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Showing posts from March, 2026

यूं ही उल्टे रहो

 यूं ही उल्टे रहो रुख़ से परदे को तुम,जाएं सदके नज़र दिल मचलता रहे  होश हो जाएं ग़ुम दौर चलता रहे,बर्क़ गिरती रहे तूर जलता रहे, आओ हम तुम करें दोनों अहदे वफ़ा और बदल दें ज़माने की रफ़्तार को  सुबह बदला करे शाम बदला करे हम न बदलें ज़माना बदलता रहे, तुम मेरे सामने आओ तो इस तरह तेरा परदा रहे मुझको दीदार हो  पास चिलमन के बैठे रहें आप ही, हुस्न छन–छन के बाहर निकलता रहे, तुम मेरे सामने से गुज़रते रहो और छुप–छुप के मैं तुमको देखा करूँ  तुम समझते रहो मुझको एक अजनबी, अजनबी राह मंज़िल की चलता रहे, जान जाने का सहबा को कुछ ग़म नहीं मैं ये समझूंगा के राज़े उल्फ़त ही है  तेरी जानूं पे जिस दम रहे सर मेरा। चांद ढलता रहे दम निकलता रहे...

याद सुहानी निकली

रात के ख़्वाब से इक याद सुहानी निकली, सोचने बैठे तो एक ख़ास निशानी निकली, ख़ुद को छोड़ा था कहीं प्यास को दरिया करते, जिस्म लगता था नया,प्यास पुरानी निकली, माह-ओ-अख़्तर भी अंधेरों के तले सोया किये, हम तो अहमक ही रहे, रात सयानी निकली, उसने एक ख़ास बदन देके हमें भेज दिया, यूँ ही दम भरते रहे, ज़ीस्त भी फ़ानी निकली, हमने मुश्किल को बहोत पास से देखा, परखा, वो मगर बन के मिरी आंख से पानी निकली... उर्मिला माधव

बीनाई तो पाई नहीं

आँख है पर क्या करें बीनाई तो पाई नहीं, बात बढ़के हसरत-ए-दीदार तक आई नहीं, आँख से परदे हटाके,दिल की जानिब देखले, इस तरह गर्दन झुकानी क्यूँ तुझे आई नहीं?? तार दामन के बचाता है अबस ही बे खबर, इश्क़ में दीवाना होना कोई रुसवाई नहीं, जो तू मिलना चाहता है,दिलनशीं महबूब से, सर झुका कुर्बान होजा वरना शैदाई नहीं, है अनल-हक़ देख तो नज़रें घुमा कर चार सू आज अनहद बज रहा है क्या वो शहनाई नहीं? उर्मिला माधव...

किस तसल्ली की दुआ करते हो तुम

किस तसल्ली की दुआ करते हो तुम, ज़ख्म ही तो बस छुआ करते हो तुम, ख़ैर ख्वाहों में तो हरगिज़ हो नहीं, हो रहो जो कुछ हुआ करते हो तुम, इसको रब ने कीमती कर के दिया, ज़िन्दगी को बस जुआ करते हो तुम.. उसकी चाहत क्यूँ तुम्हें दरकार है, जिसके हक़ में,बद्दुआ करते हो तुम... जो भी दिल को दे सके हो आज तक, आबलों को मजमुआ करते हो तुम, #उर्मिलामाधव,

आँखें ठहर गईं हैं

आंखें ठहर गईं हैं सहर देखने के बाद, जुम्बिश कहाँ करेंगी किसी ज़लज़ले के बाद, काविश हमारी देख ले हम उम्र भर चले, फिर उठ खड़े हए हैं नए मसअले के बाद हमको पुकारना है ग़लत, हम तो रुक गए, दम तोड़ के खड़े हैं किसी वसवसे के बाद, जो हो चुका है उसके तईं, ग़म भी क्या करें, ये फ़ैसला किया है हर इक हादिसे के बाद, उर्मिला माधव

बात ऐसी मैं तुम्हें बतला रही हूं

नज़्म बात ऐसी मैं तुम्हें बतला रही हूँ, ख़ास मंज़िल से उतर कर आ रही हूँ, कुछ धुएं थे और थे बादल बहुत से, आमिरों की शक्ल में पागल बहुत से, कुछ असीरी में बंधे थे ख़ुद ब खुद ही, पाँव भी ज़ंजीर थे सो ख़ुद ब ख़ुद ही, जाने कितने मसअलों पर तज़किरे थे, मेरी नज़रों में तो सब ही सरफिरे थे, सबके चेहरों पर अजब सी वहशतें थीं, बिन बुलाई मौत की सी दह शतें थीं, झूठ किस्से फ़स्ल की बर्बादियों के, बाँट हिस्से अपनी कुछ आबादियों के, मैं नहीं समझी ये कैसे लोग हैं सब!! हंस रहे पर लग रहे पुर सोग हैं सब, पाँव हैं पर चल रहे बैशाखियों पर, और क़दम रख्खे हैं केवल हाशियों पर, #उर्मिलामाधव...

बांसुरी तुमको बनाना

बांसुरी तुमको बनाना चाहती हूँ, अपने होठों से लगाना चाहती हूँ, और कोई गीत चाहे गा न पाऊँ, सिर्फ तुमको गुनगुनाना चाहती हूँ, सपने जो भी मेरी आँखों ने सजाए, वो मैं सब तुमको सुनाना चाहती हूँ, मुझको इतनी दूरियाँ जँचती नहीं हैं, तुमसे मिलने को बहाना चाहती हूँ।।... #उर्मिलामाधव... 31.3.2015

तुमने क्या किया

तुमको पसंद हमने किया तुमने क्या किया?? दिल को बुलंद हमने किया तुमने क्या किया?? तनहाइयों में रोया किये.......ज़ार-ज़ार खूब, दिल दर्द मंद हमने किया तुमने क्या किया?? तुमने तवज्जो हम पे किसी तौर जब न की, दिल दस्त-बंद हमने किया तुमने क्या किया ?? उर्मिला माधव ... 31.3.2017

नातवानी देखिए

आप हर इक ज़िन्दगी की नातवानी देखिए, अब न तहरीरें ज़रूरी, मुंहजबानी देखिए,

शब्दों का अप्रतिम सौंदर्य। फ्री वर्स

शब्दों का अप्रतिम सौन्दर्य, क्या लिखा है, प्रिय, तुम्हारी उँगलियों ने, एक शब्द, सुगंध, अनुपम है, आभासित है किन्तु, परिलक्षित नहीं, ये कोई प्रीत है क्या ? यदि हाँ, तो उजागर हो, अन्यथा, जीवन में, एक दिन निश्चित हुआ है मृत्यु का,  मर्यादाओं का, एक अविदित मार्ग, दुरूह मार्ग, चलते हुए सब, संभलते हुए सब, स्वयं को छलते हुए सब, अंत हीन, मार्ग.. और अंतहीन वियोग, उर्मिला माधव,

ये मेरी हस्ती है

ये मेरी हस्ती है और मैं हूँ जनाब, आपके कहने से होगी क्यूँ ख़राब, देख कर ऐब-ओ-हुनर इनसान के, क्या बजाते फिरते हो ये मुंह जनाब, मैं भी गर कहने पे जो आ जाऊं तो, आप क्या दे पायेंगे पूछूं जवाब ? आप भी अपना गिरेबां झाँक लें, तब समझ में आएगा,क्या हूँ नवाब ? अपने हाथों से मसल कर आबरू, क्यूँ बढ़ाते हैं मुसलसल यूँ अज़ाब, क्यूँ किसीकी ठोकरों पर हो जहां, आप ही को कोई समझे क्यूँ नवाब... #उर्मिलामाधव...

कुछ सितारे

कुछ सितारे टांक दूं क्या आसमां, मैं? या कहीं चस्पां करूँ हुस्न-ए-जवां, मैं ? गर कोई ख़ुशबू सुंघाई दे कहीं तो, प्यार की दुनिया लुटा दूं अय जहां, मैं ? खूबरू हैं सैकड़ों चेहरे ज़मीं पर, सोचती हूँ,वो कहाँ हैं और कहाँ मैं ? हौसले परवाज़ के दिल में बहुत से, दिल नहीं करता करूँ हरगिज़ अयां मैं, मुन्तज़िर खामोशियाँ कहने लगीं अब, वक़्त आने पर करूँ सब कुछ बयां मैं.... #उर्मिलामाधव...

अब ताज़ीराते हिंद की तस्वीर देखिए

अब ताज़िराते हिन्द की तस्वीर देखिये,  हर ज़ाविये से मिट रही तक़दीर देखिये.. कुछ ठीकरों में बेचता इंसान अपने ख़ाब, चलती कहाँ है कोई भी तदबीर देखिये.. उफ़ गर्द में निहां है यहाँ आदमी की ज़ात,  हर पाँव अब हुआ है यूँ ज़ंजीर देखिये.. रहजन हों सलातीन तो बुनियाद भी है ख़ाक लुटती हुई वतन की ये जागीर देखिये.. औक़ात अब बशर की कहाँ कोई है जनाब ,  कुछ शोहदों के हाथ में शमशीर देखिये...  उर्मिला माधव....

