कितने मुखौटे
कितने मुखौटे लेके जीते हैं,
ज़ख्म सींते है,
अश्क़ पीते हैं,
खूब हँसते हैं,
मन में रीते हैं,
कैसी-कैसी,
दुहाई देते हैं,
हर तरह ढूंढते,
सुभीते हैं,
सांस रूकती है,
फिर भी जीते हैं,
तुम भी जीते हो,
हम भी जीते हैं,
बात इतनी है,
बस फजीते हैं...
उर्मिला माधव...
22.2.2014...
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