घर के ही खटराग
घर के ही खट राग बहुत हैं,
अपने दिल के दाग बहुत हैं,
घर-घर जांयें,दरीचे झांकें,
हम ही कब बेदाग़ बहुत हैं?
ये घर को मद्फन कर डालें,
अब ज़हरीले नाग बहुत हैं,
अब चलती हैं खालिस बातें,
जिन बातों में झाग बहुत हैं,
हर लब के अलफ़ाज़ दबा दें,
फटे गले के काग बहुत हैं....
उर्मिला माधव...
6.2.2014...
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