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Showing posts from June, 2018

आरज़ू थी प्यार की

टूट ही रहा था दिल,आरज़ू थी प्यार की, सुनी तलक नहीं गई बात सोग़वार की, हसरतें लिए हुए,गए किसीके दर पे हम, गले मिलीं हमें वहां रंजिशें बहार की, फट गई थी ओढ़नी जो अश्क़ पोंछते हुए, उसने य...

फ्री वर्स

सहारा, भ्रम ही तो है, मिल जाना किसीका, बहुत बार मिल जाना, और फिर फिर मिलना, साये की तरह बिछुड़न भी तो है ही, कहाँ भूले जाते हैं ? क्रम है, तलाश की शुरुआत, रफ़्तार जारी रखना, पर हवाएँ पी...

दर्द अपने हैं जिये

क्या बताएं,किस तरह हम संग उसके हैं जिए, जब हदों के पार जाकर तंज़ उसने हैं किये, बरसरे महफ़िल,तमाशा बन गए,ये भी हुआ, बे-सबब ही,ज़ह्र के सब रंग हमने हैं पिए, होगये हलकान,अपने आपसे,लड़कर ब...

बुजुर्गाने आला

अदब अब सभी के दफ़ा हो गए हैं, बुज़ुर्गाने आला ख़फा हो गए है समेटे नहीं जा सके दिल के टुकड़े, ये हिस्से भी कितनी दफ़ा हो गए हैं, सिखाई मुहब्बत-ऑ-तहज़ीब जिनको, जवां क्या हुए,........बे-वफ़ा हो गए ...

सुनसान है

कोई भी ग़ुज़रा नहीं रहगुज़र सुनसान है, वास्ते मेरे मगर हर ज़र्रे में तूफ़ान है, क्या कहूँ कि दम मेरा घुटने लगा अब, रंज मेरा देख कर वाद-ए-सवा हलकान है, चीखती रहती है मेरी आह मेरी ...

मछली आ गई तालाब में

एक मछली आगई तालाब में, गंदगी फैला गई कुल आब में, एक मछेरे की  गज़ब जादूगरी  जाने उसको क्या दिखाया ख़ाब में, फंस गई तो कट गई ये मानलो, आ गई कुछ इस तरह से ताब में, अब रक़ाबी में सजाई जाय...

रखते हैं

जाने क्या-क्या करते हैं,क्यूँ पर्दादारी रखते हैं, अपने हर अंदाज़-ओ-अदा में,मीनाकारी रखते हैं, हमको कम क्यूं जाने दुनियां,हम भी हैं ज़र ख़ेज़ बहुत, जब से अपने दिल पर ग़म का पथ्थर भार...

सफ़र होने दिया

अपने घर की सीढियां अच्छी लगीं, और वहीँ तक हर सफ़र होने दिया... बस, के दो राहें  ..नहीं मंज़ूर थीं, मील के पत्थर को सर होने दिया.. दिल को हिफ्ज़े आबरू अव्वल लगी, बाद उसके . .....जो हुआ होने दिया......

फ्री वर्स

क्यूँ समझ, सब कुछ समझने को बाध्य कर देती है, परिस्थिति को और असाध्य कर देती है, जैसे खैर,खून,खांसी,ख़ुशी, कैसे भी नहीं छुपते, और समझ अपना काम करती है, जो स्पष्ट नहीं,उसे भी समझती ह...

गद्दारों में

लफ़्ज़ लिखे और टांग दिए दीवारों में, अपनी गिनती रखी नहीं फनकारों में, ख़ुद पढ़ते हैं ख़ुद ही खुश हो जाते हैं, नाम हमारा छपा नहीं अख़बारों में, हमने अपने दर्द सुनाये क़ातिल को, रुसवा उ...

क़ाबिल हो गए

हम अकेले कितने क़ाबिल हो गए !! इतने सारे ग़म जो हासिल हो गए !! वक़्त किसको था के देखें और सुनें, सब के सब आके,मुक़ाबिल हो गए, बा-अदब कुदरत ने भी की दुश्मनी, हादसे हर चन्द शामिल हो गए, सामने...

कभी जोरों से चिल्लाना

मुझे गुज़रे ज़माने की वो दुनिया याद आती है, कभी ज़ोरों से चिल्लाना, कभी बहना से लड़ जाना, कभी अम्मां से डर जाना, कभी बारिश से घबराना, कभी वो हंस के बल खाना, कभी रो रो के मर जाना, कभी इतन...

छेड़ दी सरगम

हम तो भूले हुए थे उसका गम, जाने ये किसने छेड़ दी सरगम वो तरन्नुम सा याद आने लगा, जैसे फूलों पे गिर गई शबनम, जिसकी आवाज़ की ख़नक से कभी, मिटने लगते थे सभी दर्द-ओ-अलम, उसकी नादानियों क...

