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Showing posts from May, 2026

घर लूट ले गए

चुपके से आए,जान-ओ-जिगर लूट ले गए,  हमको बताया तक नहीं घर लूट ले गए , किसको बताएं हाल ऐसी बेबसी का उफ़,  जीना मुहाल,शाम-ओ-सहर लूट ले गए, जो मुन्तजिर रहें तो भला क्या रहें कहो,  हम उम्र भर चले वो सफ़र लूट ले गए,  ख़ामा खयालियों में रहे दोस्त सब के सब,  चर्चा हमारा था वो असर लूट ले गए, जो तर्ज़ कोई बन सकी तो काफ़िया गलत,  वो ज़िन्दगी बे-खौफ़-ओ-ख़तर लूट ले गए... उर्मिला माधव... 

नीरव जंगल

नीरव जंगल,नदी मौन है , कौन है? जो क्रंदन करता है? निष्ठा के दर्पण डोले हैं, किसके भाव कहाँ तोले हैं, मौन धरा है,मौन गगन है, दूर कहीं कोई स्वर उभरा है, आज बहुत बेचैन है धरती, बादल जो पानी बरसाए, जुगनूं का पहरा टल जाये, #उर्मिलामाधव... 25.5.2015

कल रात तुम कहां थे

मैं तुमको ढूंढती थी,कल रात तुम कहाँ थे? आँखों में दम नही था,जज़्बात बस रवां थे, कुछ हौसला बढाकर देखा जो आसमां को, महताब कह रहा था तुम उसके रहनुमां थे, रह-रह के बिजलियाँ सी,कौंधा करीं सहन में, बेताब जुगनुओं के अरमान सब जवां थे, एक अक्स चांदनी का पानी पै पड़ रहा था, ख़ामोश आँधियों के आसार सब निहाँ थे, क़ुदरत की दुश्मनी है,कितनी उधार रातें, सागर बता रहा था तुम उससे आशनां थे, काग़ज़ की नाव लेकर इस पार मैं खड़ी थी. आँखों की कोर नम थी,उस पार तुम वहां थे..... #उर्मिलामाधव.. 25.5.2015..

दुहाई दस्तार की

वो कि जिनको थी ज़रूरत प्यार की, क्यों दुहाई दे गए दस्तार की... तितलियों के रंग दिखला कर हमें, बस मिटाते हैं खिजालत हार की, हम से बढ़कर कौन जाना है उन्हें, दास्तां क्या है दिले बीमार की. बस अना के नाम पर ही मिट गए, दिल में लेकर हसरतें दीदार की. उर्मिला माधव

परदा किया कीजिये

थोड़ा परदा किया कीजिये, तौबा-तौबा हया कीजिये, हम हैं ख्वाहिश अगर आपकी, दिल पै दस्तक दिया कीजिये, हैं अदीबों की हम ज़ात में, कुछ क़दम हौसला कीजिये , लोग देंगे भी क्या आपको, हमसे ही इल्तिजा कीजिये, मुफ़्त बदनाम होने से क्या, हमको सजदा किया कीजिये, उम्र भर क्या है हमने किया, सबसे चर्चा किया कीजिये, हमने मुड़ के न देखा कभी, आप माने न क्या कीजिये, वक़्त का ये तकाज़ा है अब, अपनी इज़्ज़त बचा लीजिए.. सबकी इज़्ज़त किया कीजिये.. उर्मिला माधव... 24.5.2014..

दस्तार की

वो के जिनको थी ज़रूरत प्यार की, क्यों दुहाई दे गए दस्तार की... तितलियों के रंग दिखला कर हमें, बस .मिटाते हैं वो खजलत हार की, हम से बढ़कर कौन जाना है उन्हें, दास्तां क्या है दिले बीमार की. बस अना के नाम पर ही मिट गए, दिल में लेकर हसरतें दीदार की. उर्मिला माधव 24.5.2015

अपनों के सितम

अपनों के सितम देख के दिल रूठ गया है, बेहद सताया जा चुका दिल टूट गया है....  जिसकी तलब में आ गई हूँ तेरे दर तलक, उसके ही ज़ेरे पाँव ये दिल छूट गया है, उर्मिला माधव

त्राहिमाम

इक ज़रा परदा हटाया, मुंह से निकला त्राहिमाम, कारवां कुछ मुश्किलों का और अपना त्राहिमाम, अपने एहसासों की दुनिया, दूर सबसे लेगए, सोचते ही रह गए हम कैसे बचना त्राहिमाम, हमने इक रस्ता निकाला ओढ़कर ख़ामोशियाँ दिल भी करता कब तलक रोना बिलखना, त्राहिमाम, उर्मिला माधव

सिर्फ़ सूरत देखकर

फ़ैसले होते नहीं हैं, सिर्फ़ सूरत देख कर, दिल न जोड़ा जाए हरगिज़, ऐश ओ इशरत देख कर, बुत है, आदमक़द सही, तो पूजना क्यों कर उसे, कुछ न सोचा झुक गया बस अपनी चाहत देख कर, ग़ैर से वाबस्ता रहके, कौन रह पाया है ख़ुश, जो हमेशा ही मिला हो, ज़ाती हसरत देख कर, मुस्कुरा के आ गया तो दिल ही रौशन हो गया, हम पिघल के रह गए इक ख़ास सीरत देख कर, दिल कुशादा था हमारा, उसके जी की क्या ख़बर, सब समझने लग गए हम उसकी फ़ितरत देख कर, उर्मिला माधव

क्या बची आंखों में कुछ शर्मिंदगी है

क्या बची आँखों में कुछ शर्मिंदगी है? या अभी तक भी मुसलसल गंदगी है? आग दरिया में लगा कर क्या करोगे? जिसकी फितरत ही सरासर बंदगी है, दिल हमारा खूब दरिया है अभी तक, इसलिए महफ़ूज़ अपनी ज़िन्दगी है...... उर्मिला माधव... 13.10.2014..

रहगुज़र की तलाश में

यूँ ही हम भी घर से निकल पड़े, किसी रहगुज़र की तलाश में, कई मुश्किलें भी गुज़र गईं ,इसी इक सफ़र की तलाश में, मेरे ख़ुश्क होठों पे गर हंसी,कभी आई भी तो रुकी नहीं, तभी डगमगा के रुके क़दम किसी इक सहर की तलाश में, कभी एक शब भी न कट सकी, यूँ ही चुटकियों में गुज़ार दी, कभी वक़्त सारा गुज़र गया, किसी एक दर की तलाश में, उर्मिला माधव

मुहब्बत नहीं रही

दुनिया में किसी शै से मुहब्बत नहीं रही, हमको किसीके प्यार की आदत नहीं रही, आगे क़दम तो पीछे अदावत के जाल हैं, दिल से मिलें किसीसे भीे,चाहत नहीं रही, दिल के बहुत क़रीब थे जब वो बदल गए, मजबूरियां थी,दिल को अक़ीदत नहीं रही, फ़ेहरिस्त दोस्तों की नहीं याद अब हमें, हाँ अब किसी भी नाम से उल्फ़त नहीं रही, वो वक़्त कोई और था जब प्यार में थे हम  वो जोश वो जुनूं वो इबादत नहीं रही  बातें मज़ाहिया सी,ज़रा हंस के चुटकियाँ, लब-ए लवाब है के वो रंगत नहीं रही... उर्मिला माधव..

