तस्वीर हो? फ्रेम में ही ठीक हो, बात करती हूँ रोज़ तुमसे मैं, तुम्हारा खामोश रहना सुकून देता है, जो भी कहती हूँ सिर्फ सुनते हो, यूँ भी तुम बोलते कहाँ हो कुछ, देखना और मुझ पै हंस देना, ये ही तो है आदत तुम्हारी बस, मुझको सालती है,ये आदत तुम्हारी, इसलिए तस्वीर अच्छी है, इससे मुझे कोई शिकायत नहीं होती, एक जानदार इंसान की बेजान तस्वीर, इसमें बस एक रंग ज़ाहिर है, जो तस्वीर लेने वाले ने किया होगा क़ैद, हाँ ये रंग अच्छा तो है, ख़ूब सूरत भी है, तुम्हारी तरह, इसकी आदत भी तुमसे मिलती है, तुम भी तो एकदम चुप हो ये भी चुप है, एक अंतर साफ है, तुमको मैं अपने पास नहीं रख सकती, ये मेरे पास ही रहती है, दीवार पर टांगती हूँ अपनी पसंद से, कुछ भी कहूँ,रो दूँ,गा दूँ,हंस दूँ, कुछ भी नहीं कहतीं, ये मुझ पर हंसती नहीं, मेरे साथ रोती भी नहीं, क्योंकि ये तस्वीर है तुम्हारी, तुम नही हो, और तुम.भी कहाँ हो, कहीं होंगे दफ़्तर में, गाड़ी में या चाय की किसी मेज़ पर, मुझे नहीं मालूम,इसको जानती हूँ ये मेरी है, मेरे पास है और रहेगी फ्रेम में ही अच्छी है, इसको छूना है,पोंछने के लिए, धूल नहीं जमने दूंगी इस पर, क्योंकि तस्वीर तुम्हारी...