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हैरत से उसको देखा था

कितनी हैरत से हमने देखा था, चूँकि एक जाल उसने फेंका था, साथ मैली सी एक औरत थी, उसकी हरगिज़ न कोई शोहरत थी, फिर भी उसको गले लगाया था, सब को अंदाज़ ये न भाया था, उसके पुरखों का एक बंगला था, जिसपे लिख्खा अजीब जुमला था, मुझको मुखिया अगर बनाओगे, दुनियाँ भर के इनाम पाओगे,   लोग पढ़ पढ़ के उसको जाते थे, उन को मानी समझ न आते थे, कुछ ने सोचा ये काम करते हैं, दर पै जा कर सलाम करते हैं, माजरा तब कहीं समझ आया, चाहा वोटों का उसने सरमाया, ऎसी बंदिश में सब चलें कैसे ?? झूठ ही ख़ुद को सब छलें कैसे? सब के सब गोली जैसे छूट लिए, पाँव सर पै रखे और फूट लिए...... उर्मिला माधव... 28.3.2014...

सखावत आपकी

उम्र भर को चाहता है,दिल सखावत आपकी  ख़ास जो दरक़ार है वो बस इजाज़त आपकी,  दिल बहुत मजबूत है पर इस तरह हरगिज़ नहीं,  सर पै चढ़ कर बोलती है,जब अदावत आपकी,  आप कब समझे कभी ये इश्क़ की बारीकियां,  याद है हमको अभी तक हर शरारत आपकी,  जब भी जी चाहा, किसी इलज़ाम से नहला दिया,  सच के भी नज़दीक हो,जो हो शिकायत आपकी,  आपने देखा ही कब है,ज़िन्दगी का रंग-ए-रुख़,  जब ..उतर सकती है पल में ये हरारत आपकी.... उर्मिला माधव...

बेजा क्या करूं

किस तरह भूलूं तेरे अलफ़ाज़ बेजा क्या करूँ वहशतें या हसरतें जो भी हैं लेजा, क्या करूँ , दिल हथेली पै रखा और साथ में इक ख़त दिया, कुछ नहीं बाकी बचा है क्यों ये भेजा, क्या करूँ, हर घड़ी हलकान रहना और न सोना रात भर, और जो तनहाई दी थी,वो भी है जा, क्या करूँ, कब तलक चल पाएगी ये एक तरफ़ा ज़्यादती, मैं भी जानूँ हूँ तग़ाफ़ुल जा कहे जा, क्या करूँ, मुझको सुनना ही नहीं है,तल्ख़ियों का फ़लसफ़ा, उम्र भर तो मैंने तनहा ,ग़म सहेजा, क्या करूँ #उर्मिलामाधव... 26.3.2016

और क्या करते हैं हम

एक मतला दो शेर--- -------------------- बे-वज्ह इस जीस्त पे मरके भी क्या करते हैं हम, मरके जीने के इलावा.......और क्या करते हैं हम ?? चश्म-ए-गिरियाँ,टूटते दिल,और फ़क़त,तन्हाइयां, दर्द पीने के इलावा..........और क्या करते हैं हम ?? चाक़ दामन,हाल खस्ता........और कुछ पैबंद बस , ज़ख्म सीने के इलावा.......और क्या करते हैं हम ?? उर्मिला माधव... 27.3.2014...

किरदार की सफ़ेदी है

ये तो क़िरदार की सफ़ेदी है, इसको एक उम्र मैंने देदी है , गोकि हर सम्त ख़ून रिसता है,  ज़िंदगी इस तरह से भेदी है, तह में चिंगारी इक सुलगती सी,  बुझने वाली थी,.. फिर कुरेदी है, उर्मिला माधव ... 27.3.2015..

आपके कहने पे गर हम जाएंगे

आपके कहने पे हम गर जाएंगे, सोचते ही सोचते मर जाएंगे, दो क़दम आगे बढ़ा कर देख लें, आपकी याद आएगी, डर जाएंगे, हम मगर उन में से आख़िर हैं कहां, चाहे जो गुज़रा करे पर जाएंगे, हम किसी से राबिता रखते नहीं, हां मगर हम चोर के घर जाएंगे, उर्मिला माधव

आग लगती ही कहां है

अब कलम से आग लगती ही कहाँ है, आग का मक़सद तो हर इक आशियाँ है, ज़िन्दगी ज़िंदादिली है, सच है क्या ये ? कोई बतलाएगा इसमें क्या निहां है? क्या कोई मज़हब अभी बाक़ी रहा, क्यों फ़ना होता है जो इक कारवां है? वो भी राही क़त्ल कर डाले गए सब, जिनकी पाकीज़ा ज़ुबाँ, अम्न-ओ-अमां है, इसको किन नज़रों से देखा जाएगा अब? ये जो मक़तल से गया गुज़रा समां है, उर्मिला माधव,

तूने जो ज़ख़्म दिए हैं

तूने जो ज़ख़्म दिए हैं, नहीं भरने वाले, याद करता है किसे अब तू बिखरने वाले, बर्ग ए गुल का न कभी दर्द ही समझा कोई, अब कहां तुझको रखूँ, दिल से उतरने वाले गाम दर गाम रहा ग़म ही तमाशाई महज़, ग़म से डरते हैं बहुत ग़म से न डरने वाले,  उर्मिला माधव

उन्सियत होती नहीं है

उंसियत होती नहीं है अब किसी हालात से, इतनी नफ़रत हो गई है आदमी की ज़ात से, हर नए इनसान से अब कोफ़्त होती है हमें, दब गए हैं इस क़दर हम दर्द की इफ़रात से, इक नए अंदाज़ से आकर गले मिलते भी हैं, पर सभी किरदार हैं इक तीरगी की रात से, उर्मिला माधव..

चुपके चुपके रोना है

बस चुपके चुपके रोना है, इस दिल को रोज़ भिगोना है, बेचैन बहुत जो करता है, वो उसका रूप सलोना है, हम नहीं पुकारेंगे उसको, जब हमको ग़म में खोना है, ग़म सिसक रहे ज़ेरे मिज़्ग़ाँ, आरिज़ को अश्क़ ही ढोना है, हम देखें भी क्या दुनिया को, आंसू की लड़ी पिरोना है.. जब नहीं रू ब रू वो मेरे  क्या ऐसा होना, होना है? उर्मिला माधव 

हुआ ही चाहती है

मुझपे बस काबिज़ हुआ ही चाहती है, एक शै जो सिलसिला ही चाहती है, मैं खरी उतरूं अबस ,उम्मीद पर, वो मेरा हरदम बुरा ही चाहती है, मैं कड़े फिकरों से गुजरूँ,रात दिन, अपने हक में बस दुआ ही चाहती है, मैं गुज़रती हूँ,.........हज़ारों तन्ज़ से, ज़ख्म दिल के वो छुआ ही चाहती है, मैंने भी बाज़ी रखी,उस ज़ीस्त पर, खेलना जो बस जुआ ही चाहती है... उर्मिला माधव ... ========================== Mujh pe bas qabiz hua hi chahti hai, ek shai ab silsila hii chahti hai, main khari utrun abas ummid par, wo mera hardam bura hi chahti hai, main kade fikron se guzrun,raat din, apne haq main bas duaa hii chahti hai, main guzarti hun,hazaaron tanz se, zakhhm dil ka wo chhua hi chahti hai, maine bhi baazi rakhi us ziist par, khelna jo bas juaa hii chahti hai... #उर्मिलामाधव... 26.3.2016

free verse

पंछी खोजते हैं  हरे जंगल, पानी के स्रोत, हरे तिनके, रिमझिम बरसात, छोटे छोटे पानी में स्नान, किलोल करते हुए पंछी लेकिन कैसे? वृक्षों की नियति कट जाना, मनुष्यता से गिरना ही  आधार है विनाश का, प्यास से मरते हुए  छोटे से प्राणी, सूखी हुई धरती, तेज़ हवाएं, सूखे पत्तों की चरमराहट, पक्षियों का भय बनी हुई, क्या है अंतर, श्मशान और  साधरण जन जीवन  एक सा ही तो है, म्रत्यु पर्यंत आपा धापी, और सब समाप्त ... काश कोई सत्य की ओर लेजाता, तमसो मा ज्योर्तिगमय: उर्मिला माधव

भीड़ का एहसास

सबसे पहले भीड़ का अहसास होगा आपको, और तभी ख़ामोशियां हैरान कर डालेंगी बस.. उर्मिला माधव