इनसान पर बनी है

चंद अशआर  नज़रें झुका के देखा जी जान पर बनी है  कहते भी नहीं बनता अरमान पर बनी है  एहसास मर रहे हैं तनहाइयों से घुटकर, इंसानियत की ज़द में इन्सान पर बनी है, चलना है ग़ैर मुमकिन इस राहे बेख़बर में, दुश्वारियाँ हैं इतनी, ईमान पर बनी है।। उर्मिला माधव..

सच्चा रोने लगता है

झूट के आगे सच्चा रोने लगता है, दिल ही दिल में ग़म भी ढोने लगता है, ख़ामोशी से बढ़ के जब ख़ामोशी हो, रफ़्ता-रफ़्ता सब्र भी खोने लगता है, जब्र कहीं पर हो तो फिर वो सब्र कहाँ, आंखों में बस अश्क़ पिरोने लगता है.. उर्मिला माधव

आदत नहीं है

मुझे तुमसे कोई शिकायत नहीं है, फ़क़त ज़ुल्म सहने की आदत नहीं है, ये दिल है तुम्हारा, जिसे चाहे देदो, मुझे इससे कोई बग़ावत नहीं है, मगर मैं भी दुनिया से बिल्कुल जुदा हूं, तुम्हें बाँट सकने की ताक़त नहीं है.. उर्मिला माधव

सनसनी है

वाद-ए सबा में देखो कुछ ऐसी सनसनी है, कहते भी नहीं बनता कि जान पर बनी है, एहसास मर रहे हैं तनहाइयों से घुटकर, इंसानियत की ज़द में इन्सान पर बनी है, चलना है ग़ैर मुमकिन इस राहे बेख़बर में, दुश्वारियाँ हैं इतनी, ईमान पर बनी है।। उर्मिला माधव.. 20.5.2013

मेरे हिस्से में तू ही आया था

जब खुदा ने दहर बनाया था, मेरे हिस्से में तू ही आया था, तेरी जो उम्र एक अमानत थी, वक़्त ने उसको लूट खाया था, उस पे उम्मीद भी तो क़ायम थी, गो कि हर रोज़ घर सजाया था, शाम ढलने को जब भी होती थी, माह-ओ-अख्तर को घर बुलाया था, मेरी आँखें खुली-खुली ही रहीं, तू न फिर लौट करके आया था, कैसे मुझको यक़ीन हो कह दो, मैंने पत्थर से दिल लगाया था, मुझसे दुनियाँ के लोग कहते हैं, तू ही तू मेरे दिल पै छाया था... #उर्मिलामाधव... 20.5.2015...

दुआएं हम अहद से

हम गुज़र जाते हैं इक जद्दोजहद से, जब किसी को देखते हैं, बेश हद से.... दायरों की फ़िक्र में होकर परीशां, मांगते हैं बस दुआएं हम अहद से... ------------------------------------------------ ham guzar jaate hain ik jaddojahad se, dekhte hain jab kisi ko .....besh had se.... daayron ki fiqr men hokar pareeshaan, maangte hain bas duaayen ham ahad se... Urmila Madhav... 20.5.2016 अहद---ईश्वर,ख़ुदा

सज़ा दे रही हूं मैं

कब से बुलंदियों को सज़ा दे रही हूं मैं, दिल को ग़लत जगह का पता दे रही हूँ मैं, सेहरा से रेत लेके,बनाया है पैराहन, तूफां को बिजलियों को सदा दे रही हूं मैं, दरकार ही नहीं है मुझे कोई ग़म गुसार, अब ख़ुद ही रहगुज़र को दगा दे रही हूँ मैं, चलती रही हूं कब से अबस रंज ओ गम के साथ, अफ़सुर्दगी में ग़म को हवा दे रही हूं मैं, ऐ ज़िन्दगी मैं तेरे तईं, सोचती हूँ अब, किस बदगुमां को अपनी वफ़ा दे रही हूं मैं, उर्मिला माधव.. 20.5.2017

नीद हमारी ख़्वाब हमारे

नींद हमारी,ख़्वाब हमारे, चेहरे के सब ताव हमारे, दिल,गुर्दा और बात जिगर की? ये मालो असबाब हमारे, फिर हम क्यूँ पामाल रहेंगे? क्यूँ कोई अन्दाज़ सहेंगे?? किसने तुम्हें बुलाया,और क्यूँ, बे मतलब ख्वाबों में आए? इस्तक़बाल कराके अपना, क्या-क्या ना अहसान जताए? और बेवफ़ा कहकर हमको  बे -मतलब इल्ज़ाम लगाए, क्यूँ हो हमें ज़रूरत उसकी, जो ख़ुशियों में आग लगाए?? उर्मिला माधव 19.5.2013

ब्यूटी की ग़ज़ल

मेरी भतीजी विजयश्री उपाध्याय की बहुत सुन्दर रचना... रुह पे भरपूर छाले हो गए हैं देख सारे रंग काले हो गए हैं।।।। जो हुआ अच्छा हुआ ,कहते रहे हम वक़्त के हम भी हवाले हो गए हैं।।। किस तरह मिल पायेगा भी रास्ता अब हर तरफ मकड़ी के जाले हो गए हैं।। कुछ गलत करते नहीं हैं जान के हम कोठरी में हाथ काले हो गए हैं।। क्या करें,जाएँ तो अब जाएँ कहाँ हम हम भी तो घर से निकाले हो गए हैं।। VijayShree Upadhyay... 19.5.2015...

भित्ति चित्र

भित्ति चित्रों से उकेरे शब्दअब कुछ, जिजीविषा भी छल रही है जब स्वयं को, जो सवेरे श्वांस में अब तक निहित थे, आ खड़े हैं बेधने अंतर अहम् को, दूर की अब दृष्टि धुंधलाने लगी है, और कब तक ढोयेंगे झूठे भरम को, #उर्मिलामाधव... 19.5.2015...

अहसास सारे मर गए

इसलिए अहसास सारे मर गए, ज़ख़्म ही कुछ काम ज़्यादा कर गए, रहगुज़र में साथ जो थे हमसफ़र, राह भर तो साथ थे फिर घर गए,.. उर्मिला माधव 

ज़हरीले नागों की तीर अंदाज़ी से

ज़हरीले नागों की तीर अंदाज़ी से, अच्छे-अच्छे बहक गए लफ्फाज़ी से, आसां नईं है खबरदार ख़ुद से होना, पीछे ही चलते सब इनकी राज़ी से,  इनकी ही फितरत के फंदे तगड़े हैं, लाख दुहाई दिलवा दो तुम क़ाज़ी से,  ऐसे भी इन्सान मगर कुछ होते हैं, जल्वे इनके कम नईं होते गाज़ी से, ऐसे दिल के सानी मुश्किल मिलते हैं, जिन्हें असर नईं होता शोशे बाज़ी से... उर्मिला माधव... 16.5.2014...

