो, गो कि अच्छा बुरा मआनी नहीं, बस नदामत का दौर है अब तो, कब से जो ग़म छुपाए फिरते थे, सब बरामद का दौर है अब तो, उर्मिला माधव 6.2.2018

दुबारा न गया

उसकी दुनियां में मिरा दिल ये दुबारा न गया, उसको भी ज़िद सी रही उससे पुकारा न गया फिर ये सोचा कि चलो भूलना अच्छा है उसे, क्या कहें आंख से वो ख़्वाब उतारा न गया... उर्मिला माधव 6.2.2018

जाने वाला

जाने वाला लौट कर आ जाएगा क्या? कोई उसका घर कभी बतलाएगा क्या? कितनी लंबी ज़िन्दगी जीना पड़ी है, इससे आइंदह कोई जा पाएगा क्या? उर्मिला माधव

ख़ाक होकर

हम यहां जीते रहे हैं ख़ाक होकर, पर हमेशा ख़ुश रहे ग़मनाक होकर बोझ ग़म का हम समेटे आ गए अब, लौट जाएंगे यहां से चाक हो कर उर्मिला माधव

हम अपनी अदा के दीवाने

हम अपनी अदा के दीवाने,अन्दाज़ में अपने जीते हैं, ऐलान है अपनी जानिब से,जो चाहे बग़ावत कर बैठे, ये ज़ेब भी उसको देता है, जो नया-नया हो दुनियां में, आज़ाद ख़याली है उसकी, जो चाहे शरारत कर बैठे, उर्मिला माधव

पहले से ख़्वाब हमने

पहले से ख़्वाब हमने ज़्यादा हसीन देखा, जब धड़कनों को अपनी ताज़ा तरीन देखा, मुश्किल हुआ समझना,क्या ज़ेहन में लिखा है, जब शख्सियत को इतना ज़्यादः ज़हीन देखा, बारीकियां समझना,आसान तो नहीं था, जिस्म-ओ- जिगर पे होता चर्चा महीन देखा, कोई अहमियत न देखी जज़्बात की जहां में, हर लम्हा ज़िन्दगी को ,ऐसा मशीन देखा, हैरत में हर कोई था ये देख कर यक़ायक, मेहताब को ज़मी पर, परदा नशीन देखा, उर्मिला माधव, 30.6.2017

हम से नज़र मिलाती रही

हम से नज़र मिलाती रही,देर रात तक, जो शम्मा झिलमिलाती रही देर रात तक, साक़ी ने कुछ दिया था हमें ,अपने हाथ से, वो क्या था जो पिलाती रही,देर रात तक, कब होश था हमें के ,किधर रात हो गई, क्या शै थी जो जिलाती रही,देर रात तक, तादाद से सिवा था मिरा वक़्त-ए-ना तमाम, गर्दिश भी गुल खिलाती रही,देर रात तक, फिर ऐसा कुछ हुआ के हमें नींद आ गई, दुनियां हमें हिलाती रही......देर रात तक, दहशतज़दा खड़े थे कई चारागर वहां, एक रात खिलखिलाती रही,देर रात तक, उर्मिला माधव, 4.2.2017..

तितलियों के पंख तोड़े

तितलियों के पंख तोड़े, फूल के डंठल निचोड़े, कौन प्रिय कहकर तुम्हें,इक दीर्घ सी निःश्वास छोड़े, सत्य की पहचान हो तो कोई भी मुंह मोड़ लेगा, है भला एकांत तो फिर क्यों अधिक जोड़े ऑ तोड़े... उर्मिला माधव

