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Showing posts from April, 2026

रहे इश्क़ की अज़मतें बिक रही हैं

रहे इश्क़ की अज़मतें बिक रही हैं, अरे बे-ख़बर हसरतें बिक रही हैं, मुहब्बत के अब क़द्रदाँ ही कहाँ हैं फ़रेबों के दम अस्मतें बिक रही हैं, दरीचों में बैठी वफ़ा रो रही है, बड़ी शान से किस्मतें बिक रही हैं, ज़रायम नज़र से कहाँ तक बचेंगे मुहल्ले में अब जुरअतें बिक रही हैं.. .Urmila Madhav 1.5.2013

कठिन हैं

हर गाम इम्तिहां है,पर्चे बड़े कठिन हैं, कैसे बताऊँ बोलो,कितने गरीब दिन हैं... उर्मिला माधव... 1.5.2014...

ग़ैरों से उलझते हैं

संभलता दिल नहीं अपना,वो गैरों से उलझते हैं, न जाने क्यूँ उछलते हैं,न जाने क्यूँ किलकते हैं, तवज्जो ही नहीं देता कोई उनकी अदाओं पर, बहुत बेबाक़ लहजे में,न जाने क्या वो बकते हैं , रहम करदे ज़रा उन पर,मेरे परवरदिगारा तू, बहुत मजबूर बेचारे, तड़पते हैं,बिलखते हैं...... उर्मिला माधव... 1.5.2014...

रंग देखो

दोस्ती में दुश्मनी का रंग देखो, रौशनी की आँधियों से जंग देखो, दोस्तों तुम बेवफा भरपूर रहकर,  मेरी दुनियाँ का निराला ढंग देखो, छूटती साँसें हुयीं हैं आज काफ़िर, उम्र का भी दायरा अब तंग देखो, हर कोई तनहा गया है इस जहाँ से, जा नहीं सकता है कोई संग देखो, देख कर हालत मेरी जो शादमां थे, आज वो सब रह गये हैं दंग देखो, उर्मिला माधव... 1.5.2014...

दिग्भ्रमित है

आत्मा ही दिग्भ्रमित है,सत्य कैसे देख लोगे, स्वार्थ अंतर में निहित है,सत्य कैसे देख लोगे, दृष्टि दूषित होगई,तब व्यर्थ ही दृष्टांत हैं सब, दोष भी इच्छा जनित है,सत्य कैसे देख लोगे, व्यक्ति है स्वच्छंद,आपनी धारणा के मूल पर ही, यदि ह्रदय ममता रहित है,सत्य कैसे देख लोगे, छद्मवेषी होगया व्यक्तित्व मानव जाति का अब  गर्जना हिंसा सहित है,सत्य कैसे देख लोगे, मैं,मुझे,मेरा कहाँ तक है उचित,खुल कर विचारो, जिसमें केवल अपना हित है,सत्य कैसे देख लोगे #उर्मिलामाधव... 1.5.2015...

परस्तार हुए

ऐसी नज़रों के परस्तार हुए, जिस्मों जाँ दोनों तार-तार हुए, आज दिल ये सवाल करता है, बे सबब इतने क्यूँ निसार हुए, फूल बन कर क़रीब आए थे, दूर तो थे ही उसपै ख़ार हुए, लोग कहते हैं तजुर्बा अक्सर, नादाँ दिल कब किसीके यार हुए।। #उर्मिलामाधव.... 1.5.2015...

ज़िंदगी

लामकां से न जब तक के ख़बर आती है, ज़िन्दगी कितने सराबों से गुज़र जाती है..., :: Laa-makaan se n jab tak ke khabar aatii hai, Zindagi kitne saraabon se guzar jaati hai.... उर्मिला माधव.. 1.5.2016

अब देखो

मैं बहुत थक गई हूं अब,देखो, मेरी दुनियां में ..ऐब मत देखो, मैं तो तबियत लगाया करती हूं, मुझमें सदक़ा ए ग़ैब मत देखो उर्मिला माधव 

ज़रूरी है

muhabbat main taghaful ka chalan to be shaoori hai, tajurbekaar kahte hain ki doori bhi zaroori hai.......... Urmila Madhav 30.4.2013

रूठ जाते हैं

ऐसा करते हैं,रूठ जाते हैं, ज़िन्दगी भर को छूट जाते हैं... कब तलक आपको पुकारें हम, इतना थकते हैं टूट जाते हैं.. दिल को थामे हैं दोनों हाथों से, आबले फिर भी फूट जाते हैं.. दिल पे पहले ही से ग़रीबी है, लोग ..रह रह के लूट जाते हैं, दिल ने हमको रुलाके तोड़ा है, इसको हाथों से कूट जाते हैं, उर्मिला माधव... 30.4.2017

जो बुलंदी की हवाओं पे उड़े शाम ओ सहर

कुछ अशआर जो बुलंदी की हवाओं पे उड़े शाम ओ सहर, उनकी तह में भी कोई ख़ास इदारा निकला, हम जो मग़रूर रहे, ख़ुद को जुदा कर लेंगे, तुझसे ऐ दिल न मगर काम हमारा निकला, हमने अहबाब से जब ख़ूब गुज़ारिश करली, इब्ने दुश्मन ही कई बार सहारा निकला, हम खड़े होके भंवर में ही जलाते थे चराग़, झुक के देखा तो बड़ी पास कनारा निकला, हमको कमरे में बहुत धुंध नजऱ आने लगी, डर के देखा तो कोई आम शरारा निकला, उर्मिला माधव