इजारा करते हैं

अब क्या बतलाएं दुनियां को,हम किसको इशारा करते हैं, हर रोज़ वो चल कर आते हैं, हर रोज़ इजारा करते हैं, घर दूर बहुत है,दूर सही,और मिलने से मजबूर सही, आवाज़ लगाई जब हमने,आते हैं,इजारा करते हैं रूपोश जिन्हें रख्खा हमने,वो आज तलक. रूपोश ही हैं, हर रोज़ वो चल कर आते हैं हर रोज़ इजारा करते हैं

दिल सखावत आपकी

तरही गज़ल... ************ उम्र भर को चाहता है,दिल सखावत आपकी ख़ास जो दरक़ार है वो बस इजाज़त आपकी, दिल बहुत मजबूत है पर इस तरह हरगिज़ नहीं, सर पै चढ़ कर बोलती है,जब अदावत आपकी, आप कब समझे कभी ये इश्क़ की बारीकियां, याद है हमको अभी तक हर शरारत आपकी, जब भी जी चाहा, किसी इलज़ाम से नहला दिया, सच के भी नज़दीक हो,जो हो शिकायत आपकी, आपने देखा ही कब है,ज़िन्दगी का रंग-ए-रुख़, जब ..उतर सकती है पल में ये हरारत आपकी.... #उर्मिलामाधव... 16.5.2015...

घबराना नईं सीखा

मुश्किल से घबराना हमने नईं सीखा, बेबस हो,मुरझाना हमने नईं सीखा, अपनी क़श्ती पार भंवर से कर लेंगे, लहरों से डर जाना हमने नईं सीखा, साज़िश की बदबू तो हमको आती है, लानत घर भिजवाना हमने नईं सीखा, मुख़ालफ़त भी अपनी ख़ातिर देखी है, डर कर पीठ घुमाना हमने नईं सीखा, दरवाज़ों पर इस्तक़बाल लिखा है जी, मजमा रोज़ लगाना हमने नईं सीखा... #उर्मिलामाधव...... 7.6.2014...

देख लूं क्या?

इक ज़रासा,रुख़ बदल कर देख लूं क्या, फिर तुम्हारे साथ चल कर देख लूं क्या? आंधियों का ज़ोर तो है मंज़िलों तक, फिर ज़रा गिर कर संम्भल कर देख लूँ क्या? ज़िंदगी का तो चलन हरदम वही है, फिर नए सांचे में ढल कर देख लूँ क्या ? छा गए आ कर अंधेरे रूह पर, फिर ज़रा ख़ुद से निकल कर देख लूँ क्या? उर्मिला माधव 

हम बहुत ही दंग हैं

हम बहुत ही दंग हैं, संसार सारा देख कर, देख तू धोखा न खाना, प्यार सारा देख कर, सत्य है ,एकांत है, मन क्लान्त है, कैसे कहें, अश्रु बूंदें मत गिराना, दुख हमारा देख कर, कष्ट अपरंपार थे पर दृढ़ रहे हम हर तरह, हम न रोयेंगे शपथ ली, मन को हारा देख कर मान रखने के लिए करते रहे अभिनव प्रयास, हम स्वयं किंचित न रोये, सर्वहारा देख कर उर्मिला माधव

सुबहो शाम होते हैं

हादसे सुब्ह-ओ-शाम होते हैं, रोज़ रिश्ते तमाम होते हैं, अपने अखलाक़ पे,नज़र ही नहीं, दाग़ लोगों के नाम होते हैं, जो भी चाहा जुबां से कह डाला, और तब क़त्ल-ए-आम होते हैं, ये जो मजमा लगाया करते हैं, इनके लफ़्ज़ों के दाम होते हैं, जो हैं दिल से दिमाग़ से शातिर,  उनको झुकके सलाम होते हैं, उर्मिला माधव...

ये नदी की धार या

ये नदी की धार ?.....या गहराइयां है? या के नाज़ुक वक़्त की अंगड़ाइयां है?, आँख है मानिंद मुर्दों के सरासर, कान के नज़दीक ही शहनाइयां है, ज़ह्र से नीले हैं आँखें,दिल जिगर तक, दह्र की नज़रों में ये रानाइयां हैं, दिल के दरवाज़े की टूटी चौखटों सी, ख़ूबतर अब जिस्म की आराइयां हैं, क्यूँ करें नाहक़ किसी से हम शिकायत, साथ जब अपने फ़क़त तन्हाईयाँ हैं.... #उर्मिलामाधव... 14.5.2015..

दूजा आएगा ही

एक जब बिछड़ा है,दूजा आएगा ही, और जो आया है वो भी जाएगा ही, मन न मैला कर मुसफिर, रास्ता है, एक दो ठोकर तो यूँ भी खायेगा ही, उठ भी जा होजा खड़ा पैरों पै अपने, चल, अँधेरा और भी गहराएगा ही, क्या मज़ाक ए हुस्न है इनसान का अब, साँस है जब तक, अबस इतरायेगा ही, भूलना खुद को ये फितरत है बशर की, कोई तो फिर रास्ता बतलायेगा ही #उर्मिलामाधव... 14.5.2015..।

तो मैं जानूं

डूबते सूरज की समझे नातवानी तो मैं जानूँ, और अपनी छोड़ दे ये हुक्मरानी तो मैं जानूँ बादशाहत के नशे में चल रहा है झूम कर तू, बिन नशे के जी ज़रा ये ज़िंदगानी तो मैं जानूँ, हो गए गद्दीनशीं तो मार दी दुनियां को ठोकर, सरहदों पर झोंक दे अपनी जवानी तो मैं जानूँ, ग़ैर मुल्कों में उड़ी हैं धज्जियाँ अपने वतन की, चिंदियों पर लिख कोई अच्छी कहानी तो मैं जानूँ ख़्वाब देना आसमां के,कौनसी खूबी है इसमें, दे ज़रा अपने वतन को कुछ निशानी तो मैं जानूँ, #उर्मिलामाधव... 14.5.2015...

तुम्हारे हाथ देखूँ, फ़्री वर्स

तुम्हारे हाथ देखूं? ओह लेकिन ये कहीँ ख़ाली नही, जो हज़ारों भाग्य रेखाएं जुडी हैं, ये तुम्हारे हाथ से पूरी हुई हैं, किसके दरवाज़े पै कितनी बिल्लियाँ हैं, किसकी छाती पर बरफ की सिल्लियां हैं, कौन बिन माँ के अकेला घूमता है, दोस्तों में कौन पी कर झूमता है, आज तक गोदी हरी किसकी नहीं है, कच्ची दीवारों के घर हैं, रात दिन इनमें नहीं बस दोपहर हैं, दोपहर होती हैं सूनी अनवरत ही , जो हरी होतीं तुम्हारी आहटों से , दहशतों से जो भरी होती हैं वरना, बस घिरी होती हैं अपनी चाहतों से, और भरी होती हैं ख़ासी राहतों से, तुम करो आबाद जाओ, है तुम्हारी ज़िम्मेदारी.. मेरे हक़ में छोड़ जाओ संबंधों की खींचा तानी.. ..... #उर्मिलामाधव... 14.5.2015

नमूदार हुए जाते हैं

ग़म नमूदार हुए जाते हैं, हम बहुत ख़्वार हुए जाते हैं, बर्क दुनियां पै गिर गई देखो, दर भी सब दार हुए जाते हैं, कांच का घर है तीरगी के तले, वक़्त की हार हुए जाते हैं, हाथ को हाथ सूझता ही नहीं. और क़दम बार हुए जाते हैं, कुछ सहारे हैं इन हवाओं के, जिससे बस पार हुए जाते हैं #उर्मिलामाधव... 14.5.2016

