आह पंछी की समझ कर
एक मतला दो शेर...
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आह पंछी की समझ कर भी रहे खामोश हम,
कोई सूरत ही नहीं थी देते क्या..आगोश हम,
वो तमाशा देखने वालों में ही गिनता रहा,
दायरों की बंदिशें थीं नईं हुए पुरजोश हम,
होगयीं बेचैनियाँ पर क्या सुनाते हाले ग़म,
देख कर उसको तड़पता भूल बैठे होश हम....
उर्मिला माधव...
10.2.2014..
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