बचते हैं

लोग तो ख़ुदकुशी से बचते हैं, हम हैं के ज़िन्दगी से बचते हैं, एक ही जिस्म है सो मिट्टी का, एहतियातन नमी से बचते हैं, किस लिए दर्द में इज़ाफ़ा हो, इश्क़ ऑ दिलबरी से बचते हैं, जिस्म को अब कहां सहूलत है, इसकी रस्साकशी से बचते हैं, उर्मिला माधव

मुहब्बत कर बैठे

तरही ग़ज़ल इस दिल में अबस इक आग लगी, हम ख़ुद से अदावत कर बैठे, बेताबी-ए-दिल जब हद से बढ़ी, घबरा के मुहब्बत कर बैठे, अय जाओ मियां तुम आज तलक, इक ग़म का रोना रोते हो, एक रोज़ ये हमसे भूल हुई, सहरा से सखावत कर बैठे, शोलों को हवा दी ख़ुद,हमने, अब आह भरें या मर जाएं, सोचा ही नहीं कुछ अपने तईं, दुनियां की हिफाज़त कर बैठे, उम्मीद अभी तक है हमको, हम शोलों पे चल सकते हैं अल्लाह की मर्ज़ी किसको ख़बर, मुमकिन है इनायत कर बैठे दुनियां की नज़र में मत चढ़ना, हर हाल में धोका देती है, उस वक़्त बताओ क्या होगा, जब आग बगावत कर बैठे, उर्मिला माधव

पारसाई की नुमाइश

पारसाई की नुमाईश क्यों करो हो ? ख़ामियाँ ख़ासी नहीं तो क्यों डरो हो ? वो मुसलसल पीठ दिखलाता रहा है, ग़ैर की चाहत में नाहक़ क्यों मरो हो ? #उर्मिलामाधव.... 24.3.2015

तुम ही तुम चलते रहे

साथ मेरे तुम ही तुम चलते रहे, ख़ाब बन कर आँख में पलते रहे, नींद में झपकाईं पलकें जो कभी, हाँ ये सच है,आँख तुम मलते रहे, है मुझे हैरत रहे तुम बे-वफ़ा !! और अदू के साथ भी चलते रहे! क्या सुकूं पाया जला कर आग में, ख़ुद भी अपनी आग में जलते रहे, तुम समझते हो अगर ख़ुर्शीद हो, शाम को अंजाम है.....ढलते रहे, उर्मिला माधव... 24.3.2017..

हिंदी नज़्म

समेटना, बिखरी हुई पत्तियों का, सरल नहीं, तोडना, टूटी हुयी टहनियों का, बहुत सरल है, पर आवाज़ का क्या करोगे? जो तोड़ने से हुई, पर हाँ, किसीके टूटने-जुड़ने से, कोई आहत नहीं होता, ये निजता की बात है, कभी किसी वृक्ष की छाया, भली लगती है, क्यूंकि उसमें हरियाली जो है, कभी किसी वृक्ष का खड़े रहना, भी सालता है, दूषित मन को, क्यूंकि सूखा हुआ वृक्ष किस काम का? पत्तियां तो सूख गईं, और उनका हरा होना  मुमकिन नहीं, अब मुक्त आकाश, में जीवन है  क्यूंकि  क्षितिज के पार भी कोहरा हो सकता है, पर अंतर्दृष्टि चाहिए होती है, एक गहरी अंतर्दृष्टि, पंछियों को आज़ाद रहना भाता है, बंदी होकर कोई सृजन नहीं होता... सिर्फ रुदन होता है, और रोना कौन चाहता है....?? पर तुम्हें कौन समझाए.....?? उर्मिला माधव..

वीरान तो देख

घर कितना वीरान तो देख, क्या-क्या है,सामान तो देख, क्या पैमाना सही ग़लत का, अय दुनियां मीज़ान तो देख, जिस पर बोझा लाद रहा है, उसकी पहले जान तो देख, लिए आईना फिरता है तो, ख़ुद अपना ईमान तो देख, किसे सज़ा दी,किसको बख्शा, भला-बुरा ...इनसान तो देख, फ़िक़्र करे है दुनियां भर की, पहले .....हिंदुस्तान तो देख, उर्मिला माधव, 23.3.2017

दूर का रिश्ता बहुत

दूर का रिश्ता बहुत नज़दीक था, जब तलक था दूर बिलकुल ठीक था, :: कुछ निभाने में कमी होगी ज़रूर, मामला रिश्तों का बस बारीक था, :: यूँ कि ख़ुद मुख़्तार थीं नस्लें नई, ये नतीजा किस्सा ए तसदीक था, :: ग़ालिबन बातों की वो रस्साकशी, हर इरादा मुद्दा ए तज़हीक था, :: मुंह घुमाया और घर को चल दिए, हर क़दम अपना भी एक तहरीक था.... :: #उर्मिलामाधव, :: तस्दीक---- सत्यपन.. तज़हीक----हंसी उड़ाना तहरीक-----आंदोलन.

सादगी का

इबादत का,वफ़ा का दोस्ती का, कोई झोंका तो आये ताज़गी का, कहाँ जाऊं किसे देखूं,दहर में, कोई नक्शा नहीं है सादगी का, उर्मिला माधव...

तजरुबात हो गए

अच्छा हुआ कि हमको तर्जुबात हो गए, वरना गधों की शक्ल में क्या-क्या न पूछते... उर्मिला माधव... 21.3.2014...

वही आदमी हो तुम

कैसे शिनाख़्त हो के वही आदमी हो तुम, मैं जानती कहाँ हूँ तुम्हें,अजनबी हो तुम,

क्या–क्या निहां है मुझ में

क्या-क्या निहां है मुझमें ज़रा देखके बता, वक़्त-ए-गिराँ है मुझमें ,ज़रा देख के बता पैवंद से ढके हैं,बहुत ज़ख़्म और सुराग, अब भी निशाँ है मुझमें ज़रा देख के बता, उर्मिला माधव, 21.3.2016

सूटकेस ख़ाली है

अब मेरा सूटकेस ख़ाली है, तेरी हर याद जो हटाली है, वो जो चिठ्ठी थी इसके खीसे में, इस बरस होली में जला ली है, मुझको भाता नहीं है रंग-ए-गुलाल, इसलिए खाक़ बस उड़ा ली है, बेवफ़ा तुझको क्यूँ कहे कोई, मैंने तोहमत ये ख़ुद लगा ली है, दिल के कोने में एक बेढब सी, अपनी दुनियां अलग बसा ली है, उर्मिला माधव... 21.3.2016

हुनर पर आ गईं

जब हमारी खूबियां बढ़कर हुनर पर आ गईं, रंजिशें सारे ज़माने की उभर कर आ गईं, झूठ में माहिर थे जितने,तह तलक,घबरा गए, बात कहने की अदाएं, बन संवर कर आ गईं, उर्मिला माधव,

दरमियाँ मजबूरियां हैं

दरमियाँ मजबूरियां हैं, तुम बताओ क्या करूं? मेरी क़िस्मत में लिखा है, बस यूं ही देखा करूँ.. मेरे हाथों में नहीं कुछ, टूटती पतवार है बस, सोचती हूं मैं तेरे दामन को क्यों गीला करूं, दिल कभी करता है अपनी जिंदगी ही छोड़ दूँ , जितनी जल्दी हो सके इस दह्र से परदा करूं, तुमको छूने के लिए बेचैन हैं ये दिल जिगर सब, दश्त ओ दहशत में भटक कर तुमको ही सोचा करूं.. आपके रुखसार, ज़ुल्फ़ें दिलकशी है बे पनह, सब का सब मेरा है मेरा हक़ रहे, दावा करूं.. ज़िंदगी हद हद से बढ़कर घट रही है जानेमन  आख़री लम्हों में आख़िर क्यों तुम्हें रुसवा करूं.. उर्मिला माधव  इस क़दर रुखसार पर वो ज़ुल्फ़ का दीवानापन,

फ्री वर्स

आँधियों के वेग से प्रताड़ित होकर, वृक्ष अपनी डालियाँ कब बांधते हैं, कब स्वयं चिंतित हुआ है, पत्तियों का टूटना देखा है जिसने, फिर हरी कोंपल पनपती हैं वहीँ पर, धैर्य और ममता सतत हों संगिनी जब, #उर्मिलामाधव... 20.3.2015...