लौट कर आना कभी

जाने वाले लौट कर आना कभी, वो मुहब्बत फिर से दिखलाना कभी। मुझको ये दुनिया नहीं भाती है अब, अच्छी है ये तू ही समझाना कभी। बस तकल्लुफ़ के लिए मिलती हूँ मैं, जोड़ना किससे है कह जाना कभी। दिन गुज़र जाए है तुझ को सोच कर, कुछ न कहना चुप ही रह जाना कभी। लौट तो जाता है, पर आता तो है, साथ कब चलना है बतलाना कभी। उर्मिला माधव
वो तख़्त पर जो शख़्स था वो नशी रहा, नहीं रहा, दिलों में एक रोज़ भी मकी रहा, नहीं रहा गली गली ये हादिसे घड़ी घड़ी के वसवसे किसीको गली साँस का यकी रहा नहीं रहा नज़र से लोग गिर गए, ज़रा उरूज क्या मिला, जहां पे जिसका ज़र्फ़ था, वहीं रहा, नहीं रहा अहमद ख़लील ख़ान 

रेत पर मसकन

रेत पर मसकन बनाना है मुझे बस, अपने ख़्वाबों को सजाना है मुझे बस, तुम न बसने पाओगे इनमें कभी अब, क्यूँकि तुमसे दूर जाना है मुझे बस, मुझको न दरक़ार है कोई तवक्को, ख़ुद ब ख़ुद ही मुस्कुराना है मुझे बस, हाँ मैं तनहा हूँ मगर ग़ाफ़िल नहीं हूँ, हौसले से चलते जाना है मुझे बस, ना मलक अब खाए हरग़िज़,देखना है, इस तरह खिरमन बचाना है मुझे बस, हो रहे तूफ़ान दिल में चाहे जितना, दिल को ही मदफ़न बनाना है मुझे बस, दिल को ही मदफ़न बनाना है मुझे बस।.. Urmila Madhav. 13.5.2013.

तौहीन मत करना

मुहब्बत करने वालों की कभी तौहीन मत करना, दिलों की दास्तानों को कभी ग़मगीन मत करना, नशे में झूम कर गाती है दुनियाँ प्यार के नगमे, मुक़द्दस है नशा इसका इसे कोकीन मत करना, दिलों के टूट जाने पर न कुछ आवाज़ होती है, किसी टूटे हुए दिल पर कभी आमीन मत करना, मिटा देती हैं रिश्तों को ये चीमा गोईयाँ अक्सर, ऐहतियातन किसी रिश्ते को यूँ संगीन मत करना, जिसे दौलत से उल्फ़त हो रहे वो बादशा बेशक़,  मुहब्बत मामला दीगर,इसे मिस्कीन मत करना... उर्मिला माधव  मुक़द्दस--- पवित्र  दीगर--- अलग  मिस्कीन---poor कोकीन--- एक तरह का नशा चीमा गोईयाँ--- कमियां निकालना

फ्री वर्स

मैं सोचती हूँ,तुम सोचते हो,सब सोचते हैं, पर क्या सोचते हैं ? अभी तक तो सोचा नहीं देखते हैं, चलो और आगे तलक सोचते हैं, जब सोचना ही है तो सिर्फ सोचेंगे, करेंगे कुछ नहीं,सिर्फ सोचेंगे, तुम मेरे लिए सोचना और मैं कुछ और, कुछ और सोचने में जाता भी क्या है? न तो कुछ जाता है,और न ही कुछ आता है, सिर्फ एक फायदा है,विचारशील दिखने का, सिर्फ विचार शीलता,विचार नहीं, विचार तो जताने होंगे,बताने होंगे, रास्ता क्यूँ भटकना,हाथ पाँव क्यूँ पटकना? तैय्यारी से बैठना और विचार करना, सबसे अलग मुद्रा,सबसे अलग भाव भंगिमा, विचार शील मुद्रा,सोचते-सोचते थक जाना है, बिस्तर पर औंधे गिर जाना है, विचार अपना काम करेंगे, और मैं अपना,जैसे एक सपना, सोचने का क्रम जो निभाना है, सोचते ही जाना है,सोचते ही जाना है.... सोचते ही सोचते मर जाना है, सोच दूसरों को देकर जाना है... उर्मिला माधव... 13.5.2014...

नेज़े ही नेज़े हैं

एक यही बात तो रह-रहके दिल में आती है, नेज़े ही नेज़े हैं और एक मेरी छाती है, मेरी मजलूम सी ख्वाहिश का वली कोई नहीं, दिल के कहने को हर इक बात रही जाती है, यूँ भी सोचा के हवा से ही शुरू करते हैं, फिर ख़याल आया कहीं ऐसे कही जाती है? पासे ग़म ,रस्म-ए हया और हज़ारों मुश्किल, कैसे बतलाऊं ये आदत ही नहीं जाती है, मेरी बीनाई सभी दूर से तकती है फ़क़त, ग़म का दरिया है मेरी लाश बही जाती है...... 13.5.2015 #उर्मिलामाधव... नेज़े--- भाले मजलूम---अनाथ, पासे अदब--- अदब का लिहाज़, रस्मे हया---शर्म की रीति, बीनाई--- दृष्टि...

मेरा अपना आशियां आबाद है

@urmila_madhav मेरा अपना आशियाँ आबाद है मैं ही सदियों से बहुत वीरान हूँ, ये समझ कर भूल मत करना कभी, तुर्शी-ए-अहबाब से ...हलकान हूँ, लोग मिलते हैं तो हंस देती हूँ बस, पर किसी हरक़त से कब अनजान हूँ... उर्मिला माधव..

दिल दुखाया करो

हम तो कहते हैं दिल दुखाया करो  दो क़दम चल के रोज़ आया करो  तुम में जो कुछ भी है कलाकारी ख़ूब बढ़चढ़ के तुम जताया करो वरना फिर लोग कैसे समझें इसे, अय मियां हौसला दिखाया करो, यूं भी तूफान कुछ उठा ही नहीं, मुँह भला किस लिए छुपाया करो, तुम मुसलसल जवाब देते रहो ज़िंदगी इस तरह न ज़ाया करो उर्मिला माधव 

दिल्ली के कनॉट प्लेस के भिखारियों को देख कर

भीगी आँखें,दामन मैला और बहुत दुखियारे लोग,  गली-गली धक्के सब खाते फिरते मारे-मारे लोग, दिन बीता दामन फैलाते,रातों को,पुरज़ोर शराब,  लाल सुर्ख आँखें जब देखीं,होगए एक किनारे लोग, जिस्म झूलता पैरों पर ऑ वहशत तारी आँखों पै, गिर कर बिलकुल ढेर होगये,बेबस हारे-हारे लोग, मायूसी जब देखी इनकी पीर उठ गई दिल में खूब, खुदपै हमें रहम हो आया,निकले जब नाकारे लोग, ख़ुद को ही बर्बाद कर रहे,दुनिया के फटकारे लोग, ठोकर पै रखते दिल सबका,यही बहुत बेचारे लोग, उर्मिला माधव...