आँखें बड़ी बड़ी कर प्यारे

आंखें बड़ी-बड़ी कर प्यारे आजा दुनियांदारी देख, बहुत-बहुत मीठे लफ़्ज़ों में छुपी हुई हुशियारी देख, बहुत हुलस कर लिपटने वाले क्या-क्या रखते हैं दिल में, दांत दिखा कर मिलने वालों की तू कारगुज़ारी देख, जीते हैं बस अपनी ख़ातिर,इनको ग़रज़ किसीकी कब, खुल कर हंसने वालों की बस छुपी हुई मक्कारी देख, इनके दिल में किसी का दर्जा, समझोगे तो ख़ाक नहीं, जिन यारों से इन्हें मुहब्बत,उनसे आपस दारी देख, ये कब दोस्त हुए हैं किसके,वक़्त पड़ा तो आन मिले, आस्तीन में होगा खंजर संम्भल ज़रा ग़द्दारी देख... ऐसा नहीं है इस दुनियां में नफ़रत ही है, प्यार नहीं, ऐसे भी हैं लोग यहां पर, इनकी सबसे यारी देख... उर्मिला माधव

जब तूने दिल तोड़ा होगा

जब तूने दिल तोड़ा होगा, कैसे तुझको छोड़ा होगा, तनहाई में अक्सर जाकर, चौखट पै सर फोड़ा होगा, बाँयां हाथ जिगर पै रखकर,  दिल का दर्द निचोड़ा होगा,  चाहे जितना ग़म हो तुझको,  मुझ से तो पर थोड़ा होगा, तुझे भुलाने की खातिर ही, खुद को खुद से जोड़ा होगा, दिल पर दाग़ लगाने वाले, तुझसा कौन निगोड़ा होगा..... उर्मिला माधव....

बंदोबस्त है

जंग का भरपूर बंदोबस्त है, दोस्ती में दुश्मनी पैवस्त है, रंग इसके आप सब भी देखलें, ये बताएं मस्त है या पस्त है? ख़ाक हैं इसके सरासर इत्तिआद    है मज़े में जो ख़ुदी में मस्त है  इत्तिआद--- वचन देना  उर्मिला माधव...

इंतज़ार

इंतज़ार---- किसीको चाहत का, किसीको राहत का किसीको मुहब्बत का, किसीको इजाज़त का, किसीको बग़ावत का, इक छलांग ऊंचाइयों के लिए, एक छलांग गहराइयों के लिए, कहीं आराइयों के लिए कहीं शैदाइयों के लिए सीखना होगा शैदाई होना, ख़्वाब ख़ाने की ज़दों तक, मर जाने की हदों तक, उर्मिला माधव 2.1.2019

कमज़र्फों की भीड़

कमज़र्फ़ों की भीड़ में ज़ाहिर होता है, कोई कितनी हद तक शातिर होता है, कहाँ मुनहसिर हो सकते हैं दुनियां में, यही समझने वाला माहिर होता है, उर्मिला माधव

चल पाएंगे

चल पाएंगे कितना, चलना पड़ा अगर ? रुक-रुक के पैरों को मलना पड़ा अगर ? हिम्मत तो कर ली है फ़िर भी डर ये है, शाम से पहले हमको, ढलना पड़ा अगर? उर्मिला माधव किसी दश्त से गुज़रेंगे तो क्या होगा ? सूरज के साए में जलना पड़ा अगर?

गुज़री दुनिया

गुज़री दुनियां सामने आती रहती है, जाने क्या-क्या याद दिलाती रहती है, ये सब देख के दिल घबरा के चुप है बस, ग़म की आमद रोज़ डराती रहती है उर्मिला माधव

उन्सियत होती नहीं

उंसियत होती नहीं है अब किसी हालात से, इतनी नफ़रत हो गई है आदमी की ज़ात से, हर नए इनसान से अब कोफ़्त होती है हमें, दब गए हैं इस क़दर हम दर्द की इफ़रात से, इक नए अंदाज से आकर गले मिलते भी हैं, पर सभी किरदार हैं इक तीरगी की रात से, उर्मिला माधव..

दूरियां थीं

दूरियां थीं फिर भी अपनी आह बिल्कुल एक थी, मिलना–जुलना हो न हो पर,चाह बिल्कुल एक थी,