ख़ुश्क आँखों में जब

ख़ुश्क आंखों में जब नमी न रही, ज़िन्दगी फ़िर ये ज़िन्दगी न रही, जब बड़े हादसों की ज़द में रहे, ज़ब्त की फ़िर कहीं कमी न रही, हमको तनहाई ने संभाला बहुत, तीरगी तुझ से बरहमी न रही, खिड़कियां धुल गईं जो बारिश में, गर्द फ़िर देर तक जमी न रही... उर्मिला माधव,

सागर पार तुझको (नज़्म)

सुन हवा चलते हुए जाना है सागर पार तुझको बस उसी खुश्बू में मिल जायेगा मेरा प्यार तुझको पूछना उनसे कभी कोई याद भी आता है उनको, क्या कोई दिल की छुपी रूदाद दिखलाता है उनको, और वहां बारिश का मौसम भी कभी आता तो होगा, जाने अनजाने सही पर दिल को धड़काता तो होगा, बिजलियाँ घर की मुंडेरों पर अगर चमकीं कभी जब, क्या उन्हें मालूम है के कोई डरता है कहीं तब ? ये अजब इक दास्ताँ है तुझको बतलाती हूँ सुन ले, ये तो क़ुदरत का करिश्मा है जिसे चाहे वो चुन ले, #उर्मिलामाधव... 30.4.2016..

दम ब दम

जिस्म-ओ-जां दुश्वारियों से थक रहे हैं दम-ब-दम, सांस लेने की भी मोहलत कब मिली अल्ला क़सम, तीर -ओ-खंजर से भी क्या डरना बता ऐ ज़िंदगी, बस यही असबाब तो अपने रहे हैं हम क़दम, हौसले कब पस्त हैं,सेहरा की जद को तोड़ कर, बस हवा दरकार थी,रेग-ए-तपां में कम से कम, लोग कहते हैं सुख़नवर,लीक पर चलते नहीं, तय शुदा है इसकी इज़्ज़त बा अदब रखेंगे हम, अपने ही अंदाज़ में जीना गवारा है हमें, हो रहे तूफान बरपा या के हो रंज-ओ-अलम... जब जहाँ तबियत हुई सजदा किया हमने वहीँ, कौन इतना फ़र्क़ करता, घर है या दैर-ओ-हरम, उर्मिला माधव, 30.4.2016

पेश वो आते रहे

इस क़दर संजीदगी से पेश वो आते रहे, होगए गाफ़िल फ़रेब-ए ज़ीस्त हम खाते रहे, उनकी फ़ितरत में तग़ाफ़ुल का चलन कुछ ख़ास था, ख़ामियों को ख़ूबियों के साथ दिखलाते रहे, अपने दिल को हमने ऐसा बदग़ुमाँ रहने दिया, उनके सुर में सुर मिलाके गीत हम गाते रहे,  अपनी रुसवाई का चर्चा आम हो जाने दिया, लोग जो कहते रहे हम सुनके शर्माते रहे, अपने जीने का तरीका,अपना ना रहने दिया, जो भी वो कहते रहे,हम वो ही दोहराते रहे।।... Urmila Madhav 29.4.2013

मैं अश्क़बर हूं

मैं अश्कबर हूँ ना कोई देखे, यूँ रुख़ पे चिलमन गिराई हमने, न कोई आहों का दर्द जाने, यूँ बात हँसके छुपाई हमने। हमें मुहब्बत थी आँधियों से, तो कैसे तूफ़ाँ से बच निकलते, कि अपने जज़्बों पै धूल रखके, ये शम्मे महफ़िल सजाई हमने। वो संगदिल थे ये मेरी किस्मत, तो फ़िर ज़माने को क्या बताते, सिसक रहे हैं यूँ दिल ही दिल में, ये बात सबसे छुपाई हमने ।।...... उर्मिला माधव.. 28.2.2013

नज़्म

सड़क पर रहने वाले युवक की मनोव्यथा----- ------------------------------------------------------- अनुष्ठान जब कोई होता, मेरा मन भीतर से रोता , मेरे पास कमीज़ नहीं थी, कोई मुझे तमीज नहीं थी, कहीं अगर जो बाजे बजते , मेरे ख्वाब चौगुने सजते, मन पंछी तब खूब उछलता, जाने को ये खूब मचलता, कोई मुझको नहीं बुलाता, कन्नी काट बगल हो जाता, मेरी कोइ दहलीज़ नहीं थी, मेरे पास कमीज़ नहीं थी, तनहाई में सोचा करता, बिना विचारे क्यूँ नईं सरता? मुझमें दया भाव नईं शायद , बे-मतलब की करूँ कवायद , मेरा वतन गरीब बहुत है, सबका दर्द करीब बहुत है, यह सब कोई चीज़ नहीं है मेरे पास कमीज़ नहीं है, अच्छे दिन आने वाले हैं, बुरे सहज जाने वाले हैं, ये सुन कर मैं हंस लेता था, जो मिल जाए रख लेता था, ऐसा अगर कहीं हो जाए, दिल को ज़रा समझ हो जाए, मेरा कोई हफीज नहीं है, मेरे पास कमीज़ नहीं है... उर्मिला माधव... 29.4.2014...