दिल संभल पाया नहीं

क्या किया जाता अगर ये दिल संभल पाया नहीं, रूह पर लिख्खा हुआ कुछ भी बदल पाया नहीं, टूट कर ये जिस्म-ओ-जां, लडखडाते रह गए, उसपे फिर ये दर्द -ए-दिल कुछ निकल पाया नहीं, Urmila MadhavMadhav 20.3.2016

अंधेरे उजाले

इन आँखों ने देखे अंधेरे-उजाले, मुझे अब सभी रंग लगते हैं काले, भले चांदनी नूर छलकाए अपना, दिए रु-ब-रु चाहे जितने जला ले, नहीं रंग दूजा कोई अब समझना, मिरी आंख तू चारागर को दिखा ले, ज़माने को देदी खुली जब इजाज़त, चला ले कोई तीर तू भी चला ले, तो अब मैंने रब से भी ये कह दिया है, के तू भी चला जा, न मेरी बला ले, उर्मिला माधव 21.3.2018

सब्र की लाश

है लाश मेरे सब्र की इसको उठाइये, गोया लिहाज़ कीजिये,वापस न जाइये, कितना तमाशा हो गया ,परदे में बैठ कर, छोटा सा काम कीजिये बाहर तो आइए, शिकवा करेगी किसलिए बरबादिये हयात, क्यों आप गुज़री बात का चरचा उठाइये, लाशा-ए-बे क़फ़न को सभी देखते हैं आज, कब तक यूं देखिएगा, जनाज़ा उठाइए... उर्मिला माधव

शिकायत कर पाओगे

तुम न शिकायत कर पाओगे, तुम इस दिल में रहते हो, लोग समझते रहते हैं, बस तुम महफ़िल में रहते हो, वक़्त मिला तो कभी तुम्हारे दर पर चलके आऊंगी, अपना घर बतलाना मुझको किस मंज़िल में रहते हो, लंबी दूरी, पर्दा दारी गफ़लत पैदा कर देती है, अपनी करनी आप सम्भालो किस मुश्किल में रहते हो.. उर्मिला माधव

आँखें कमाल करती हैं

उनकी आँखें कमाल करती हैं, दिल में कैसा वबाल करती हैं, पूरी दुनिया नशे में लगती है, इस क़दर वो निढाल करती हैं  कोई सूरत कहां है बचने की, ज़ख्म गर बाल बाल करती हैं 

दिल पे मत ले यार

दिल पै मत ले यार----- ----------------------- जो चाहो तरकीब निकालो, किसी तरह दिल को बहला लो, अगर कोई कन्या मिल जाए, उसको बातों से फुसला लो, भले शेर चाहे जिसका हो, अपने नाम से उसको डालो, फिर देखो तुम रंग इश्क़ का, जिसको चाहो उसे फंसा लो, जब तक चले चलाओ उसको, फिर दूजा रस्ता अपना लो , नए सिरे से क्रम दोहरा लो, अपनी ढपली आप बजालो... उर्मिला माधव... 19.3.2014...

चर्चा जुबां तलक

लाते नहीं हैं क़ुफ्र का चर्चा ज़ुबां तलक, मिलता नहीं था यार के दिल का निशां तलक, जज़्ब-ए-जुनूं में पूछते फिरते थे हाल हम, था होश तक नहीं,है मेरी हद कहाँ तलक, वहशत थी चश्म-ए-नम थी,दिल-ए-ख़ाकसार था, जाती ही कब थी मेरी सदा भी वहाँ तलक, उर्मिला माधव 

आते रहना

आते रहना, मैंने उसको जाते हुए कहा था, लेकिन वो जा रहा था, नहीं आने के क्रम में आभास तक न होने दिया, बस वो जा रहा था, जाते हुए हाथ हिला रहा था, बुद्धिमान दिखाई देते हुए, समझा रहा था,हमें हम मूर्ख हैं, निरंतर विष पीते हैं, कितनी आशाओं में जीते हैं, यही खेल है करतार का, जीत और हार का, हार गए थे हम,जाने वाले से, वो जो जाते हुए हाथ हिला रहा था, कभी नहीं आने के लिए... उर्मिला माधव

मुझको मतलब नहीं ज़माने से

मुझको मतलब नहीं ज़माने से, आज आने से कल के जाने से, तनहा रोते थे अश्क़ बारी थी, क्या मआनी है मुंह दिखाने से, जोड़ लो, तोड़ लो मिटा डालो, कुछ न हासिल है दिल लगाने से, झूट की इल्तिजा भी क्या सुननी, किसको कहता है वो बहाने से, अपना आपा ही हमको अच्छा है,  हो भी क्या ग़लतियां गिनाने से.. उर्मिला माधव 

कितना इतराओगे

बे-वजह जिस्म पे कितना इतराओगे, इतनी ख़ुद्दारी लेकर किधर जाओगे,  जिस्म किसका हुआ इस जहां में कहो, हम भी मर जायेंगे,तुम भी मर जाओगे, एक रक़्क़ासा बोली ये गिरते हुए, इब्न-ए-मरियम नहीं जो संवर जाओगे, रूह मरती नहीं जिस्म मर जाते हैं, जिस्म से आशिक़ी करके पछताओगे, इसका जुगराफिया जब बिगड़ता है तब, दो क़दम साथ इसके न चल पाओगे, उर्मिला माधव...

तुमको ख़बर नहीं है

तुमको ख़बर नहीं है कि टूटे कहां से हम, अंदाज़ा कोई है भी के रूठे कहां से हम? ख़ामोश रह के देखना उनके हज़ारों रंग, हमको बताएं आके कि झूटे कहां से हम, हम चल रहे थे उनके ही दामन को थाम कर, समझे तलक भी वो नकि छूटे कहां से हम.. उर्मिला माधव

रिश्ते तमाम होते हैं

अभी थोड़ी देर पहले मेरे शेर का जवाब ---- अपने अख़लाक पै नज़र ही नहीं  दाग़ लोगों के नाम होते हैं, जो हैं दिल से दिमाग़ से शातिर, उनको झुक के सलाम होते हैं.. इसका हासिल सिर्फ़ इतना है, गोकि रिश्ते तमाम होते हैं.... उर्मिला माधव... 16.3.2015

तुम इक चाँद हो

हमको लगता है कि तुम एक चाँद हो, चाँद ही तो दूर रहता है सनम से सच, कसम से, चांदनी आती है मेरे घर के दर तक, तुम कहीं आजाओ तो मर जाएँ धम से सच, कसम से, शर्म की पाजेब पांवों में है मेरे हो सके तो आके तुम मिल जाओ हमसे सच, कसम से, एक दिन दुनियां से हम उठ जायेंगे बस, बाद उसके रोओगे तुम दर्द-ओ-ग़म से सच कसम से, वो तुम्हारे आंसुओं से कम रहेगी, जो सहन में होगी बारिश,खूब,झम से सच कसम से, अब भी तुम आ जाओ अब भी वक़्त है, सांस रुक जायेगी इक दिन एकदम से सच,कसम से, उर्मिला माधव... 16.3.2016

अय मियां पागल हो

अय मियाँ,पागल हो ? या फिर ईद है ? दुश्मनों से क्यूँ .......तुम्हें उम्मीद है ? तुमने खुशियों में भी की है ताज़ियत, गलतियाँ समझो तुम्हें......ताक़ीद है.... उर्मिला माधव... 4.7.2016 .. ताज़ियत--- मिज़ाज पुरसी  ताक़ीद--- ज़रूरी

आगरे का ताजमहल और मैं बेटी वहां की

आगरे का ताजमहल और मैं बेटी वहां की, और गली कूचे वहां के, कुछ हसीं मंज़र वहां के, दौड़ कर मथुरा कभी तो दौड़ के लखनऊ कभी हाथ में कुछ रेवड़ी, जो ख़ास लखनऊ में बनी हाथ में कंचे लिए बचपन की वो यादें सभी थीं कड़ी ताक़ीद अम्मा की मगर भाती थी मन को प्यार करना सीख लो भाई बहन को कुछ समझ आया नहीं था भोले मन को क्योंकि अम्मा कह रही थीं इसलिए करना था सब कुछ पर लड़कपन वो कुलांचे मारता था, लड़कियों के खेल मुश्किल से ही खेले हाथ में मंजा,पतंगें,भाई का सामान लेकर, दौड़ कर जीने पै चढ़ना बेसबब दीदी से लड़ना सिर्फ़ अपनी ज़िद पै अड़ना और गली के बालकों संग ख़ूब गिल्ली और डंडे दुश्मनी या दोस्ती से कोई मतलब ही कहाँ था जम गए बस खेल देखा, क्या सबब,क्या था कहाँ था दोस्त कुछ थे आगरा के और कुछ थे लखनऊ के जब जहाँ मौक़ा मिला के बस वहीँ खुशियाँ सजालीं पर मेरी एक ख़ास गुईंयां वो मेरी बहना निराली वो अजब सा एक रंग था, हर समय बहना का संग था एक ज़ालिम रस्म है दुनियां की जो शादी कहाती हो गई बहना से दूरी मैं हुई तनहा अधूरी वो बहन जिसकी बिदाई पर बहुत गिरते थे आंसू औरतें सब कह रही थीं कोई बन्नी गाओ धांसू थाप ढोलक की सुना कर हौसला सब दे रहे थे औ...

