ज़िंदगी की तल्ख़ियों से इस क़दर बेज़ार हूं

ज़िन्दगी की तल्ख़ियों से इस क़दर बेज़ार हूँ,
मारने-मरने की हद तक पुश्त-ओ-पा खूंखार हूँ,

आये महफ़िल में चुकाने,आपसे बाक़ी हिसाब,
आपको ख़ामा- ख़्याली है कि मैं ग़म-ख़्वार हूँ,

वक़्त वो कुछ और था जब घर हमारा था कहीं,
आओ इस्तक़बाल है कि अब महज़ इक दार हूँ,

फैसला करने की नौबत है तो फिर क्या देर है, 
हूँ मुक़ाबिल आपके शम्स-ओ-क़मर,तैयार हूँ,
उर्मिला माधव...

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