बीनाई तो पाई नहीं

आँख है पर क्या करें बीनाई तो पायी नहीं, बात बढ़के हसरत-ए-दीदार तक आई नहीं, आँख से परदे हटाके,दिल की जानिब देखले, इस तरह गर्दन झुकानी क्यूँ तुझे आई नहीं?? तार दामन के बचाता है अबस ही बे खबर, इश्क़ में दीवाना होना....कोई रुसवाई नहीं, जो तू मिलना चाहता है,दिलनशीं महबूब से, सर झुका कुर्बान होजा.....वरना शैदाई नहीं, है अनल-हक़ देख तो नज़रें घुमा कर चार सू ये जो अनहद बज रहा है क्या वो शहनाई नहीं? उर्मिला माधव... 29.4.2016

सम्हाली है

ज़िन्दगी इस तरह सम्हाली है, पिछली यादों पै ख़ाक डाली है, अपनी आहों पै इख़्तियार रखा, कुछ न कहने की क़सम खाली है, जिससे दिलने गिला किया ही नहीं, उससे फिर रूह क्यूँ सवाली है?? अपने चेहरे की धूल देखी नहीं, बात क्यूं बज़्म में उछाली है  बात महफ़िल में क्यूँ उछाली है??.. Urmila Madhav 28.4.2013

दिल दुखाता रहेगा

अगर इस क़दर दिल दुखाता रहेगा, यक़ीनन ही बस आता-जाता रहेगा, तवज्जो को जाने न जाने तगाफ़ुल, फ़क़त दीदा-ए- तर दिखाता रहेगा  भटकती फ़ज़ाओं की तनहाइयों में  जबीं कोई कब तक झुकाता रहेगा, अजब खेल देखा ज़माने में दिल का, जो ठुकरा दे उस पर ही आता रहेगा, जहां पर कभी कोई इज्ज़त न पायी, उसी दर पे रह-रह के जाता रहेगा, उर्मिला माधव ... 28.4.2014...

उफ़ शबे ग़म क्या बला है

उफ़ शबे ग़म क्या बला है पूछ तो ले, कौन कब कितना जला है, पूछ तो ले, तेरे लफ़्ज़ों में हमेशा तंज़ ही क्यों, कब से दिल में ग़म पला है पूछ तो ले ख़ून छालों से रिसा ऑ चल रहा है, किस तरह इतना चला है पूछ तो ले, आह भर के भी महज़ ख़ामोश ही है, ज़ीस्त उसकी क्यों ख़ला है पूछ तो ले, क्या गमों से सिलसिला है पूछ तो ले, उर्मिला माधव 9.2.2018

उसने कहा कि जा मर

जब कहा उसने कि 'जा मर, ये सुना और दिल गया भर, नईं बचा रस्ता कोई तब, लौट के बस आ गए घर, टिक गए कोने में जाकर, बे-हया दिल,अश्क़ लेकर, हट गयी उसकी तवज्जो, अब बचा बस एक ही दर, वो ही दर जो सबका दर है, सबको है मालूम वो घर... उर्मिला माधव ... 27.4.2014...

न तू देख इतने गुरूर से

न तू देख इतने गुरूर से,के मैं लौट जाऊँगी दूर से'' ये पयाम तेरी नज़र को है,इसे जोड़ दिल के सुरूर से.. मेरे ग़म से तू भी है पुर असर,मेरा दावा है मैं ग़लत नहीं, न यूँ ऐतकाफ़ से काम ले,आ बचाले खुद को कुसूर से...  मेरे दिल का तू ही क़रार है,तुझे सोचती हूँ मैं रात दिन, मेरी रात है तेरी जुस्तजू ...है सहर भी तेरे ही नूर से, मेरे दिल का कौन हफ़ीज़ है,तेरी दूरियां ही ज़वाल हैं, ये बता के किससे गिला करें ,मेरे रंजो ग़म मजबूर से, ये बयान जो देना पड़ा मुझे बदेर कशमकश से गुज़र हुआ, कभी ज़िन्दगी में विसाल हो ....तो कहूँगी पूरे शऊर से   #उर्मिलामाधव 27.4.20!5..

दिल चस्पियां

Ek matla ek sher--- क्या बताएं किसलिए दिलचस्पियां जाती रहीं, ख्वाहिशें मुझसे हमेशा,झिड़कियां खाती रहीं, धोखेबाज़ों का भी आलम उम्र भर चस्पां रहा, हर नफ़स मेरी जुबां पर,तल्ख़ियाँ आती रहीं :::: Kya batayen kisliye, dilchaspiyan jaati rahin, Khwahishen mujhse hamesha jhidkiyan khaati rahin, Dhokebazon ka bhi aalam umr bhar chaspaan raha, Har nafas meri zubaan par talkhiyan aati rahin, उर्मिला माधव.. 27.4.2016

पढ़ सकते हो क्या?

चेहरे पर बेचैनी पढ़ सकते हो क्या? टूटे और खिलौने गढ़ सकते हो क्या? तूफ़ानों में घिर के नीचे पहुंच गए, उतनी ही ऊंचाई चढ़ सकते हो क्या? उर्मिला माधव

लम्हा लम्हा

लम्हा-लम्हा ज़िन्दगी जीनी पड़ी है, आंसुओं की धार,संग पीनी पड़ी है  ये बहुत मँहगी पडी चुंदरी है मुझको अपनी चुंदरी ख़ुद मुझे सीनी पड़ी है, उर्मिला माधव... 27.4.2014...