तनहा रही है ज़िंदगी

भीड़ में चलते हुए तनहा रही है ज़िन्दगी, क्या बताएं कब कहाँ,क्या क्या रही है ज़िन्दगी, जाने कितनी मुश्किलों से,रु-ब-होते रहे, थक गए हैं अब क़दम,घबरा रही है ज़िन्दगी, एक मिटटी का दिया तूफ़ान से लड़ता रहा, बेखबर था क़ह्र से टकरा रही है जिन्दगीं, ये कभी ख्वाहिश न थी के भीड़ मेरे साथ हो, क्यूँ भला माज़ी को फिर दोहरा रही है ज़िन्दगी, दो क़दम आगे चले और एड़ियां कटने लगीं, इसके मानी,ज़िन्दगी को खा रही है ज़िन्दगी, भीड़ से तो बच गए अब क़ब्र ऑ तन्हाई है, ज़िंदगी को बे-वफ़ा ठहरा रही है ज़िन्दगी... उर्मिला माधव,

मर्हले बीमार कर गए

उफ़ ज़िन्दगी के मरहले बीमार कर गए, ऐसा लगा कि ग़म का परस्तार कर गए दामन में सिर्फ ख़ार है पैरों में आबले, रस्ता बहुत कठिन था मगर पार कर गए, कुछ आरज़ू थी कुछ थे इरादे बहुत बड़े, कुछ रास्ते के ग़म मुझे ख़ुद्दार कर गए, सब लोग क्या कहेंगे यही डर बहुत रहा, क्या-क्या सुनेंगे हम जो अगर हार कर गए, किसको अज़ीज़ होगी कहो ये अजल की राह, हम से ही सिर फिरे हैं जिगर वार कर गए ...  उर्मिला माधव ...

बनवारी चुंदरिया पे डारि गयौ रंग

मेरी माँ की रचना होली के ऊपर---- माँ याद आईं 😕 ----------------------------------- बनवारी चुन्दरिया पै डारि गयौ रंग, ऎसी मारी पिचकारी मैं तो देख भई दंग, कैसा नटखट अनोखा है तेरा नन्द लाल, बरजोरी कपोलन मले वो गुलाल, मैं तो जाके यशोदा से कहूं सारा हाल, बरजो मोहन कूँ,कैसो बिगरि गयौ ढंग, दीन बन श्याम सुन्दर से हंस कर कही, ज़रा रुकजा घनश्याम मैं हूँ भीगी भई, कर पकड़ कर कहे करके चितवन नई, नहीं जाने दूं आज होली खेलूँ तेरे संग,  ब्रज भूषण से लाखों करीं प्रार्थना, ऐसा ब्रज में खिलाड़ी न देखा सुना, रह गयी मौन मुंह से न कहते बना, गिरधारी ने आज सखी..खूब किया तंग..... चंदा देवी

दर्द दिल में हज़ार होते हैं

दर्द दिल में हज़ार होते हैं, हम ही को बार-बार होते हैं, आँख जब-जब भी डबडबाती है, दिलजलों में शुमार होते हैं.. तेरा मिलना भी ग़म का वाइस है, हर नफ़स तार-तार होते हैं, ख़ुद संभलते हैं,कुछ भी होता हो, दोस्त कब ग़म गुसार होते हैं, जब कभी ग़म शदीद होता है, हम ही हम सोगवार होते हैं.. उर्मिला माधव, 15.3.2017

हम अभी हैं

तुमने चाहा हम न हों पर हम अभी हैं, हमने चाहा ग़म न हों पर ग़म अभी हैं, जाने कब से अपनी थी बस इक तमन्ना, अब ये पलकें नम न हों पर नम अभी हैं, इक गुज़ारिश है हमारी धड़कनों की, बस हवाएं कम न हों पर कम अभी हैं... उर्मिला माधव

जिस घड़ी

जिस घड़ी हम फ़ैसला कर पाएंगे, आप को ख़ुद से जुदा कर जाएंगे, आपको ख़ुशियां मुबारक उम्र भर, चलते चलते ये दुआ कर जाएंगे, उर्मिला माधव 

फ़र्क़ क्या है

फ़र्क़ क्या है,दिल दुखाने दीजिये, ग़म,ख़ुशी,जो भी हो, आने दीजिये, आप जो हैं,बस हमेशा हों वही, उनको अपनी ज़िद निभाने दीजिये, आप अपनी हद में हों महदूद बस, वक़्त को ही आने-जाने दीजिये, ख़ुद पे जो तनक़ीद हो,सुनते रहें, सबको अपना मुंह थकाने दीजिये, मुद्दआ कोई भी हो बस चुप रहें, दूसरों को सर खपाने दीजिये, हो बहुत बर्दाश्त से ज़ियादः अगर, दिल को जबरन मुस्कराने दीजिये... क्यों उलझना,दुश्मनों से रायगाँ ? महफ़िलें उनको सजाने दीजिये, जो बेचारे अक़्ल से मजबूर हैं, उनको अपना मन लगाने दीजिये, उर्मिला माधव...

तनहा खड़ी रही

तनहा खड़ी रही मैं समन्दर के बीच में, तूफ़ान मुश्किलों के बवंडर के बीच में.. घर कह रहे थे सब जिसे वो घर कहां रहा  कुछ दूरियां थीं मेरे और अंदर के बीच में, बातों की शक़्ल हो गई यलगार की तरह, गोया कि जुरअतें हों सिकंदर के बीच में... उर्मिला माधव

तहज़ीब रक्खी ताक़ पर

अब यही हालात हैं,तहज़ीब रक्खी ताक़ पर, रंग में कालक मिलाई और घुमाया चाक़ पर  दिल में लाखों मैल लेकर,दिल मिलाने आगये, बे-हयाई का चलन है समझें हैं बेबाक़ पर.... अब वो रंगा-रंग जैसा होलियों का रंग कहाँ, रंग थे होली के गाढ़े,दिल बहुत शफ्फाक़,पर .... वो सुरीले फाग के रंग वो मुग़न्नी अब कहाँ, कौन है बाक़ी मुनक़्क़ीद,ख्वाहिशे,मुश्ताक़ पर, लोग जो जीते थे,ज़ात-ए-किब्रिया के वास्ते, जान दे जाते हैं आख़िर अब हुजूम-ए- शाक़ पर.... अब जुबां का बंद रखना,वक़्त को दरकार है, तज़किरा करना ही क्या अब,हालत-ए-नापाक़ पर, इस तरह दामन बचाना,शोहदों के हाथ से रंग तुम लगने न देना,"दिल्नशीं" पोशाक पर #उर्मिलामाधव  #followers  शाक़--- मुश्किल  मुनक़्क़ीद---कद्रदान  मुश्ताक़-----अभिलाषी,उत्सुक मुग़न्नी----- गायक

चाहत बहुत है

हमें दूर जाने की चाहत बहुत है, हमें सिर्फ़ रब तेरी रहमत बहुत है, ये ख़ामोश मायूसियों का है आलम, ख़राबे में लेकिन नदामत बहुत है,

मुहब्बत किसी से अगर हो ही जाए

शेर--- ---------- मुहब्बत किसीसे अगर हो ही जाए , वो बस हादसा है करामत नहीं है , जो दिल आगया ग़र तुम्हारा किसीपे , तो फिर एक दिन भी सलामत नहीं है , अभी तक तो एक घर भी ऐसा न देखा , जहां दिल पे लानत मलामत नहीं है , फकीरी की चादर अगर मुंह पे ढक ली , तो कुछ भी ,गुज़रना क़यामत नहीं है.. उर्मिला माधव 

दिल के कुछ कोने– नज़्म

दिल के कुछ कोने ऐसे हैं, जो बहुत...सलोने जैसे हैं, कुछ यादें बिलकुल ऐसी हैं, अब क्या बतलाऊं कैसी हैं, वो दामन बहुत सजीला था, मेरे अश्कों से.....गीला था, जो रूठ अगर वो गए कभी, लगते उदास तब फूल सभी, सब तार मिलन के टूट गए, अब जीवन भर को रूठ गए, उर्मिला माधव... १३.3.२०१४ ...

हम निरे अहसास से जूझा किए

हम निरे अहसास से जूझा किये दिन रात बस, आपने जारी रखे,....अपने मुकम्मल घात बस, अब्र भी कुछ आदतन बस बर्क बरसाया किया, जानो दिल तनहा रहे कुछ था भी तो हालात बस, हम कभी समझे नहीं क्यूँ कर हसद था आपको, तज़किरा करते रहे क्यूँ बात और बेबात बस आप भी जब दोस्ती के नाम पर धब्बा रहे , झूठ सच के बलबले थे गम की थी इफरात बस कम जगह पड़ने लगी तो होगया हलकान दिल, दम-ब-दम बढ़ती रही सैलाब की तादात बस, इन बलाओं से .....कभी बचना हमें आया नहीं, झोंकते ही रह गए हम अपने सब जज़्बात बस, उर्मिला माधव...

