तबीयत हट गई सबसे


तबीअत हट गयी सबसे, नहीं दिलचस्पियाँ बाक़ी
बहुत समझीं, मगर फिर भी रहीं बारीक़ियां बाक़ी

कभी किरदार मुश्किल था, कभी दिल पढ़ नहीं पाये
ब-ज़ाहिर रौशनी हर सू, मगर तारीकियाँ बाक़ी

हज़ारों किस्म के जल्वे, नुमायाँ रू ब रू हर पल
मगर रब की निज़ामत में रहीं, वीरानियाँ बाक़ी

मक़ाम ए ज़िन्दगी आसाँ नहीं, इतना भी सुन लीजे
हज़ारों मर गए फिर भी रहीं क़ुर्बानियाँ बाक़ी

जमा खर्चे ज़बानी देख के इंसाँ की फ़ितरत के
लगा हमको अभी तक हैं बहुत तरतीबियां बाक़ी ...
* उर्मिला माधव

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