ईद पर नज़्म

Ek nazm ..Eid ke waaste.. Eid tera khair maqdam kis tarah ho, Khoon ke dhabbe abhi dhoye nahin, Kynki tera pairahan shaffaq hai, Sab gharon men ud rahi ek raakh hai, Ranj men doobe hue chehre khade, Kuchh zamiN par rote-rote gir pade , Aansuon ka kaarwaaN kam kis tarah ho, Eid tera khair maqdam kis tarah ho, Aaj jo hota hai,wo socha nahin tha, Mulk o millat men koii locha nahin tha, Ye naii duniyaN ajab itni lage hai, Lafz kahne ko nahin,kitni lage hai, Mazara kya hai,samajh aataa nahin, Khauff bhi dil se magar,jaataa nahin, Khairiyat bhi poochhne ka dam nahin, Qatilon ke hausle,par kam nahin, Maut wala silsila,kam kis tarah ho, Eid tera khair maqdam,kus tarah ho, Dar se ghabraiI huii ye hirniyaaN sii, Jo sarapa lag rahin,aah-o-fughaN sii Khaas veeraani hai chere par rawaaN sii, Kaun jaane kab kahan, daaman jalaa de, Zindagi bhar ke liye, kaalikh lagaa de, Itnaa sara dar bhalaa kam kis tarah ho, Eid tera khair maqdam kis tarah ho, Eid tera khair maqdam kis tar...

सवेरा हो गया

जाग जाओ अब सवेरा हो गया, बहुत लम्बा तेरा-मेरा हो गया, आकलन अपना स्वयं करते रहो, दूसरा क्यों कर चितेरा हो गया, हर कोई जीता है अपने रंग में, फिर कहाँ दुनिया का घेरा हो गया, उर्मिला ...

क्या कीजिये

दिल बहुत दुःख जाय तो क्या कीजिए, सर ब सजदा हो के रोया कीजिए जम के पत्थर हो गए हैं जिस्म-ओ-जां, उस पै पत्थर आप फेंका कीजिए, उर्मिला माधव

ताब रखते हैं

हम तखैय्युल की ताब रखते हैं, अपने दिल में ही ख़ाब रखते हैं, ज़ख्म-ए-उल्फ़त के सब सवालों का, हर मुक़म्मल जवाब रखते हैं, दिल कभी टूट कर न रोये कहीं, क़तरा-क़तरा हिसाब रखते हैं.. ज़ेरे लब मुस...

5 गज़लें

रेख्ता में... क्या ख़बर तुझको,क्या हकीक़त है, ज़िन्दगी ......मौत की ही आहट है, यूँ मयस्सर हज़ार खुशियाँ हैं , पर कहीं इसमें कुछ मिलावट है, मिलने वाले हज़ार मिलते हैं, वो नहीं,जिसकी हमको चाह...

मेरा पड़ोसी लड़का

कितना जुदा लगा था, मेरा पड़ोसी लड़का, बातों में था सलीका, वो जाने,किससे सीखा, मिलने में दम नहीं था, पर फिर भी कम नहीं था, हर रंग जानता था, अपनी ही मानता था, राहों में आते जाते, उसको कभ...

बद्दुआ करते हो तुम

किस तसल्ली की दुआ करते हो तुम, ज़ख्म ही तो बस छुआ करते हो तुम, ख़ैर ख्वाहों में तो ....हरगिज़ हो नहीं, हो रहो ..जो कुछ हुआ करते हो तुम, इसको रब ने कीमती कर के दिया, ज़िन्दगी को बस जुआ करते हो ...

नहीं दिलचस्पियां बाक़ी

तबीयत हट गई सबसे,नहीं दिलचस्पियां बाक़ी, बहुत समझीं मगर फिर भी रहीं बारीकियां बाक़ी, कभी किरदार मुश्किल था,कभी दिल पढ़ नहीं पाये, ब-ज़ाहिर रौशनी हर सू, मगर तारीकियां बाक़ी, हज़ारों ...

श्रद्धा सुमन

ये मेरे श्रद्धा सुमन अर्पित हैं अपने आप को, सब तरह कठिनाइयों का सामना करते हुए, अपने जीवन को जिया बिन याचना करते हुए, एक सुखद संसार की बस कामना करते हुए, मुश्किलों की हर डगर पर ...

नाकाबंदी

खड़े हो भीड़ में जाकर,तुम्हारी क्या बुलंदी है ? जो ये ख़ैमों की दुनियां है,हज़ारों ढंग से गन्दी है, यहाँ ख़ालिस मुलम्मेदार हैं,आक़ाओं के चेहरे, हिफाज़त इक बहाना है,अस्ल येनाक़ाबन्दी ...

आवाज़ न छीनो

पंछी की आवाज़ न छीनो, उसकी वो परवाज़ न छीनो, उड़ता है उन्मुक्त गगन में, उसका वो अन्दाज़ न छीनो, पिंजरे के अंदर एक पन्छी, मन ही मन मुरझा जाता है, उसके गीत झुलस जाते हैं, उसका साज़ ब...

उसूल करली

तुम्हें समझने की भूल कर ली, तो अपनी दुन्या उसूल कर ली, लगाई तोहमत जो तुम ने झूठी, वो हमने झुक के क़ुबूल कर ली, बहार-ए-सब्ज़ा जो हक़ थी अपना, वो अपने हाथों से धूल कर ली, उर्मिला माधव 20.6.2018

नहीं जी सकते

हम मुहब्बत के सराबों में नहीं जी सकते, सच ही कहते हैं हबाबों में नहीं जी सकते, आप आलिम हैं मुहब्बत के रहें,ख़ूब रहें, यार,खादिम हैं नवाबों में नहीं जी सकते, अपने जज़्बात भी चेहरे ...