हम कहां ज़िन्दा बचे हैं

हम कहां ज़िंदा बचे हैं, आपके जाने के बाद,  ग़म का इक हिस्सा बने हैं  आपके जाने के बाद, कोई गर मिल जाये तो  हम मुस्कुरा लेते हैं बस, अश्क का दरया बने हैं  आपके जाने के बाद, उर्मिला माधव

ख़ुद ही पता हूं

मेरी ज़िंदगी का मैं ख़ुद ही पता हूँ, हक़ीक़त यही है कि मैं इक हवा हूँ, सितम मुझपे कोई भला क्या करेगा, मिरी सादगी की मैं ख़ुद ही सज़ा हूँ, मैं हाज़िर हूं, लेकिन सही ये नहीं है, मैं गुज़रे ज़माने का इक वाक़या हूँ, मुझे ज़िन्दगी से अजब बे हिसी है मैं मंज़िल से बिछड़ा हुआ रास्ता हूँ, उर्मिला माधव

हम बड़ों के सामने कम बोलते हैं

हम बड़ों के सामने कम बोलते हैं, गर ज़रूरत हो तभी हम बोलते हैं, अपनी जानिब से तो हम ख़ामोश हैं पर, जब अना पर आए, उस दम बोलते हैं उर्मिला माधव

एक चिलमन सरकती रही रात भर

एक चिलमन सरकती रही रात भर, आँख रह-रह के तकती रही रात भर, रात रानी की खुशबू में डूबा जिगर, सांस जिससे महकती रही रात भर, एक अन्देशा सताता रहा बस मुझे, ये पलक जो फड़कती रही रात भर, मेरी धड़कन ने मुझको परीशां रखा, हद से ज़ादा धडकती रही...रात भर, कोई आया-गया भी नहीं इस तरफ, रूह किसकी भटकती रही रात भर..... उर्मिला माधव... 13.3.2016

मंसूब हो जाएं

इबादत से अगरचे हम बहुत मंसूब होजाएं, तो लाज़िम है ज़माने की नज़र में ख़ूब हो जाएं, किसी दिल में क़दम रखना भी कार-ए-पुख्ता कारा है, ज़रा नज़र-ए-इनायत हो कि बस महबूब हो जाएं, हज़ारों जान से कुरबान होने पर भी क्या हासिल, मज़ा तो तब है जब हम दर्द के उस्लूब होजाएं, हम अब भी आज भी अपने जिगर में ताब रखते हैं, अगर जो ज़िद पे आजाएं तो बस मतलूब हो जाएं... उर्मिला माधव उस्लूब--- आचरण मतलूब---प्रेमी

दश्त जब हो ही गया

दश्त जब हो ही गया मेरा कलेजा क्या करूँ, वहशतें या हसरतें जो भी हैं लेजा, क्या करूँ , दिल हथेली पै रखा और साथ में इक ख़त दिया, कुछ नहीं बाकी बचा है क्यों ये भेजा, क्या करूँ, हर घड़ी हलकान रहना और न सोना रात भर, और जो तनहाई दी थी,वो भी है ,जा क्या करूँ, उर्मिला माधव... 12.3.2015..

जुदा होकर

न तोड़ लेते अगर दिल तो और क्या करते, वो जब भी सामने आया तो बस ख़ुदा होकर, वो जिसकी बज़्म में जा कर पनाह लेते थे, बहुत उदास हुआ,उससे दिल जुदा हो कर, उर्मिला माधव 12.3.2018

वो अयादत को जो आए

वो अयादत को जो आए क्या मेहरबानी हुई, उनके क़दमों में झुकी जो मेरी पेशानी हुई, यूं मुसलसल डूबती जाती थीं साँसें दम-ब-दम, यक़-ब-यक़ देखा उन्हें तो हमको हैरानी हुई, अपनी ना-उम्मीदगी से पूछते थे हम सवाल, रहग़ुज़र वो भूल बैठे या कि नादानी हुई?? ......उर्मिला माधव.. अयादत----बीमार का हाल पूछना. 11.3.2013

ज़माने हो गए

इस क़दर गम के निशाने होगए, वक़्त से पहले.....सयाने होगए, हम थे,गम था,और थीं तन्हाइयां, इस तरह कितने ज़माने होगये, ऐसा लगता है क़फ़स है रात दिन, किस तरह के आशियाने होगये, उर्मिला माधव .... 11.3.2014...

जुदा करके

Jism-jaan-rooh sab juda karke, So gaye rasm sab adaa karke, Bojh tha sar pe kuchh khayalo ka, Neend tooti,khuda-khuda karke, Jii chura ke chal diye asbab-e-jism, Thak gaye ham bhi ibteda karke, Bebasi jab meri shadiid huyi Ro pada mujhko,gamzada karke, Waqt-e-rukhsat the khaali hath mire Khush hua mujhko wo gada karke,

फ़्री वर्स

भूत को वर्तमान नहीं किया जा सकता, दोहराया जा सकता है अनुकरण इतिहास दोहरा देगा, बंधु, अनुकरण हो, अपनी भावनाओं का, जागृति पैदा हो, जन जीवन निर्मल हो, पुनरावृति उचित नहीं, भूतकाल यदि पीड़ामय है, नीरवता, मन की है, हम स्वयं को छलते हैं, गर्वोक्तियों को जन्म देता है, स्वयम में रहना, भूत को दोहराना नहीं, यदि सुखद नहीं, उर्मिला माधव 11.3.2018

ज़ख़्म धोती रही

जाने क्या-क्या मैं दर्द ढोती रही, उम्र भर अश्क बार होती रही, ख़ार करते थे बस क़दमबोसी, ख़ून से रह्गुज़र भिगोती रही, आह-ओ-नाले थे,इक धुंआ सा था. जिसमें हसरत ग़ुबार होती रही, जानेअब तक भी कैसे जिंदा हूँ, क्यूंकि मैं ज़ख्म ही संजोती रही, एक छोटा सा ख़ुश्क बादल था, उसकी बारिश में दाग़ धोती रही, मैंने सजदे किये मुहाफ़िज़ को, हाज़िरी दर्ज फिर भी होती रही, किस ज़बां से करूँ मैं शुकराना, रह-ए-ख़ालिक को भूल,सोती रही... उर्मिला माधव...

फ़क़त रेशम सी गांठें थीं

हमारी डायरी से---- फ़क़त रेशम सी गांठें थीं...ज़रा सी खोल ली जातीं, जो बातें दिल को चुभती थीं,जुबां से बोल लीं जातीं, अगरचे खौफ़ इतना था...कोई दिल पर न लेजाये, कहीं कहने से पहले एहतियातन...तोल ली जातीं, मुहब्बत को सलीके से....निभाना ही नहीं था तब, ज़रुरत क्या थी ऐसी मुश्किलें खुद मोल ली जातीं, फरेब-ओ-मख्र में,फंसना,फंसाना शौक था जिनका, दरीचे झाँकने को तब.........ज़मीनें गोल ली जातीं, किसीका क़त्ल करने को...हुनर की क्या ज़रुरत थी, कि बस हाथों की तलवारें....ज़हर में घोल ली जातीं... #उर्मिला माधव... 27.2.2015...

इतने ज़्यादा घबराते तो

इतने ज़्यादः घबराते तो,डर कर गुज़र गए होते, ख़ुद अपनी ही पाक़ नज़र से,कबके उतर गए होते, इसका-उसका हाथ मांगते,कोई राह गुजरने को, इनकारों की साज़िश से हम,कितने बिखर गए होते.. उर्मिला माधव..

एक मुद्दत हुई है सोये हुए

एक मुद्दत हुई है सोये हुए, यूं ही बैठे हुए हैं खोये हुए, लोग मिलते ही पूछ देते हैं, आप लगते हैं ख़ूब रोए हुए, आप शिकवा फ़िज़ूल करते हैं, जिस्म के दाग़ तो हैं धोये हुए, उर्मिला माधव 

अब रास्ते हमारे

अब रास्ते हमारे आसान हो गए है, हर बात हर बला से अंजान हो गए, रोया किये शबो-ओ-शब जिन हसरतों की ख़ातिर, कुछ यक़-ब-यक़ लगा हम नादान हो गए हैं, ता ज़िंदग़ी सम्हाला,जिन चाहतों को हमने, सब सिलसिले वहाँ के वीरान हो गए हैं, पर ये ज़माने वाले जाने क्यूँ हँस रहे हैं, मेरी नज़र में ये सब बे-ईमान होगए हैं।। उर्मिला माधव. 9.3.2013

झूटों के शिखर

हम भी झूठों के शिख़र होलेंगे, इतनी शिद्दत से झूठ बोलेंगे, खुलके हँस देंगे हम हँसी झूठी, होंगे तनहा तो ख़ूब रो लेंगे, दिलके ज़ख़्मों को हवा देदे कर, चश्म-ए-गिरियाँ भी ख़ूब धो लेंगे।।... .उर्मिला माधव. 9.3.2013

वक़्त ज़ाया करी

यार ये क्या कि यूँ वक़्त ज़ाया करो, तुम मुहब्बत भी थोड़ी कमाया करो, पूरी दुनिया में फिरते हो.....मारे हुए, चलते-फिरते इधर को भी आया करो  आओ बैठो ज़रा दिल की बातें करो, आधे रस्ते से मत लौट जाया करो, अपने लफ़्ज़ों में पैदा करो तो असर, कहते-कहते न तुम भूल जाया करो, कितनी पहचान रखते हो इंसान की  हर किसी को नहीं गम सुनाया करो  उर्मिला माधव... 9.3.2014..

