दरमियाँ मजबूरियां हैं

दरमियाँ मजबूरियां हैं, तुम बताओ क्या करूं?
मेरी क़िस्मत में लिखा है, बस यूं ही देखा करूँ..

मेरे हाथों में नहीं कुछ, टूटती पतवार है बस,
सोचती हूं मैं तेरे दामन को क्यों गीला करूं,

दिल कभी करता है अपनी जिंदगी ही छोड़ दूँ ,
जितनी जल्दी हो सके इस दह्र से परदा करूं,

तुमको छूने के लिए बेचैन हैं ये दिल जिगर सब,
दश्त ओ दहशत में भटक कर तुमको ही सोचा करूं..

आपके रुखसार, ज़ुल्फ़ें दिलकशी है बे पनह,
सब का सब मेरा है मेरा हक़ रहे, दावा करूं..

ज़िंदगी हद हद से बढ़कर घट रही है जानेमन 
आख़री लम्हों में आख़िर क्यों तुम्हें रुसवा करूं..
उर्मिला माधव 
इस क़दर रुखसार पर वो ज़ुल्फ़ का दीवानापन,


Comments

Popular posts from this blog

गरां दिल पे गुज़रा है गुज़रा ज़माना

kab chal paoge