प्यारे समझ ले

आदमी है आदमी,प्यारे समझ ले, अय फ़रेब-ओ-ज़ीस्त के मारे,समझ ले, ज़िंदग़ी भी इक मुक़म्मल हादसा है, वक़्त के भी हैं कई धारे समझ ले, उर्मिला माधव 

आदत रही है

मेरे हिस्से दिल की शहादत रही है  कोई मेरे दिल को न हसरत रही है  सुकूँ उम्र भर ही तलाशा है दिल ने, बहुत खींचा तानी से नफ़रत रही है  किसी से कभी कोई ख़ाहिश न रख्खी, यही ज़िंदगी भर की कसरत रही है, कभी ज़िंदगी में बुलंदी कहां थी, सो बस हार जाने की आदत रही है.. बचाया है दामन हमेशा ही अपना, अदाओं से मुझको बग़ावत रही है, जहां जिसको मौक़ा मिला दिल दुखाया, मुझे कब किसी से शिकायत रही है.. उर्मिला माधव

वो दुनिया याद आती है

मुझे गुज़रे ज़माने की वो दुनिया याद आती है, कभी ज़ोरों से चिल्लाना, कभी बहना से लड़ जाना, कभी अम्मां से डर जाना, कभी बारिश से घबराना, कभी वो हंस के बल खाना, कभी रो रो के मर जाना, के बस इतना नहीं जाना, ज़रा बालों का सुलझाना, जो चुन्नी ओढ़ कर जाना, कहीं रस्ते में गिर जाना, बिना चुन्नी के घर आना, कलेजा धक् से कर जाना, तो फिर अम्मां से डर जाना, बगल वालों के घर जाना, बिना ही बात इतराना, पति के घर चले आना, जहाँ हर कोई अनजाना, अचानक सब समझ जाना ज़माने भर का ग़म खाना, पिता के घर का बिसराना, फिर आंसू आँख में आना, ज़माना फिर ज़माना है, मुझे गुज़रे ज़माने की वो दुनिया याद आती है..... उर्मिला माधव 

अक्स है

जाने वाले दिल पे तेरा अक्स है, रू ब रू मुल्के अदम का नक़्श है, देखते रहते हैं अब दुनिया के लोग, ज़िन्दगी बिस्मिल का जैसे रक्स है, मौसिक़ी अब मेरी नौहा ख्वानीयां,

मीरा दिवानी हो गई

एक ज़माने में कोई मीरा दिवानी हो गई, आइना कहने लगा लो फिर कहानी हो गई, इक ग़नीमत है कि आंखें ख़ुश्क सी रहने लगीं, वक़्त क्या बदला के सारी रुत विरानी हो गई, उर्मिला माधव

कितने ज़ख़्मों के नक्श बाक़ी हैं

कितने ज़ख़्मों के नक़्श बाकी हैं, किस तरह दिल कहीं दिखाएंगे?? बख़्श दो हमको ये गुज़ारिश है, और अब कितनी चोट खाएँगे?? दर्द होता है जब हवाओं से  कैसे तूफाँ से बचके आएँगे?? ये जो रूठी है आरज़ू हमसे कैसे अब इसको हम मनाएँगे..??? उर्मिला माधव

चटकते हुए रिश्ते...फ्री वर्स

चटकते हुए रिश्ते, दरकती हुई दिल की दीवारें, दिल की दीवारों में समाती हुई, आंखों की नमी, खोखला करती है बुनियाद को, बुनियादें बोलतीं नहीं, डोल जाती हैं, इमारतें कांपने लग जाती हैं, ढहती हुई सीमाएं, टूटती हुई परंपराएं, रेस्तरां की चमक से प्रभावित, नई पीढ़ियां क्या जानें  बुनियादों की गहराइयां, जो गहराइयों में डूबी जाती हैं, आभास नहीं होता,  क्या खोता जाता है, मर्म सोता जाता है फिर क्या बचा  यक्ष प्रश्न है, कोई उत्तर है? नहीं.... सिर्फ़ चुप्पी उर्मिला माधव

नज़्म पियें पहले तो पानी

उठकर प्रातःकाल पियें पहले तो पानी, अपने सुन्दर मुख से बोलें,मधुरी बानी, घर वालों संग बैठ,चाय की मारें चुस्की, नहीं करें कोई फ़िक़्र ज़रा भी इसकी-उसकी, खोलें कोई किताब ज़रा सा पढ़ भी लें कुछ बिला वज्ह की गपशप में है नहीं कोई सुख, अगर खेत हैं अपने तो फिर वहां भी जाऐं पिता कृषक हैं उनका भी कुछ हाथ बटाएं, घर में आकर घर वालों के पास बैठ लें, गैरों की बातों से बिलकुल ध्यान खेंच लें, इतना रख्खें व्यस्त स्वयम को थक जाने तक, बहुत ज़ोर से नींद आएगी ,घर आने तक... सिया वर राम चंद्र की जय... 😊😊😊😊😊 उर्मिला माधव, 10.5.2916

बबले की ग़ज़ल

Madhuvan Rishiraj ka kalaam. कब तलक गूंजेंगी ये चीखें तुम्हारे दार में  मंज़िलें कितनी जुड़ेंगी मौत की मीनार में  कब तलक होगा गुसल खूं से हमारे जिस्म का  कब तलक लाशें बिकेंगी गोश्त के बाज़ार में  कब तलक चलता रहेगा जश्न तेरी जीत का  कब तलक रोते रहेंगे इस तरफ सब हार में  कब तलक होगा रवाँ यूँ आपका ये कारवाँ  कब तलक जाएंगी जानें आपकी रफ़्तार में  कब तलक सासें हमारी यूँ खरीदी जाएंगी  कब तलक चर्चा रहेगा आपका अख़बार में  कब तलक चलता रहेगा मातमे मज़्लूमिअत  कब तलक गूंजेगी क़ातिल की हंसी दरबार में  -MR

ग़ुलामी ही छोड़ दी

वो इक नज़र कि हमेशा ग़ुलाम थे जिसके, वो छिन गई तो हमने ग़ुलामी ही छोड़ दी, उतने सह्ल कहाँ है भला इस जहां के लोग, हमने कोई भी दुनिया, बनानी ही छोड़ दी, वो आंख मुद गई तो वहीं वक़्त रुक गया, हमने वफ़ा की शमअ जलानी ही छोड़ दी, उर्मिला माधव, 10.5.2019

ख़ुद परस्ती

 ज़माना और इसकी ख़ुद परस्ती, मुख़्तसर,इनसान की औक़ात सस्ती,  हो अगर ख्वाहिश कहीं बाकी बकाया  बन तमाशाई जला के दिल की हस्ती, भूलजा सब हम पियाला हम निवाला, याद रख जिंदा दिली और फ़ाक़ा मस्ती,  उर्मिला माधव 

समंदर नहीं देखा होगा

मेरी आँखों का समंदर नहीं देखा होगा, खा कसम तूने ये मंज़र नहीं देखा होगा, चश्मे पुरनम जो बरसती है तेरे जाने पर, दूर से हाथ हिलाता है,अंदर नहीं देखा होगा, ग़ैर से मिलता है ओ खुश भी नज़र आता है, स्याह सीने में छुपा ख़ंजर नहीं देखा होगा, तुझको कहती हूँ,बरसने पै निरी बारिश भी, न हुआ सब्ज़ वो बंजर नहीं देखा होगा, रात दिन मुझको जो हलकान किये रहता है, रोज़ सीने में उमड़ता है बवंडर नहीं देखा होगा... #उर्मिलामाधव... 11.5.2015..

