बनवारी चुंदरिया पे डारि गयौ रंग
मेरी माँ की रचना होली के ऊपर---- माँ याद आईं 😕
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बनवारी चुन्दरिया पै डारि गयौ रंग,
ऎसी मारी पिचकारी मैं तो देख भई दंग,
कैसा नटखट अनोखा है तेरा नन्द लाल,
बरजोरी कपोलन मले वो गुलाल,
मैं तो जाके यशोदा से कहूं सारा हाल,
बरजो मोहन कूँ,कैसो बिगरि गयौ ढंग,
दीन बन श्याम सुन्दर से हंस कर कही,
ज़रा रुकजा घनश्याम मैं हूँ भीगी भई,
कर पकड़ कर कहे करके चितवन नई,
नहीं जाने दूं आज होली खेलूँ तेरे संग,
ब्रज भूषण से लाखों करीं प्रार्थना,
ऐसा ब्रज में खिलाड़ी न देखा सुना,
रह गयी मौन मुंह से न कहते बना,
गिरधारी ने आज सखी..खूब किया तंग.....
चंदा देवी
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