बरसात क्या करे
गैरों की मिलकियत पे कोई बात क्या करे,
वीरान रहगुज़र पे .......कोई रात क्या करे,
सूरज निकल रहे हैं कई सम्त से हज़ार,
पर तिश्नगी को लेके मुलाक़ात क्या करे,
हमको सरापा आग ने जब ख़ाक कर दिया,
ज़ख़्मों की ऐसी शक़्ल का बरसात क्या करे,
उर्मिला माधव
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