क्या करें

ज़ब्त के कुछ दायरे हैं, इसके आगे क्या करें, भीड़ से उठ जाएं जा कर रूह को तनहा करें, रोज़ उठ कर सोचते हैं, क्या ख़राबी हम में है, दिल के दरवाज़े को खोलें देर तक झांका करें, कुछ नुमायां हो न पाए, फ़िक्र इसकी है हमें, पर ज़ियादा बोझ है तो किस तरह आधा करें, हर मरासिम किस क़दर तनक़ीद करता है मिरी, कौन है ग़मख़्वार किस से दर्द हम साझा करें, ज़ीस्त की अठखेलियों से ज़िन्दगी आज़िज़ हुई, रोज़ ही मर जाएं ख़ुद को रोज़ ही जिंदा करें.. उर्मिला माधव

दामन बचनाब ही होगा

हमें अपना दामन बचाना ही होगा, नक़ाब अपने रुख़ पे गिराना ही होगा, हमारी–तुम्हारी है मंज़िल जुदा अब, सो अब दिल पे ताले लगाना ही होगा, तुम्हें भूलने में मशक़्क़त है फिर भी, ग़मे दिल को दरिया बनाना ही होगा, कभी कोई शिकवा किया ही न हमने, तो शिकवों के पीछे ज़माना ही होगा..

हौसला क्यूं पस्त है

मौत की तारीकियों से..हौसला क्यूँ पस्त है?? ज़िन्दगी के साथ ही..इसका भी बंदोबस्त है, एक हलके ज़िक्र से कहते हैं सब कि शुभ कहो", वाह उसको आफरीं जो बिन डरे अलमस्त है... उर्मिला माधव... 25.4.2014...

चर्चे सुख़नबरी के

एक आवाज़.... मैले कुचैले कपडे आँखों की इस नमी पर, ख़ाके उतारते हैं काग़ज़ की एक ज़मीं पर, तकलीफ को हमारी,मौज़ू बना बना कर, उंगली चुभा रहे हैं,हालात की कमी पर, कैसे बताएं इनको,इनकी तरह हैं हम भी, मुफलिस तो हैं सही है,होते हैं हमको ग़म भी, क़ुर्बान करना छोडो अपनी बुलंदियों पर, ये ज़्यादती बड़ी है,किस्सा करो ये कम भी, मिल जायेंगे तख़ल्लुस तमगे भी दिलबरी के, इज्ज़त के ऊंचे मसनद,चर्चे सुख़न बरी के, नौटंकियाँ तुम्हारी तुम नाच लो कहीं पर, पर इससे क्या गरज है,लिखते हो सब हमीं पर, सुल्तान इस अहद के,हालात कुछ न बदले है आफरीं सियासत,इतिहास कुछ न बदले, #उर्मिलामाधव... 25.4.2015

ये भी कोई यारी है

झूठे लफ़्ज़ों से ग़म गुसारी है, अय अमां ये भी कोई यारी है , ख़ास खुन्नस को रंग देते हो, ऐसा ये ख़ब्त कबसे तारी है? सिर्फ़ दिल से क़यास करते हो, ये कमी दम-ब-दम तुम्हारी है, इसका अहसास ही तो मुश्किल है, कौन पलड़ा कहाँ पै भारी है, हमको जीने दो जैसे जीते हैं, अय मियाँ ज़िन्दगी हमारी है, #उर्मिलामाधव ... 25.4.2016...

तेग तुम्हीं ने तानी है

तेग तुम ही ने तानी है  हमको अब आसानी है, तुमने ये सोचा ही कब, बिगड़ी बात बनानी है, हमने बहुत तसल्ली से, नब्ज़ तुम्हारी जानी है, इसमें कुछ भी नया नही, फ़िर-फ़िर वही कहानी है, दुनियां में दिल वालों को, चोट बराबर खानी है, उर्मिला माधव, 24.4.2018

कहानी लिखी है

इन आँखों में इक ज़िंदगानी लिखी है, हक़ीक़त नहीं है, कहानी लिखी है, सहर को कहीं शाम लिख डाला हमने ख्यालों की कुछ खींचा तानी लिखी है नज़र हम झुका कर खड़े हैं जहाँ पर  मुहब्बत की तश्ना दहानी लिखी है उर्मिला माधव

चली जाती हूं मैं

जोशे उल्फ़त में सू ए दिलबर चली जाती हूँ मैं, उनके अन्दाज़-ए-तग़ाफ़ुल से बिखर जाती हूँ मैं, सब जमाल-ए-इश्क़ और जज़्बे अना को भूल कर, वो सुनें या ना सुनें,दस्तक दिये जाती हूँ मैं, ख़ूब है ये वाक़या इस दिल पै हँसने के लिए, कि तोड़ते जाते हैं वो और जोड़ती जाती हूँ मैं।...Urmila Madhav 24.4.2013

रेत पर मसकन

रेत पर मसकन बनाना है मुझे बस, अपने ख़्वाबों को सजाना है मुझे बस, तुम न बसने पाओगे इनमें कभी अब, क्यूँकि तुमसे दूर जाना है मुझे बस, मुझको न दरक़ार है कोई तवक्को, ख़ुद ब ख़ुद ही मुस्कुराना है मुझे बस, हाँ मैं तनहा हूँ मगर ग़ाफ़िल नहीं हूँ, हौसले से चलते जाना है मुझे बस, नईं मलक अब खाए हरग़िज़,देखना है, बा ख़ुदा ख़िरमन बचाना है मुझे बस, अब उठे तूफ़ान दिल में चाहे जितना, दिल को ही मदफ़न बनाना है मुझे बस, #उर्मिलामाधव .... 24.4.2015...

