ख़ाक होकर

हम यहां जीते रहे हैं ख़ाक होकर,
पर हमेशा ख़ुश रहे ग़मनाक होकर

बोझ ग़म का हम समेटे आ गए अब,
लौट जाएंगे यहां से चाक हो कर
उर्मिला माधव

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