यूं ही उल्टे रहो
यूं ही उल्टे रहो रुख़ से परदे को तुम,जाएं सदके नज़र दिल मचलता रहे होश हो जाएं ग़ुम दौर चलता रहे,बर्क़ गिरती रहे तूर जलता रहे, आओ हम तुम करें दोनों अहदे वफ़ा और बदल दें ज़माने की रफ़्तार को सुबह बदला करे शाम बदला करे हम न बदलें ज़माना बदलता रहे, तुम मेरे सामने आओ तो इस तरह तेरा परदा रहे मुझको दीदार हो पास चिलमन के बैठे रहें आप ही, हुस्न छन–छन के बाहर निकलता रहे, तुम मेरे सामने से गुज़रते रहो और छुप–छुप के मैं तुमको देखा करूँ तुम समझते रहो मुझको एक अजनबी, अजनबी राह मंज़िल की चलता रहे, जान जाने का सहबा को कुछ ग़म नहीं मैं ये समझूंगा के राज़े उल्फ़त ही है तेरी जानूं पे जिस दम रहे सर मेरा। चांद ढलता रहे दम निकलता रहे...