क्या–क्या न दर्द ढोते थे

पहले क्या-क्या न दर्द ढोते थे, ख़ूब हम दिल ही दिल में रोते थे, जाने कितनी अदाएं,देखी हैं, लोग भी क्या टशन में होते थे!! बात इतनी है अय जहां वालो, ग़लतियां सारी,हम ही बोते थे, चोट खाकर फ़िज़ूल बातों की, दिल ऑ दामन बहुत भिगोते थे, बेअसर है हर इक अदा अब तो, सोचते हैं के हम क्या होते थे !! फाइनल ये समझ में आया है, बात कुछ भी हो हम ही खोते थे... 😊 (खोते--गधे) उर्मिला माधव... 23.4.2016

चमक कर लौट गए

धीरे-धीरे सभी चमक कर लौट गए, दुनियां वाले बहुत झिझक कर लौट गए, उम्मीदों का दामन लेकर आए मगर, ग़लत पते पर सभी भटक कर लौट गए, शोर सुना था, वतन बदलना लाज़िम है काँधे अपने सभी झटक कर लौट गए, अब बर्बादी इससे बढ़कर हो भी क्या, नौनिहाल सब पैर पटक कर लौट गए, सब को रोक-रोक कर पूछा, क्या होगा, तीस मार खां आए झिनक कर लौट गए.. उर्मिला माधव, 13.8.2018

कोई भी मोतबर नहीं होता

कोई भी मोतबर नहीं होता, हो भी तो उम्र भर नहीं होता, तेरी फ़ितरत अगर सही होती, राबिता दर ब दर नहीं होता, इक मरासिम था सो भी टूट गया, जो कभी मुख़्तसर नहीं होता, अब मिरा फ़ैसला भी सुन लीजै, अब यहां कुछ असर नहीं होता, उर्मिला माधव

जोशे उल्फ़त में

जोशे उल्फ़त में सू ए दिलबर चली जाती हूँ मैं, उनके अन्दाज़-ए-तग़ाफ़ुल से बिखर जाती हूँ मैं, सब जमाल-ए-इश्क़ और जज़्बे अना को भूल कर, वो सुनें या ना सुनें,दस्तक दिये जाती हूँ मैं, ख़ूब है ये वाक़या इस दिल पै हँसने के लिए, कि तोड़ते जाते हैं वो और जोड़ती जाती हूँ मैं।...Urmila Madhav 24.4.2013

तिरछी अदा से बात का कहना सवाब है

तिरछी अदा से बात का कहना सवाब है, कुछ भी सह्ल नहीं है, ज़माना ख़राब है, बच बच के चल रहे हो, कहाँ बच सके मगर, बेआबरू खड़े हो, यही इक जवाब है, जिस राह पर चले हैं तहम्मुल से आज तक, एहसास हो गया है यहीं इज़्तिराब है, जब तुन्द आंधियों से कभी हम नहीं डरे, सरमाया ज़िन्दगी का मगर, आब आब है, उनको गुमान तिफ़्ल हमें जानते हैं वो, दिल में हसद है मुंह पे मगर जी जनाब है, हम मुस्तहक थे फिर भी कभी कुछ नहीं कहा, अपना वजूद उनको फ़क़त इक हबाब है, उर्मिला माधव

गुल नहीं बुलबुल नहीं

♥ ♥ गुल नहीं बुलबुल नहीं तुम गुलबदन कहदो मुझे, अपने गुलशन की फ़िज़ाँ का रंग-ए-गुल देदो मुझे, अपने शाने पर मेरा सर देखना तुम दम ब दम, अपनी साँसों की तपिश का ज़लज़ला देदो मुझे, और उसी अन्दाज़ में मर जाऊँ है ख़्वाहिश मेरी, तुम ज़ुबाँ से हाँ कहो एक सिलसिला देदो मुझे ।।....उर्मिला माधव 25.2.2013

इल्तिजा उसने मेरी मानी कहां

इल्तिजा उसने मेरी मानी कहाँ, पर मिरे भी सब्र का सानी कहाँ, कांपती आवाज़ में रोका किये, उसने वो आवाज़ पहचानी कहाँ, सूखती है ये सरापा भीग कर,  इश्क़ की बुनियाद में पानी कहाँ, मैंने उसके हाल पर छोड़ा उसे, हो सकी तब कोई मनमानी कहाँ, उर्मिला माधव... 23.4.2014...

प्यार का हक़ अदा नहीं होता

aadhi fil badiih.... :) pyar ka haq adaa nahin hota, mujhse gar wo milaa nahin hota, yun hii aankhen,barasti rah jaatin, us se gar silsilaa nahin hotaa, shaam dhalte hi yaad aatii hai, wo bhi mujhse judaa nahin hota, usne paigaam se navazaa hai, gair ko ye pataa nahin hotaa, uski aankhon men koii jaaduu hai, warna ye dil jhuka nahin hotaa, Urmila Madhav 23.4.2016

तमाशा

सभी ने तमाशा,किया बढ़ के हद से, सबब कुछ नहीं था यूँ ही बस हसद से, तआक़ुब किया इस क़दर जिंदगी का, बचाते फिरे ख़ुद को हम नज़रे बद से, sabhi ne tamaashe kiye badhke had se, sabab kuchh nahin tha,yun hi bas hasad se, t'aaqub kiya is qadar zindagii ka, bachaate phire,khud ko ham nazare-bad se... उर्मिला माधव... तआक़ुब---- पीछा

दिल तोड़ा होगा

जब तूने दिल तोड़ा होगा, कैसे तुझको छोड़ा होगा। तनहाई में अक्सर जाकर, चौखट पै सर फोड़ा होगा। बाँयां हाथ जिगर पै रखकर,  दिल का दर्द निचोड़ा होगा। चाहे जितना ग़म हो तुझको, मुझ से तो पर थोड़ा होगा। तुझे भुलाने की खातिर ही, खुद को खुद से जोड़ा होगा। दिल पर दाग़ लगाने वाले, तुझसा कौन निगोड़ा होगा..... उर्मिला माधव...