अगर ये वक़्त कभी हमसे डर गया होता

एक मतला दो शेर----- अगर ये वक़्त कभी हम से डर गया होता, ये समझो ज़ोर-ओ-ज़बर ग़म भी मर गया होता, सदा-ए-रंज-ओ अलम, हमसे डर गई होती, बहार-ओ-गुल का चमन रक्स कर गया होता, अगर वफ़ा की नज़र,हमसे मिल गई होती,  पुराना ज़ख्म-ए-जिगर कबका भर गया होता, #उर्मिलामाधव ... 9.3.2015...

तार दिल के न छेड़ो

तार दिल के न छेड़ो,बिखर जाऊंगी, हादसों से थकी हूँ ....मैं मर जाऊंगी, गो कि जिसने है बख्शी मुहब्बत मुझे नाम उसके .ये अशआर कर जाऊंगी.. अय मुसव्विर मुझे फिर से तैयार कर, यूँ मैं आधी,अधूरी .....न घर जाऊंगी, तुझसे उम्मीद रखती हूं आक़ा बहुत, तू खरा तो उतर वरना डर जाऊंगी, ज़िन्दगी,मौत .....यकसां हैं मेरे लिए, या इधर जाऊंगी ...या उधर जाऊंगी.. उर्मिला माधव.. 93.2017

विचित्र किन्तु सत्य

विचित्र किन्तु सत्य  🙂🙂🙂🙂🙂... अपनी हैसियत से बढ़कर काम करने के क्या नतीजे हो सकते हैं ये आज जाना ,जबकि तबियत भी अच्छी ख़ासी नासाज़ है------ घर में एक आलमारी खिसकाने की पुरज़ोर कोशिश की लेकिन उसको तो हिलना ही नहीं था अगर हिली भी तो ग़लत जगह पर आगई,फिर वापस उधर नहीं गई ,बेचारी मेड मेरा मुंह देख रही थी क्यूंकि वो मना करती रही लेकिन हम क्यूँ मानने वाले थे,उस्तादी जो सर पर सवार थी,पिछले कई जन्मों में जो अलग-अलग नानियाँ रही होंगी सब याद आ रही हैं...क्या करें ओवर कोनफीडेंस जो था अपने बाहु बल पर .....अब क्या करें ??? :( --- तो बोलो सा रा रा रा .........

क्यूं ये दिल में अजब उदासी है

एक ग़ज़ल हाज़िर है ... क्यूँ ये दिल में अजब उदासी है? मुझमें हिम्मत तो अच्छी ख़ासी है, कैसे शिद्दत में कुछ कमी आई ? रूह तो अब तलक भी प्यासी है, ख़ूब लंबी है ज़िन्दगानी भी, लोग कहते हैं ये ज़रा सी है, एक अरसा है,एक लम्हा भी, इसकी बस बानगी हवा सी है, राह क्या देखना मसर्रत की? गो के सदियों से ग़म शनासी है.... उर्मिला माधव। ..... 9 .3 .2017

सूटकेस ख़ाली है

मेरा अब सूटकेस ख़ाली है, तेरी हर याद जो हटाली है, वो जो चिठ्ठी थी इसके खीसे में, इस बरस होली में जला ली है, मुझको भाता नहीं है रंग-ए-गुलाल, इसलिए खाक़ बस उड़ा ली है, ग़म से तन्हाइयों से क्या डरना, इनके संग बज़्म ही सजा ली है, मैंने दुनियां का दिल नहीं तोड़ा, यूँ भी हर शख़्स की दुआ ली है, बेवफ़ा तुझको क्यूँ कहे कोई, मैंने तोहमत ये ख़ुद लगा ली है, दिल के कोने में एक बेढब सी, अपनी दुनियां अलग बसा ली है, उर्मिला माधव... 21 .3 .2016

गुफ़्तगू के दरमियाँ

गुफ्तगू के दरमियां कल इक अजब किस्सा हुआ, नींव का पथ्थर लगा हमको बहुत खिसका हुआ, कशमकश में घूमते हम रह गए दीवानावार, रात भर हमने समेटा जब यकीं बिखरा हुआ, ज़िन्दगी भर के तजरिबे हर नफ़स हावी हुए, याद हम करते रहे तक़दीर का लिख्खा हुआ, लफ़्ज़ कुछ उसने कहे अपनी जुबां से यक़-ब-यक़, होश में था ही कहां उसका ज़ेहन बहका हुआ, अब यही बस देखना है, किस तरफ को रुख करें, कह गया हमसे बहुत कुछ कारवां छूटा हुआ, लौट कर हम आ गए अपने दर-ओ-दीवार में, दह्र के बाज़ार में जब दिल बहुत सस्ता हुआ, उर्मिला माधव

उठाइए

है लाश मेरे सब्र की इसको उठाइये, गोया लिहाज़ कीजिये,वापस न जाइये, कितना तमाशा हो गया ,परदे में बैठ कर, छोटा सा काम कीजिये बाहर को आइए, शिकवा करेगी किसलिए बरबादिये हयात, क्यों आप गुज़री बात का चरचा उठाइये, लाशा-ए-बे क़फ़न को सभी देखते हैं आज,

मान जा

उम्र भर रूठा रहा है एक पल को मान जा,  कुछ न कुछ तो चाहिए है,मुस्कुराने के लिए,  रूठ जाने से हमारा दम निकल गर जाएगा,  कौन फिर आएगा तुझसे दिल लगाने के लिए,  यूँ तो होंगे हम हमेशा ज़िन्दगी के बाद भी,  कुछ नहीं होगा मगर फिर आजमाने के लिए,  तेरी आमद के लिए चल जान ही कुर्बान है,  कब्र पर तो आएगा चादर चढाने के लिए,  वो समां मदफन का होगा ये समझ ले बे-खबर,  तुझको रोना भी पड़ेगा,मुंह दिखाने के लिए...  कर चरागाँ क़ब्र को या मार ठोकर लौट जा,  कोई तो आ जाएगा शम्मा जलाने के लिए ....  #उर्मिलामाधव...

ऐसी नज़रों के परस्तार हुए

ऐसी नज़रों के परस्तार हुए, जिस्मों जाँ दोनों तार-तार हुए, आज दिल ये सवाल करता है, बे सबब ऐसे क्यूँ निसार हुए, फूल बन कर क़रीब आए थे, दूर जाके वो कैसे ख़ार हुए, लोग कहते हैं तजुर्बा अक्सर, नादाँ दिल कब किसीके यार हुए।।  उर्मिला माधव.. 6.3.2013

दिल के हालात हम छुपाते हैं

सखि सीमा अग्रवाल जी की बढ़िया हिस्से दारी---- =========================== दिल के हालात हम छुपाते हैं, इसलिए खुल के मुस्कुराते हैं....उर्मिला माधव... दर्द-ए-गम ओढ़नी से ढकते हैं  घर के.....कोने में बैठ जाते हैं....उर्मिला माधव... उर्मिला माधव... 5.3.2014... खुल के कह दीजिये जो दिल में हो, गम को यूँ क्यों भला बढाते हैं,......सीमा अग्रवाल जी...  ख़ुद ही ख़ुद में कराह लेते है, बढ़के महफिल में हम न आते हैं....उर्मिला माधव...

