ग़ैरों की छोड़िए
ग़ैर की छोड़िये,अपनों की ज़ुबाँ क्या कहने
पैने अलफ़ाज़ हैं,कब दिल से निकल पाते हैं
चाहे हम जितना समेंटें ये मगर बिखरेंगे,
ख़ाब तो ख़ाब हैं,बस नींद में पल पाते हैं
जो भी ग़ैरों पे उठाते हैं सरासर उंगली,
ऐसे शैतान कहाँ खुद को बदल पाते हैं ?
उर्मिला माधव
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