पारा पारा हो गया

अब्र कैसा पारा-पारा हो गया, आज ये मौसम हमारा हो गया, काली-काली आंधियों का रंग है, रौशनी को कुछ ख़सारा हो गया, बेसबब ही ख़ुश हुआ जाता है दिल, ग़म बेचारा ग़म का मारा हो गया, उर्मिला माधव 10.5.2018

अपना बताने वाले

Barmala hamko kbhi apana bataane waale, ho gae gair ke ik duniyan dikhaane waale.. Ham jahan par hain,wahan koii nahin aa saktaa, Rol bhi ab karne lage pardaa hataane waale, Urmila Madhav 

ज़िंदगी का आलम है

बस यही ज़िन्दगी का आलम है, जब भी देखो तो आँख पुरनम है, यूँ तो वो दिल में अब भी रहते हैं, फ़र्क़ इतना है,जुस्तजू कम है, या हैं अनजान रस्म-ए-उल्फत से, या नहीं दिल में कोई दम ख़म है, हाँ मुहब्बत है हमने कह तो।दिया, दिल में काबा है,आब-ए-जमजम है, उनके हिम्मत जिगर में है ही नहीं, फिर तो वो कुछ नही,यही गम है... #उर्मिलामाधव... 8.5.2015

फ़्रेम में ही ठीक हो

तस्वीर हो? फ्रेम में ही ठीक हो, बात करती हूँ रोज़ तुमसे मैं, तुम्हारा खामोश रहना सुकून देता है, जो भी कहती हूँ सिर्फ सुनते हो, यूँ भी तुम बोलते कहाँ हो कुछ, देखना और मुझ पै हंस देना, ये ही तो है आदत तुम्हारी बस, मुझको सालती है,ये आदत तुम्हारी, इसलिए तस्वीर अच्छी है, इससे मुझे कोई शिकायत नहीं होती, एक जानदार इंसान की बेजान तस्वीर, इसमें बस एक रंग ज़ाहिर है, जो तस्वीर लेने वाले ने किया होगा क़ैद, हाँ ये रंग अच्छा तो है, ख़ूब सूरत भी है, तुम्हारी तरह, इसकी आदत भी तुमसे मिलती है, तुम भी तो एकदम चुप हो ये भी चुप है, एक अंतर साफ है, तुमको मैं अपने पास नहीं रख सकती, ये मेरे पास ही रहती है, दीवार पर टांगती हूँ अपनी पसंद से, कुछ भी कहूँ,रो दूँ,गा दूँ,हंस दूँ, कुछ भी नहीं कहतीं, ये मुझ पर हंसती नहीं, मेरे साथ रोती भी नहीं, क्योंकि ये तस्वीर है तुम्हारी, तुम नही हो, और तुम.भी कहाँ हो, कहीं होंगे दफ़्तर में, गाड़ी में या चाय की किसी मेज़ पर, मुझे नहीं मालूम,इसको जानती हूँ ये मेरी है, मेरे पास है और रहेगी फ्रेम में ही अच्छी है, इसको छूना है,पोंछने के लिए, धूल नहीं जमने दूंगी इस पर, क्योंकि तस्वीर तुम्हारी...

ख़ून के रिश्ते

खून के रिश्ते जो मेरे नाम थे, ज़िन्दगी के वास्ते इल्ज़ाम थे, हक़ अदा करते रहे रुसवाई का, अश्क़ मेरे जा-ब-जा बदनाम थे, फासलों की बढ़ गयी रस्सा-कशी, जो तग़ाफ़ुल का लिए पैग़ाम थे, था मुहब्बत का जिन्हें दावा बहुत, मुश्किलों के वक़्त वो नाकाम थे, एक तिनका जो मिला सौग़ात में, कीमती था और उसी के दाम थे, आज उसके नाम से जिंदा हूँ मैं, जिसके छोटे हाथ छोटे ग़ाम थे... उर्मिला माधव... 1.4.2014...

एक नज़्म (कभी जो मुझसे कहे किसीने)

एक नज़्म... कभी जो मुझसे कहे किसी ने, वो लफ़्ज़ अब तक चुभे हुए हैं, कई तो ऐसे भी दर्द हैं जो, अना के लब पर रुके हुए हैं, कभी-कभी ये जी चाहता है, इसे बता दूं,उसे बता दूं, मगर ये अश्क़ों के बोझ मेरी, बरौनियों में छुपे हुए हैं, ये अश्क़ लेकर सरे ज़माना, में फिर रही हूं,मैं हंस रही हूं, वहीं कहीं पर, ग़मों की ज़द में, पड़ोसियों सी मैं बस रही हूं, अगर यही बस शिकस्ता दुनियां, जो दुश्मनों सी खड़ी हुई है, नसीब में है,क़रीब में है, के पीटती है लकीर दुनियां, मेरी नज़र में हकीर दुनियां, मेरे बराबर से चल रही है, हर इक क़दम पर उछल रही है, उछल रही है,मचल रही है, हवा से आगे निकल रही है, लो मुझको देखो,अकेली होकर, भी मेरी दुनियां संभल रही है, जहां का नक्शा बदल रही है, बदल रही है,बदल ही देगी... उर्मिला माधव. 8.5.2017

नज़्म कोरोना के वक़्त

नज़्म अजीब वहशत सी हो रही है, के घर के कोने झिझक रहे हैं, मुसीबतों के अलम खड़े हैं, सो अब ये कोने भी बच रहे हैं हमारी सूरत से ऊबते हैं, ये सोचते हैं हमारी बाबत, के घर के लोगों को क्या हुआ है, ये सब कभी भी कहीं न जाते, अजब है घर में पड़े हए हैं, खुली हवाएं कहाँ गई हैं, न कोई मेहमान आए घर में, ये सब जो आपस में हंस रहे हैं, मगर ये झूठी हंसी है सब की, हवाई चेहरों पे उड़ रही है, अजीब उलझन से लड़ रही है, दुआएं करता हर एक कोना, के ख़त्म हो जाए ये कॅरोना, उर्मिला माधव
यूं ही अपने ग़म को न आम कर, और ये ज़िंदगी न तमाम कर, न शुमार कर किसी ग़ैर को, तू कि ख़ुद के दिल को सलाम कर

मज़ार पर

पसे-मर्ग मेरे मज़ार पर जो दिया किसी ने जला दिया । उसे आह! दामन-ए-बाद ने सरेशाम ही से बुझा दिया ।। मुझे दफ़्न करना तू जिस घड़ी, तो ये उससे कहना कि ऐ परी, वो जो तेरा आशिक़-ए-ज़ार था, तह-ए-ख़ाक उसको दबा दिया । दम-ए-ग़ुस्ल से मेरे पेशतर उसे हमदमों ने ये सोचकर, कहीं जावे उसका दिल दहल, मेरी लाश पर से हटा दिया । मेरी आँख झपकी थी एक पल, मेरे दिल ने चाहा कि उसके चल, दिल-ए-बेक़रार ने ओ मियाँ! वहीं चुटकी लेके जगा दिया । मैंने दिल दिया, मैंने जान दी, मगर आह तूने न क़द्र की, किसी बात को जो कभी कहा, उसे चुटकियों से उड़ा दिया । बहादुर शाह ज़फ़र 
ज़हन और जिस्म दोनों हिल गए हैं, कहें क्या ज़ख़्म इतने मिल गए हैं,

विरासत है

उम्र भर जीतेजी जला जाए, येही इस दह्र की विरासत है... #उर्मिलामाधव.... 7.5.2015

जुदा उनसे होके

बहुत ग़मज़दा थे जुदा उनसे होके, गुज़रती थी हर इब्तेदा उनसे होके, मेरा इश्क़ था इन्तेहाई मुक़द्दस, नहीं रह सका अलविदा उनसे होके, बड़ी मिन्नतों से जिसे हमने भेजा लो रूठा सा निकला ख़ुदा उनसे होके कभी तंज गहरे,कभी जलते फिकरे, ज़हर भरके लाये गदा, उनसे होके, अजब वाक़या है,मुक़द्दर का देखो, सुकूं भी मिला,गुमशुदा उनसे होके, उर्मिला माधव 

अजनबी से लग रहे हैं

सब दोस्त मुझे अजनबी से लग रहे हैं, क्यों ? अब फैसले भी ख़ुदकुशी से लग रहे हैं, क्यों? जज़्बात जो कहे थे कभी मुझसे बरमला, अलफ़ाज़ सबके बरहमी से लग रहे हैं,क्यों, #उर्मिलामाधव.... 7.5.2015.. बरमला--- खुलेआम, बरहमी--- नाराजगी...