अपनी परदादारी है

ये तो बस अपनी पर्दा दारी है, तुमने क्या बात कब सँवारी है? हाल मेरा गैर से पूछा किए, वाह क्या ख़ूब ग़मग़ुसारी है ! तल्ख़ लहजे से बात करना ही, क्या मुहब्बत की आबशारी है? ऐसे शिकवे के कुछ नहीं मानी, जिसमें यकतरफ़ा बात जारी है, तुमको ख़ामोशिय़ाँ मुबारक़ हों, मुझको बस मेरी बेक़रारी है।... Urmila Madhav 22.4.2013

रस्ते छोड़कर

अब ज़मीं से आसमानों तक के रस्ते छोड़कर, हम चले आये हैं तुमसे सब मरासिम तोड़कर, चाह से और आह तक भी कर दिए हमने दफ़न,  चल नहीं सकते हैं हरगिज़ हम जहाँ की होड़ कर, तुमने बस इतना कहा था,छुपके ही मिलना कभी, तुमको देखा ही नहीं फिर आँख अपनी मोड़ कर  हम कलेजा साफ़ रख कर ही अबस तुमसे मिले, तुम हमेशा खुश रहे हो इसकी,उससे जोड़ कर ..... वक़्त ही तो है कभी ....उल्टा अगर ये हो गया, बैठ कर रोया करोगे,सर ख़ुद अपना फोड़ कर... #उर्मिलामाधव ... 22.4.2015

ख़ुद्दारी के दम पर

अपनी ख़ुद्दारी के दम पर जी रहे हैं। इस लिए हम ज़ह्र लाखों पी रहे हैं। बारहा होते मुख़ातिब ज़ख्म अक्सर हम मुसलसल साथ इसके ही रहे हैं। ये अनादारी है आदत के मुताबिक हम न ज़ाती रंग में तरही रहे हैं। आपसी रिश्ते निभाने के चलन में यों समझ लो एकदम सतही रहे हैं। जब जहाँ धोखा धड़ी का दौर आया इक निशाने इसके बस हम ही रहे हैं। Urmila Madhav... 22.4.2016

मैं बे अमां –बेटू की ग़ज़ल

A poem by Madhuvan Rishiraj छोड़ कर मुझको यहाँ हो गए हाफ़िज़ निहाँ मैं बेअमाँ... मैं बेअमाँ... उनके गए... मैं बेअमाँ सब ख़ाक है उनके बिना अब वो कहाँ और मैं कहाँ कोई नहीं मेरा पासबाँ हैं हर तरफ़ खंजर सिना मैं बेअमाँ... मैं बेअमाँ... उनके गए... मैं बेअमाँ है हर तरफ रेग-ए-तपाँ हैं मौत की परछाइयाँ है मश्क को छूना मना अब कौन है मेरा यहां मैं बेअमाँ... मैं बेअमाँ... उनके गए... मैं बेअमाँ नाम उनका, ये ज़बाँ थे वो ही मेरे दो जहाँ था उनका चेहरा आईना राह-ए-मकान-ए-लामकाँ मैं बेअमाँ... मैं बेअमाँ... उनके गए... मैं बेअमाँ हर तरफ़ हैं आँधियाँ हैं रेत के झोंके रवाँ और चल रहा हूँ बेनिशाँ मैं नातवाँ, तश्नादहाँ मैं बेअमाँ... मैं बेअमाँ... उनके गए... मैं बेअमाँ -MR... Madhuvan Rishiraj

गुनगुनाते हो

तुम तो बस इश्क़ गुनगुनाते हो, इस क़दर शोर क्यूं मचाते हो? दिल को हलकान क्यूं करो आख़िर, किस लिए इतना बड़बड़ाते हो? तुम भी वाकिफ़ हो इसमें सच क्या है, फिर ये दुनिया को क्यूं जताते हो? उर्मिला माधव

दावत है

तक़लीफ़ों के भंडारे की दावत है, सब आ जाएं हमसे जिन्हें अदावत है, खाने की ख़्वाहिश भी पूरी कर देंगे, अपनी इस दुनिया से खुली बगावत है, बातें कर के सबका दिल भी रख देंगे, रब की हमपे अब तो बड़ी सखावत है, उर्मिला माधव

तू जो दोस्त है अगर मेरा

तू जो दोस्त ही है अगर मेरा, तो समझ तो मुझको ज़रा ज़रा, वो जो ज़ख़्म मेरा भरा नहीं, किया फिर से तूने हरा हरा, मेरा ग़म से सीना फ़िग़ार है रहे दिल भी सबसे डरा डरा, इसे तू ही कह क्या ये ठीक है? हुआ सौदा तुझसे खरा खरा, लगे चश्मे ख़ुश्क तो ख़ुश्क ही, है ये दिल तो अब भी भरा भरा..... उर्मिला माधव 

कितना खोना होता है

इस दुनियां में आकर सबको, कितना खोना होता है, पहले यार बतादे मुझको, कितना रोना होता है। दीवारों से लग कर बैठें, नींद न आए रातों को,  तब फिर सूरज के उगने पर, कितना सोना होता है। आंखें मल कर थक जाते हैं,कब तक आरिज़ सुर्ख़ रखें तक़लीफ़ों का बार भी आख़िर कितना ढोना होता है। उर्मिला माधव