बरसात क्या करे

गैरों की मिलकियत पे कोई बात क्या करे, वीरान रहगुज़र पे .......कोई रात क्या करे, सूरज निकल रहे हैं कई सम्त से हज़ार, पर तिश्नगी को लेके मुलाक़ात क्या करे, हमको सरापा आग ने जब ख़ाक कर दिया, ज़ख़्मों की ऐसी शक़्ल का बरसात क्या करे, उर्मिला माधव 

दिल को भाया तू जो मेरे

दिल को भाया तू जो मेरे तुझमें देखा डूब कर, इतनी कालक थी वहां पर,लौट आये,ऊब कर, तेरी दुनियां तेरे हाथों सौंप कर हम चल दिए, और तुझसे कह दिया जो जी में आये ख़ूब कर.... पीठ करदी तेरी जानिब,ज़ख्म आगे कर लिए, दिल को समझाया अना का रास्ता मंसूब कर, पहले भी तू बेवफ़ा था,आज भी वो शक़्ल है, ये तेरे दिल का शगल है,नित नया महबूब कर, ज़िंदगानी उम्र भर जद्दोजेहद का नाम है, साहिबे ईमान हो जा,प्यार को उस्लूब कर...  उर्मिला माधव 2.3.2016

ज़ब्त करना

ज़ब्त करना अगर मुहाल हुआ, हां मगर तोड़ कर मलाल हुआ, ख़ुद ही सकते में आ गए हम भी, इतनी ऊंचाई पर ज़वाल हुआ, उर्मिला माधव  मर तो सकते थे पर अजब है ये, ख़ून ही दिल का पर हलाल हुआ रंग दुनिया का सर जमाल हुआ.. उर्मिला माधव 

गुनाह कर बैठे

हाए ये क्या गुनाह कर बैठे? ख़ुद ही ख़ुद को तबाह कर बैठे, ज़ब्त से काम ले रहे थे हम, जाने क्यूँ एक आह कर बैठे, भूल कर भूल हो गई हमसे, तेरी चाहत की चाह कर बैठे, किस क़दर हमसे ये गुनाह हुआ, ग़लतियाँ बेहिसाब कर बैठे, कितनी चाहत थी हँसके जीने की, फिरभी मरने की राह कर बैठे, ज़िन्दग़ी दूर-दूर होती गई, मौत से जो सलाह कर बैठे।....उर्मिला माधव.. 5.3.2013

फिर भी

एक पल की नहीं ख़बर फिर भी हमको लगता नहीं है डर,फिर भी, दम ब दम इम्तिहान देते हुए, पूरा करना ही है सफ़र, फिर भी, दह्र इंसां की इक कसौटी है, उसपे टूटा हुआ हो घर फिर भी, यूं ही हँसके निबाह करना है, चाहे थक जाए ये नज़र फिर भी, हमसे लाखों गुनाह हो जाएं, बंद होता नहीं ये दर, फिर भी, उर्मिला माधव
उम्र भर तो सब्र का दामन संभाला, अब भला हम किसलिए शिकवा करेंगे, वो जो मेरी ज़ीस्त का हिस्सा नहीं है, उससे फिर हम राब्ता भी क्या करेंगे, रोज़ उसको हम तड़पता देखते हैं  देखते रहते हैं उसको हम तड़पते, कौनसा रास्ता भला हम वा करेंगे हम क़दम आगे बढ़ा कर 

ये दिल ढूंढता है

ये दिल ढूँढता है जगहा अजनबी सी, हवा अजनबी सी, फ़ज़ा अजनबी सी, कभी ज़िंदगी में ये दिन भी दिखाना, के हर सम्त इक अजनबी रंग लाना, ज़मीं अजनबी,आसमां अजनबी हो, कोई शख्स हो रु-ब-रु,अजनबी हो, लगे जिसकी हर इक अदा अजनबी सी, हवा अजनबी सी, फ़ज़ा अजनबी सी..... हथेली पे कुछ नाम हों अजनबी से, पढ़े ही न जाएँ,पढ़ें हम कहीं से, मिले जो बशर वो बशर,अजनबी हो, सुनो मुख़्तसर,कुल दह्र अजनबी हो, मिले दर्द-ए-दिल को दवा अजनबी सी, हवा अजनबी सी, फ़ज़ा अजनबी सी... उर्मिला माधव ... 4.3.2016...

ग़ैरों की मिल्कियत पे

एक मतला दो शेर --- गैरों की मिलकियत पे कोई बात क्या करे, वीरान रहगुज़र पे .......कोई रात क्या करे, सूरज निकल रहे हैं कई सम्त से हज़ार, पर तिश्नगी को लेके मुलाक़ात क्या करे, हमको सरापा आग ने जब ख़ाक कर दिया, ज़ख़्मों की ऐसी शक़्ल का बरसात क्या करे, उर्मिला माधव.. 4.3.2017

मानी कहां

इल्तिजा उसने मेरी मानी कहाँ, पर मिरे भी सब्र का सानी कहाँ, कांपती आवाज़ में रोका किये, उसने वो आवाज़ पहचानी कहाँ, सूखती है ये सरापा भीग कर,  इश्क़ की बुनियाद में पानी कहाँ, मैंने उसके हाल पर छोड़ा उसे, हो सकी तब कोई मनमानी कहाँ, उर्मिला माधव...

क्या करें

आपको हम चाह कर भी क्या करें, ज़िंदगी को और कुछ रुसवा करें? एक तो पहले ही परीशां हैं बहुत, आहें भर के तुमको बस देखा करें? चैन मिलना तो कभी मुमकिन नहीं, ज़िंदगी को दर ब दर ढूंढ करें?

बुरा लगता है

दम-ब दम ये सच है सर पै ग़ाज़ है, फिर भी दिल को बेख़ुदी पर नाज़ है, जा-ब-जा दर-दर भटक कर क्या करूँ, यूँ तो ख़ामोशी भी इक आवाज़ है, हैं निशाँ अश्कों के आरिज़ पर मिरे, इनमें कुछ गुस्ताख़ियों का राज़ है, तोड़ कर जो मुझको तोहफ़े में दिया, अब तलक हाथों में वो ही साज़ है, ग़म,तबस्सुम हैं मुकम्मल साथ में,   ज़िन्दगी का बस यही अंदाज़ है.....

जब उलझन हो दुनिया फीकी लगती है

जब उलझन हो दुनिया फीकी लगती है, हमको ये सब ख़ुद पर बीती लगती है, तुम कहते हो अच्छी है तो अच्छी होगी, लेकिन हम को उल्टी सीधी लगती है.. उर्मिला माधव

जद्दोजहद की ज़द में भी

जद्दोजहद की ज़द में भी तूफ़ान बन के उठ, ज़ेर ओ ज़बर की हद में भी उन्वान बन के उठ, अब वो समां है जिसमें कि आज़ाद हैं सभी, दुनिया की सारी रद में भी इंसान बन के उठ,

नज़्म

एक बार फिर--- ---------------- रात को रोज़ मुस्कुराती है, सहर होते ही रूठ जाती है, मेरे घर की मुँडेर पर आकर, शाम होते ही झिलमिलाती है, अपनी आदत के मुताबिक आकर, मेरी रातों को जगमगाती है, उसकी आमद से ऐसा लगता है, जैसे वो गीत गुनगुनाती है, अपने क़दमों की मीठी आहट से, मेरी यादों को छेड़ जाती है, दिल की ख़्वाहिश है मेरे साथ रहे, वो मगर फ़िर भी लौट जाती है, वो मेरा सब्र आज़माती है, मेरी हालत पै खिलखिलाती है, ऐसी ये चाँदनी है जो हरदम, ज़िन्दगानी से खेल जाती है, कोई जीता हो कोई मरता हो, वो यूँ ही रोज़ आती जाती है...... उर्मिला माधव.. 12.2.2013

दिल को भाया तू

दिल को भाया तू जो मेरे तुझमें देखा डूब कर, इतनी कालक थी वहां पर,लौट आये,ऊब कर, तेरी दुनियां तेरे हाथों सौंप कर हम चल दिए, और तुझसे कह दिया जो जी में आये ख़ूब कर.... पीठ करदी तेरी जानिब,ज़ख्म आगे कर लिए, दिल को समझाया अना का रास्ता मंसूब कर, पहले भी तू बेवफ़ा था,आज भी वो शक़्ल है, ये तेरे दिल का शगल है,नित नया महबूब कर, ज़िंदगानी उम्र भर जद्दोजेहद का नाम है, साहिबे ईमान हो जा,प्यार को उस्लूब कर...  उर्मिला माधव 2.3.2016

तुम तो कहते थे हम नहीं रोते

Tum to kahte the ham nahin rote, Fir ye aankhon me zalzala kya hai? Tumko gairon se kuchh nahin lena, Ab ye bolo ke masalaa kya hai ? Bas ke chalna hai chalte rahte hain,  Ilm ye kab hai, marhalaa kya hai? उर्मिला माधव 

ये कम नहीं है

जो ज़िन्दगी में सलामती है, ये कम नहीं है, के सांस अब तक भी चल रही है, ये कम नहीं है, हमारा ग़म से विसाल होगा हमारी किसमत, जहां की आंखों में बरहमी है ये कम नहीं है.. उर्मिला माधव

ज़िंदगी की तल्ख़ियों से इस क़दर बेज़ार हूं

ज़िन्दगी की तल्ख़ियों से इस क़दर बेज़ार हूँ, मारने-मरने की हद तक पुश्त-ओ-पा खूंखार हूँ, आये महफ़िल में चुकाने,आपसे बाक़ी हिसाब, आपको ख़ामा- ख़्याली है कि मैं ग़म-ख़्वार हूँ, वक़्त वो कुछ और था जब घर हमारा था कहीं, आओ इस्तक़बाल है कि अब महज़ इक दार हूँ, फैसला करने की नौबत है तो फिर क्या देर है,  हूँ मुक़ाबिल आपके शम्स-ओ-क़मर,तैयार हूँ, उर्मिला माधव...