ज़माने को मैंने
उसे सिर्फ़ अपना बनाने को मैंने,
रखा ठोकरों पर ज़माने को मैंने,
मुहब्बत की राहें बुलाती रही पर,
मना कर दिया सब ज़माने को मैंने,
कभी भी ज़हन पे न ताले लगाए,
कि तौहीन उसकी बचाने को मैंने,
हमेशा ही परदों के पीछे रखा बस,
ख़ता कर दिया हर निशाने को मैंने..
कोई मेरे अंदाज़ कब पढ़ सका था,
अंधेरों में रख्खा ठिकाने को मैंने,
उर्मिला माधव
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