सख़्त है फ़ैसला हमारा भी
सख़्त है फ़ैसला हमारा भी,
अब न देखेंगे हम इशारा भी.
जो भी दो नाव साथ चुनता है,
उसको मिलता नहीं कनारा भी.
वो समझते हैं हम ही नादाँ हैं,
जब छुपाते हैं वो नज़ारा भी.
हमको वो रोज़ सुनना पड़ता है,
जो न करते हैं हम गवारा भी..
अपनी जानिब से अब विदाई है,
उनको सहना है ये ख़सारा भी.
उर्मिला माधव
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