गुनाह कर बैठे
हाए ये क्या गुनाह कर बैठे?
ख़ुद ही ख़ुद को तबाह कर बैठे,
ज़ब्त से काम ले रहे थे हम,
जाने क्यूँ एक आह कर बैठे,
भूल कर भूल हो गई हमसे,
तेरी चाहत की चाह कर बैठे,
किस क़दर हमसे ये गुनाह हुआ,
ग़लतियाँ बेहिसाब कर बैठे,
कितनी चाहत थी हँसके जीने की,
फिरभी मरने की राह कर बैठे,
ज़िन्दग़ी दूर-दूर होती गई,
मौत से जो सलाह कर बैठे।....उर्मिला माधव..
5.3.2013
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