रंग देखो

दोस्ती में दुश्मनी का रंग देखो, रौशनी की आँधियों से जंग देखो, दोस्तों तुम बेवफा भरपूर रहकर, मेरी दुनियाँ का निराला ढंग देखो, छूटती साँसें हुयीं हैं आज काफ़िर, उम्र का भी दायरा अब तंग देखो, हर कोई तनहा गया है इस जहाँ से, जा नहीं सकता कोई भी संग देखो, देख कर हालत मेरी जो शादमां थे, आज वो सब रह गये हैं दंग देखो, उर्मिला माधव...

ठीक हो न सका

यही तो काम है जो मुझसे ठीक हो न सका, कोई भी मेरे जिगर के क़रीब हो न सका, ये दूरियां ही मुझे दूर तक चलाती रहीं, अजब मक़ाम था हरगिज़ नसीब हो न सका, मगर मैं फिर भी वहीं, बार-बार चलती रही, ये हौसला भी गजब था,ग़रीब हो न सका, हज़ार रंज थे,पुरख़ार मेरी दुनियां थी, मगर चे दर्द का क़तरा अतीक़ हो न सका, हज़ार शेर कहे और ग़ज़ल,रुबाई भी, ज़माना कहता रहा,दिल अदीब हो न सका... उर्मिला माधव अतीक़-आज़ाद

कांच के गिलास हटा दो

ये कांच के गिलास हटा दो, डर लगता है,टूट सकते हैं, कांच बिखर सकता है, चुभ जाएंगे टुकड़े, एक अनचाहा घाव हो सकता है, मुझे यहाँ काम करना है, कांच की चीजें जल्दी हटाओ, मेज़ साफ़ रखो  ऐसी चीजों से दूरी बनाये रखना ज़रूरी है, हटा दूँ? क्योंकि तुम्हें डर लगता है?, कितने कमज़ोर हो तुम !! कितनी बहादुर हूँ मैं, जिस कांच से तुम्हें डर लगता है, वो तुम्हारे नाम की चूड़ियों की शक्ल में, दिन-रात मेरी कलाइयों में रहता है, और इन कांच की चूड़ियों के साथ, सारे घर के काम,तुम्हारे खिलवाड़, बीच-बीच में टूट कर  कलाई में चुभ,जाती हैं, जानते हो ख़ून भी निकलता है, तुम्हारी माँ देखती हैं और कहती हैं, हाथ ख़ाली मत करना, वरना अशुभ भी हो सकता है, और तुमने भी तो कभी नहीं कहा, ये कांच की चूड़ियाँ उतार दो, मुझे डर लगता है कांच से, शायद तुम भी इन चूड़ियों से जो मेरी , कलाइयों को घाव देती रहती हैं, अपनी ज़िन्दगी से जोड़ कर देखते हो, खूब सूरत बताते हो, रंग बिरंगी हों या एक जैसे रंग की हों, तुम्हें बहुत भाती हैं, इनमें कांच नहीं दिखाई देता तुम्हें, तुम इनमें देखते हो अपने आप को, और मैं देखती हूँ मन ही मन  तुम्हारी ख़ास कमज़ोर...

गिला क्या है

कोई बताए हमें उनको अब गिला क्या है, रफ़ीक़ हैं वो अगर फिर ये मसअला क्या है, गुज़िश्ता रात को इक शम्मा बुझ गई यारो, धुंआं उठा ही नहीं,बज़्म में जला क्या है, ये दिल ने दावा किया है के हम न टूटेंगे, ये ना मुराद ही कहता है ये ख़ला क्या है, जो ठोकरों में कभी ख़ाक बन के रहते थे, जुनून-ए -इश्क़ को कहते हैं ये बला क्या है, फ़ज़ां में शोर पतंगों का ख़ूब बरपा रहा, कोई आया न गया,फिर ये सिलसिला क्या है, न कोई साग़र-ओ-मीना न कोई साक़ी है, अजब ख़ुमार है महफ़िल में फिर चला क्या है, उर्मिला माधव .. 5.5.2017

बड़े हैं तो

आप उहदे में कुछ बड़े हैं तो ? ख़ास मंज़िल पै ही खड़े हैं तो? गोया तकदीर के सिकंदर हों, पर भी सुरख़ाब के जड़े हैं तो ? हम न माने हैं,और न मानेंगे, अब अगर जिद पै ही अड़े हैं तो ? कैसे-कैसे गुनाहगारों से, उम्र भर हम भी जब लड़े हैं तो ? उर्मिला माधव

मुकम्मल कर दिया

ओहदा तुमने मुकम्मल कर दिया, फ़ासला हमने मुकम्मल कर दिया.... ज़िक्र छोटे और बड़े का तुम करो, सिलसिला हमने मुकम्मल कर दिया... दूरियां हमसे तो घटने से रहीं, जब गिला हमने मुकम्मल कर दिया... उर्मिला माधव...

ज़िंदगी दुश्वार हो गई

ये ज़िंदगी भी क्या कहें दुश्वार हो गई, हम देखते ही रह गए बस हार हो गई.. अपनी तरफ़ से दिल की बहुत कोशिशें रहीं, पर एक जैसी दिल्लगी हर बार हो गई.. जब जब भी हमने हाथ मिलाया हवा के साथ आंधी चली ऑ ज़िंदगी मिस्मार हो गई.. कोई समां नहीं था कभी यूं भी ख़ुशगवार इक रौशनी भी हसरते दीदार हो गई.. क्या जाने किसके वास्ते थीं, वुसअतें तमाम, इतने गमों से ज़िंदगी बेज़ार हो गई.. उर्मिला माधव

उम्र बढ़ती है

एक-एक दिन में उम्र बढ़ती है, ज़िन्दगी कितने सबक पढ़ती है, कौन जाना है इस करिश्मे को? क्यूँ ये बनती है,क्यूँ बिगड़ती है क्या अजब ख़ूबियाँ हैं क़ुदरत की? शाम ढलती है,सुबह चढ़ती है? जिस्म फ़ानी है और जहाँ फ़ानी, क्यूँ नई शक़्ल रोज़ गढ़ती है??... @highlight  #Urmilamadhav  उर्मिला माधव

