अच्छा नहीं है बार बार

अपने दिल को तोडना अच्छा नहीं है बारबार,
दर्द की जद में हो चाहे...फैसला हो एक बार,
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हर अना को तोड़ कर इमकान मत कीजे जनाब,
हर कोई है मस्त ख़ुद में,कौन किसका ग़मगुसार,
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ज़हमतें क्यों मोल लेना,चाहे-अनचाहे हुज़ूर,
मुब्तिला गैरों में रहना,किसलिए दीवानावार?
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दह्र से उम्मीद रखना .......हैं महज़ नादानियां,
और अब क्या चाहिए,जब ओढ़नी है तार-तार,
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क्या किसीके दर पै जाना अपने ग़म के वास्ते,
खुद ही मुंसिफ़,ख़ुद अदालत,हो रहो ख़ुद पैरोकार...
उर्मिला माधव

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