नज़्म
एक बार फिर---
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रात को रोज़ मुस्कुराती है,
सहर होते ही रूठ जाती है,
मेरे घर की मुँडेर पर आकर,
शाम होते ही झिलमिलाती है,
अपनी आदत के मुताबिक आकर,
मेरी रातों को जगमगाती है,
उसकी आमद से ऐसा लगता है,
जैसे वो गीत गुनगुनाती है,
अपने क़दमों की मीठी आहट से,
मेरी यादों को छेड़ जाती है,
दिल की ख़्वाहिश है मेरे साथ रहे,
वो मगर फ़िर भी लौट जाती है,
वो मेरा सब्र आज़माती है,
मेरी हालत पै खिलखिलाती है,
ऐसी ये चाँदनी है जो हरदम,
ज़िन्दगानी से खेल जाती है,
कोई जीता हो कोई मरता हो,
वो यूँ ही रोज़ आती जाती है......
उर्मिला माधव..
12.2.2013
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