ज़िंदगी तरसती रही

सुकून-ए-दिल के लिए ज़िन्दगी तरसती रही, मगर ये सांप सी दुनियां के सिर्फ़ डसती रही, हमारी रूह ने देखा तो ख़्वाब शीरीं था, अजब अज़ाब रहा, ज़िन्दगी झुलसती रही, बड़े ही शौक़ से पहुंचे थे, बर्फ़ के घर में, मगर लगा के कहीं, आग सी बरसती रही, किसी भी शै को अगर दिल ने अपना मान लिया, उलट-पलट के वही, तंज़-ओ-तीर कसती रही, मुख़ालफ़त को बहुत दूर से सलाम किया बहुत कमाल वही साथ-साथ बसती रही, उर्मिला माधव,

जज़्बात मेरी दुनिया के

ख़त्म सब हो गए जज़्बात मेरी दुनिया के, हम न चल पाएंगे अब साथ तेरी दुनिया के, तुझको डर है कि कोई देख न पाए कुछ भी, हमको अब आए समझ घात तेरी दुनिया के , उर्मिला माधव 

क्या होता है

एक मतला दो शेर-----  हुए हज़ारों टुकड़े दिल के,और क़ह्र से क्या होता है?? हम मानिंन्द हुए मुर्दे के,और ज़ह्र से क्या होता है?? जिसकी हो जागीर हमेशा रहे उसी की मरते दम तक, कोई इस्तक़बाल कहे बस और शह्र से क्या होता है?? दीवारों से बने हुए हैं,ताजमहल और मंदिर मस्जिद, आमद-रफ्त बशर की क़ायम और दह्र से क्या होता है ?? उर्मिला माधव... 24.2.2014..

ख़ूब रू था

ख़ूब रु था रु-ब=रु, जाने क्या थी गुफ़्तगू, क्यूँ अजब सा है असर, मिट गई हर आरज़ू, ख़ाब हो या हो ख़याल, अब न कोई जुस्तजू , आँख ने चाहा जिसे, हर घड़ी ऑ कू-ब-कू, ज़िद हमारी सुन ज़रा , माहवश ऐ माहरू, तेरी दुनियां तू समझ, मेरी दुनियां,अल्ला हू, जिस्म-जां तनहा सही, और ग़म भी चार सू , मैं रहूँ बस मैं ही में, तू रहे बस तू ही तू ...... #उर्मिलामाधव ... 20.4 .2015

वो मुझको याद आता है

कड़े फिकरे कोई कह कर, चला जाता था जो अक्सर, तग़ाफ़ुल उसकी नज़रों में, कभी देखा था जो मैंने, वो मुझको याद आता है।। ज़मीं जब ज़ख़्म धोती थी, फ़लक़ रह-रह के रोता था , कहीं तन्हाई में जाकर, कोई दामन भिगोता था वो मुझको याद आता है।। कहीं पर माँ बिछुड़ जाना, न ये दुनियां समझ पाना, किसी बच्चे की आँखें थीं कहीं जब मुन्तज़िर माँ की, वो मुझको याद आता है।। कोई मय्यत के आगे बैठकर, रोया नहीं हरगिज़, मगर आरिज़ की सुर्खी, कह रही थी,हाल अश्कों का, वो मुझको याद आता है।। कोई मंज़िल न थी फिर भी, मुसलसल,चल रही थी मैं, निशां क़दमों के दुनियां को, नहीं दिखते थे,जाने क्यूँ, वो मुझको याद आता है।। उर्मिला माधव, 20.4.2016

डसती रही

सुकून-ए-दिल के लिए ज़िन्दगी तरसती रही, मगर ये सांप सी दुनियां के सिर्फ़ डसती रही, हमारी रूह ने देखा तो ख़्वाब शीरीं था, अजब अज़ाब रहा, ज़िन्दगी झुलसती रही, बड़े ही शौक़ से पहुंचे थे, बर्फ़ के घर में, मगर लगा के कहीं, आग सी बरसती रही, किसी भी शै को अगर दिल ने अपना मान लिया, उलट-पलट के वही, तंज़-ओ-तीर कसती रही, मुख़ालफ़त को बहुत दूर से सलाम किया बहुत कमाल वही साथ-साथ बसती रही, उर्मिला माधव, 20.4.2017

दिल में हुजूमे ग़म है

दिल में हुज्जूम-ए-ग़म है बयाँ हो तो कैसे हो? कुल ज़िन्दग़ी का दर्द अयाँ हो तो कैसे हो ? अब ज़िन्दग़ी में वैसी हसानत नहीं रही ख़ाली है जब ज़ेहन ये ग़ुमाँ हो तो कैसे हो? मुर्दार हो चुके हैं इबादत के वलवले ऐसे में कोई रक्स-ए-समाँ हो तो कैसे हो?..... उर्मिला माधव. 8.3/2013

संगदिल

आज कल वो होगए हैं संग दिल, आदतन यूँ भी हैं वो कुछ तंग दिल, हम रक़ाबी में सजा कर ले गए , कितना सुंदर ख़ुशनुमाँ नौरंग दिल, इससे बढ़ कर बेरुख़ी होती भी क्या बा-अदब लौटा दिया बैरंग दिल, लौट कर उस दर पै अब न जायेंगे, खुद ही खुद से कर रहा है जंग दिल, इस क़दर ये आज मैला हो गया, क्या दिखाएँ उनको ये बदरंग दिल.... उर्मिला माधव.. 19.4.2015...