श्रद्धा सुमन

ये मेरे श्रद्धा सुमन अर्पित हैं अपने आप को, सब तरह कठिनाइयों का सामना करते हुए, अपने जीवन को जिया बिन याचना करते हुए, एक सुखद संसार की बस कामना करते हुए, मुश्किलों की हर डगर पर साधना करते हुए, मैंने सम्मानित किया जीवन के हर अनुराग को ये मेरे श्रद्धा सुमन अर्पित हैं अपने आप को, :: :: घिर गए आँगन में जब भी पीर के बादल घनेरे अनवरत गहरे हुए जब यंत्रणाओं के अँधेरे, अपने जीवन चित्र घर की भित्तियों पर ही उकेरे, और प्रतीक्षा की,कभी तो आएंगे उजले सवेरे, :: :: अपनी आँखों में छुपा कर रख लिया संताप को, ये मेरे श्रद्धा सुमन अर्पित हैं अपने आप को,

लौट जाओ फ़्री वर्स

कौन समझाता तुम्हें जो तुम्हें करना नहीं था कर रहे हो जाओ तुम आज़ाद हो बस यहीं तक रास्ते मिलते थे अपने, मुझको लौटाना तुम्हारा काम था, क्या कहूँ पर ये समझने में मुझे सदियाँ लगी हैं तुम ज़माने के लिए हो,लौट जाओ.. सबके पाने के लिए हो लौट जाओ दिल दुखाने के लिए हो लौट जाओ हाँ मैं कहती हूँ तुम्हें तुम लौट जाओ यूँ भी तो अब मैं नहीं आउंगी तुम तक इसलिए अच्छा यही है लौट जाओ, लौट जाओ लौट जाओ... #उर्मिलामाधव 4.5.2016

फ्री वर्स

दिल है हमारा, बहुत छोटा जैसा, छोटा होना होगा तुम्हें, पास आने के लिए, ये बताओ, और क्या सुनना है तुमको? तुम्हारे दिल के अहाते में, जाने क्या-क्या भरा है, भीड़ है,जगह ख़ाली नहीं, बेहतर है लौट जाना ही, और देखो  लौट कर हम आगए, और उधर अब देख कर होगा भी क्या, तुम समेटो फूल चम्पा के महज़, तुम मगर अब कैक्टस लगने लगे हो, रेत रेगिस्तान की चेहरे पे है, जब कभी फुरसत मिले  तो झाड़ लेना, ये झुलसती रेत रेगिस्तान की... उर्मिला माधव, 4.5.2017

बचपन खा गए

सबसे पहले लोग हमारा बचपन खागए, थोड़े बड़े हुए तो खाई तरुणाई शब्द, किशोरी क्या होता है, क्या जानें, डरे हुए थे कभी नहीं ली अंगड़ाई, डांट सिर्फ़ खाते थे,अपनी सूरत पर भी, इसीलिए घर देखा, देखी अंगनाई, बहुत बचाया, हमको छोटे बालों ने, कांधों पर ये ज़ुल्फ़ कभी ना लहराई, अब बतलाओ इसके आगे क्या बाक़ी है, फ़िर भी आधी बात न हमने बतलाई उर्मिला माधव

सबसे पहले

सबसे पहले लोग हमारा बचपन खागए, थोड़े बड़े हुए तो खाई तरुणाई शब्द, किशोरी क्या होता है, क्या जानें, डरे हुए थे कभी नहीं ली अंगड़ाई, डांट सिर्फ़ खाते थे,अपनी सूरत पर भी, इसीलिए घर देखा, देखी अंगनाई, बहुत बचाया, हमको छोटे बालों ने, कांधों पर ये ज़ुल्फ़ कभी ना लहराई, अब बतलाओ इसके आगे क्या बाक़ी है, फ़िर भी आधी बात न हमने बतलाई उर्मिला माधव

इतना ज़्यादा घबराते तो

इतना ज़्यादा घबराते तो,डर कर गुज़र गए होते, ख़ुद अपनी ही पाक नज़र से कबके उतर गए होते इसका-उसका हाथ मांगते,कोई राह गुजरने को, इन्कारों की साज़िश से हम कैसे बिखर गए होते, इतनी लम्बी उम्र गुज़ारी,तलवारों की धारों पर, लफ़्फ़ाज़ों से डर जाते तो जाने किधर गए होते एक तरफ बंदूकें दन-दन,एक तरफ ज़हरीला,ग़म डरने की आदत गर होती ,कितने सिहर गए होते, हम साहिल पर खड़े रहे और सैलाबों ने खेल किये, गर हम अपना रंग दिखाते,कितने जिगर गए होते, उर्मिला माधव

बाज़ार में खड़ा बच्चा

बाज़ार में खड़ा बच्चा, बिकाऊ है, सवाल है, बिक गया क्या? कितना दाम लगा? देखो !! कमीना हो गया, बिक भी गया, और हमारा कोई हिस्सा नहीं 🙄 अरे कोई रिश्ता तो देखता, बदतमीज़... बिक भी चुका  और हमारे लिए कुछ न सोचा, अरे नहीं अभी बिका कहाँ, तब ठीक है, देखते हैं, हमें कितना याद रखेगा, वरना उसकी सात पुश्तों को अपमान के घूंट पिला देंगे, हद है, बिकेगा भी और हमें कुछ न समझे, तो चला जाए, जहां बाप गया..... मां तो ज़िंदा भी मुर्दा ही होती है उर्मिला माधव 2.5.2018

न घर था हमारा न दुनिया हमारी

न घर था हमारा न दुनियां हमारी, हक़ीक़त यही है के हम थे भिखारी, बड़ी हसरतों से इमारत बनाई, रही ज़िन्दगी भर बहुत मारा-मारी, मकां होंगे लेकिन मकीं ही न होंगे, रहेगी मुसलसल ही मर्दम शुमारी, नहीं सल्तनत न सलातीन होंगे, पड़े सबको जाना यहाँ बारी-बारी, हवा में ही उड़ते थे मग़रूर होकर, लो मरते ही मैय्यत हुई भारी-भारी, हुई जीत हासिल जिन्हें ज़िन्दगी भर, मगर मौत से ज़िन्दगी उन की हारी, ये ताज-ओ-क़ुतुब सब यही पर खड़े हैं फ़ना होगई बादशाहत बेचारी, उर्मिला माधव

दुनिया के संग मेले चलते हैं

दुनियां के संग मेले चलते हैं, अपने राम अकेले चलते हैं, ख़ास फ़कीरी मुझमें रहती है, सबके साथ झमेले चलते हैं, गिनती करते ही थक जाओगे, मीज़ानों के रेले चलते हैं, उर्मिला माधव

आँख के नीचे की काली झांइयां

आँख के नीचे की काली झाइयां, और सारी उम्र की तन्हाईयाँ   घेरती हैं अब सवालों से मुझे, आज गुज़रे वक़्त की परछाईयाँ, यूँ भी कहते ही नहीं बनता है कुछ,   जब ये मुझमें खोजें हैं रानाईयाँ, जो भी गुज़रा हो मगर इतना रहा, ज़िन्दगी ने नाप लीं गहराइयाँ , पाँव तो हर दम ज़मीं पर ही रहे  चश्म-ए-नम से देख लीं ऊँचाइयाँ, दिल मेरा अनहद कहीं सुनता रहा  दूर कुछ बजती रहीं शहनाइयाँ ---- #उर्मिलामाधव...

एक ग़म कुछ ऐसे चस्पां हो गया

एक ग़म कुछ ऐसे चस्पां हो गया, दिल का कोना कोना वीरां हो गया, सांस थमने पर भी हम ऐसे चले, जिस्म का हर ज़ख़्म हैरां हो गया, कोई भी मंजिल नज़र में थी ही कब, ग़म ही था सो फिर मेहरबां हो गया, उर्मिला माधव