हम से नज़र मिलाती रही
हम से नज़र मिलाती रही,देर रात तक,
जो शम्मा झिलमिलाती रही देर रात तक,
साक़ी ने कुछ दिया था हमें ,अपने हाथ से,
वो क्या था जो पिलाती रही,देर रात तक,
कब होश था हमें के ,किधर रात हो गई,
क्या शै थी जो जिलाती रही,देर रात तक,
तादाद से सिवा था मिरा वक़्त-ए-ना तमाम,
गर्दिश भी गुल खिलाती रही,देर रात तक,
फिर ऐसा कुछ हुआ के हमें नींद आ गई,
दुनियां हमें हिलाती रही......देर रात तक,
दहशतज़दा खड़े थे कई चारागर वहां,
एक रात खिलखिलाती रही,देर रात तक,
उर्मिला माधव,
4.2.2017..
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