ज़ख़्म धोती रही

जाने क्या-क्या मैं दर्द ढोती रही,
उम्र भर अश्क बार होती रही,

ख़ार करते थे बस क़दमबोसी,
ख़ून से रह्गुज़र भिगोती रही,

आह-ओ-नाले थे,इक धुंआ सा था.
जिसमें हसरत ग़ुबार होती रही,

जानेअब तक भी कैसे जिंदा हूँ,
क्यूंकि मैं ज़ख्म ही संजोती रही,

एक छोटा सा ख़ुश्क बादल था,
उसकी बारिश में दाग़ धोती रही,

मैंने सजदे किये मुहाफ़िज़ को,
हाज़िरी दर्ज फिर भी होती रही,

किस ज़बां से करूँ मैं शुकराना,
रह-ए-ख़ालिक को भूल,सोती रही...
उर्मिला माधव...

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