फ्री वर्स

एक झील ठहरी सी,गहरी सी, झांक कर चेहरा न देखो, डूब जाओगे, तुमको तैरना नहीं आता, इसकी सतह बगुलों के लिए है, शुद्ध और उजले, निर्मल कोमल, स्थायित्व है इनमे, जगह निश्चित है इनकी, ये तुम...

चाहती है

Mujh pe bas qabiz hua hi chahti hai, ek shai ab silsila hii chahti hai, main khari utrun abas ummid par bhi, wo mera hardam bura hi chahti hai, main kade fikron se guzrun,raat din wo, apne haq main bas duaa hii chahti hai, main guzarti hun,hazaaron tanz se par, zakhhm dil ka wo chhua hi chahti hai, maine bhi baazi rakhi us zindagi par, khelna jo bas juaa hii chahti hai... #उर्मिलामाधव... 20.6.2016 मुझपे बस क़ाबिज़ हुआ ही चाहती है, एक शै बस सिलसिला ही चाहती है, मैं खरी उतरुं,अबस उम्मीद पर भी, ...

संभलता नहीं है

बहुत ग़म है संभलता नहीं है, बोझ ये मुझसे चलता नहीं है, क्यूँ है ख़ामोश ये शहर इतना, एक पत्ता भी हिलता नहीं है, किससे पूछें निशाँ मन्ज़िलों के, एक भी शख़्स मिलता नहीं है, बेवजह को...

पसे मंज़र नहीं

अब कोई मंज़र पसे मंज़र नहीं, हम फ़क़ीरों का कोई भी घर नहीं, जो मुक़द्दर में लिखा मिल जायगा, बे-सबब हम घूमते दर -दर नहीं, हम जमा करते नहीं है कौड़ियाँ, इक क़फ़न ही चाहिए,बिस्तर नहीं, कर रहे आ...

परीक्षा

मेरी बहुत पसंदीदा रचना--- एक बार फिर आप सबके साथ साझा करना चाहती हूँ... ------------------------------------------------------------- इसको क्या कहेंगे आप सभी को तय करना है... परीक्षा तो परीक्षा है अब वो चाहे जीवन की हो या पी.एच.डी.की प...

दोस्तो

आग में आग भड़का रहा दोस्तो? काम पानी का फिर क्या रहा दोस्तो?? आग,रूहानी हो,आग जिस्मानी हो, ज़िन्दगी ही जली बारहा दोस्तो, ज़िन्दगी भर जले,मर के भी जल गए, खेल क़ुदरत का ये क्या रहा दोस्त...

बेटी वहां की

आगरे का ताजमहल और मैं बेटी वहां की, और गली कूचे वहां के, कुछ हसीं मंज़र वहां के, दौड़ कर मथुरा कभी तो दौड़ के लखनऊ कभी हाथ में कुछ रेवड़ी, जो ख़ास लखनऊ में बनी हाथ में कंचे लिए बचपन की व...

सांस तक

एक मतला तीन शेर--- ----------- आज ये ज़ाहिर हुआ है यक-ब-यक, साथ भी देगी नहीं......ये सांस तक, राब्ते अब तक रहे........जो राह से, क्या चलेंगे....आख़री एहसास तक ?? कोई भी यक़ता नहीं....इस खेल में, हो गए ख़ामोश..ख़ासम ख़ास ...

सन्नाटा था,

रात थी सन्नाटा था, और मेरे ज़ेहन में हर लम्हा ख़याल आता था, गुफ़्तगू उनकी रही रात, भला किस-किस से, मैंने दस्तक दी,कई बार, वहां जा-जा कर, कौन आया,और कौन लौट गया, उनको मसरूफ़ियत में होश न थ...

तन्हा मां

एक बचपन, तनहा माँ, शिफ़ाखानों के चक्कर काटती हुई, अतिब्बा के चेहरे ताकती हुई, वो तनहा तीन वर्ष, याद आ जाता है,माँ को, शून्य में बस देखना और सोचना, कौनसा रिश्ता,खंगालूँ? शायद कोई भ...

खरे हैं

हम जहन्नुम से निकल कर आए हैं,बिलकुल खरे हैं, कुछ तो ऐसे ज़ख़्म हैं जो आज भी अब भी हरे हैं, इस क़दर हमने तपिश ख़ुर्शीद की बरदाश्त की है, ग़ैर मुमकिन है समझना…...जीते जी हैं या मरे हैं... ...

तल्ख़ हक़ीक़त

इतना ज्यादह घबराते तो,डर कर गुज़र गए होते, ख़ुद अपनी ही पाक़ नज़र से कबके उतर गए होते इसका-उसका हाथ मांगते,कोई राह गुजरने को, इन्कारों की साज़िश से हम कैसे बिखर गए होते, इतनी लम्बी उ...