ख़ुद से मैं कितनी बार लड़ती हूं (नज़्म)
ख़ुद से मैं कितनी बार लड़ती हूं,
तब कहीं दूर तुमसे होती हूं,
तुम मगर क्या बताऊं, कैसे हो,
किस क़दर मुश्किलें बढ़ाते हो
कितने अरमान से बुलाते हो
रू ब रू दर्द बनके आते हो,
दिल की बुनियाद फिर हिलाते हो,
चोट पत्थर पे फिर लगाते हो,
मुझको बर्दाश्त फिर नहीं होता
वो जो मासूम जैसा चेहरा है,
मेरी आंखों का जिसपे पहरा है,
उसको फिर देखने को आती हूं
तुमको फिर हर तरह मनाती हूं
अबसे आगे उदास मत होना..
उर्मिला माधव
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