घर जाते हैं

हम जो बारिश में कभी भीग के घर जाते हैं,
यक़ता आँखों की चमक देख के डर जाते हैं,

आईना देखें नहीं,इतनी क़सम दी खुद को, 
लाख़ बचते हैं मगर फिर भी उधर जाते हैं, 

हमने लोगों से कभी कोई भी शिकवा न किया,
अपनी आहट से मगर, लोग बिखर जाते हैं,

हमको अंदाज़ा मगर इसका कभी हो न सका,
किसकी चाहत के कहीं ख़्वाब से मर जाते हैं,

ग़म की रफ़्तार तो ठहरेगी नहीं, ज़ाहिर है,
चलते-चलते ही कहीं, हम ही ठहर जाते हैं....
उर्मिला माधव....

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