उसको सबसे जुदा समझते थे

उसको सबसे जुदा समझते थे,  सच ये है..नाख़ुदा समझते थे, उसको दर्ज़ा दिया मशाइख का,  खुद को अदना ग़दा समझते थे, जिसमें था इन्तेहा का रंग रचा, उसको हम इब्तेदा समझते थे, दिल को ये रायगाँ यक़ीन रहा, उसके दिल की सदा समझते थे,  वो तो मिलता रहा तगाफुल से, हम महज इक अदा समझते थे, वक़्त गुज़रा तो ये हुआ ज़ाहिर, फानी था...जाँविदा समझते थे, उर्मिला माधव.... १७.4.२०१४..

मैले कुचैले कपड़े

एक आवाज़.... मैले कुचैले कपडे आँखों की इस नमी पर, ख़ाके उतारते हैं काग़ज़ की एक ज़मीं पर, तकलीफ को हमारी,मौज़ू बना बना कर, उंगली चुभा रहे हैं,हालात की कमी पर, कैसे बताएं इनको,इनकी तरह हैं हम भी, मुफलिस तो हैं सही है,होते हैं हमको ग़म भी, क़ुर्बान करना छोडो अपनी बुलंदियों पर, ये ज़्यादती बड़ी है,किस्सा करो ख़तम भी, मिल जायेंगे तख़ल्लुस तमगे भी दिलबरी के, इज्ज़त के ऊंचे मसनद,चर्चे सुख़न बरी के, नौटंकियाँ तुम्हारी तुम नाच लो कहीं पर, पर इससे क्या गरज है,लिखते हो सब हमीं पर, सुल्तान इस अहद के,हालात कुछ न बदले  है आफरीं सियासत,इतिहास कुछ न बदले,      #उर्मिलामाधव... 17.4.2015...

आपकी क़सम

दुनियाँ से कुछ मिला भी नहीं...आपकी क़सम, और हमको कुछ गिला भी नहीं,आपकी क़सम, हम उम्र भर निभाया किये...मुश्किलों के साथ, और इसका कुछ सिला भी नहीं,आपकी क़सम, किस दरज़ा हम जगाते रहे.....कम नसीब को, ये टस से मस हिला भी नहीं....आपकी क़सम, हर तरहा अजनबी थे हर-इक शहर के लिए, जाना कोई जिला भी नहीं....आपकी क़सम, रहती थी जुस्तजू सी....किसी ख़ास शख्स की, बस फिर ये सिलसिला भी नहीं आपकी क़सम, --------------------------------------------- duniyan se kuchh mila bhi nahin aapki qasam, aur hamko kuchh gilaa bhi nahin aapki qasam, ham umr nibhaaya kiye mushkilon ke saath , aur iskaa kuchh silaa bhi nahin aapki qasam, kis darzaa ham jagaate rahe qamnaseeb ko, ye tas se mas hilaa bhi nahin aapki qasam, har tarhaa ajnabii the har-ik shahar ke liye, jaanaa koi jilaa bhi nahin.......aapki qasam, rahati thi justjoo sii kisi khaas shakhs kii, phir thaa ye silsilaa bhi nahin,aapki qasam... उर्मिला माधव... 26.12.2013...

क्या तुम भी रहोगे

आओ क्या मेरी तरहा तुम भी रहोगे? मेरा वीराना कभी तुम भी सहोगे? अब मिरी तनहाइयों का ये है आलम, किस तरह जीती हूं ये तुम भी कहोगे, मेरी आंखों में समंदर है पता है ? बह अगर निकला तो फिर तुम भी बहोगे ? क्या ख़बर थी जिंदगी घबराएगी तब, साथ मेरे उस घड़ी तुम भी न होगे, मैं तो इक गिरती हुई दीवार सी हूं, जब कभी ढह जाउंगी तुम भी ढहोगे? उर्मिला माधव 

अपनी दुनिया है बिल्कुल जुदा दोस्तो

अपनी दुनियां है बिलकुल जुदा दोस्तो इसलिए अब चलो .....अलविदा दोस्तो.... लोग जितने भी दुनियां में मिलते हैं सब, आदमी हैं ,......न कोई ख़ुदा दोस्तो... ज़िन्दगी भी ..कोई मिलकियत तो नहीं, रंग इसका बहुत ......अलहदा दोस्तो. जाने कब कूच करना पड़े ......दह्र से, अपनी जानिब से हो ....इब्तेदा दोस्तो, उर्मिला माधव...

थक हार कर ही चल रही है आजकल

ज़िन्दगी थक हार कर ही चल रही है आजकल, हर किसीकी शख़्सियत ही छल रही है आजकल, एक लहज़ा भीड़ जो देखी तो हम घबरा गए, अब बची तन्हाई सो ही खल रही है आजकल, दिन निकलते ही उदासी,घिर के आती है सो अब, दोपहर भी शाम जैसी,ढल रही है आजकल, उर्मिला माधव,

ज़िंदगी की कोई भी औक़ात नहीं है

लगती रही है साथ सी पर साथ नहीं है, इस ज़िंदगी की कोई भी औक़ात नहीं है, ये मौत का वक़ार है लो देख लो मियाँ, ख़ाली हैं दोनों हाथ, कोई बात नहीं है, दूल्हा हो या दुल्हन हो नहीं फ़र्क़ है कोई, अनहद बजे है इसलिए बारात नहीं है, गद्दीनशीन बादशा हो या कोई दरवीश, साँसें गिनी चुनी ही हैं इफ़रात नहीं है, #उर्मिलामाधव...

रस्ते भी रहें

बात हम समझें वो रस्ते भी रहे, ये समझ हम खूब हँसते भी रहे, सब के सब मुस्कान ले आते रहे, दांव पा कर तंज कसते भी रहे  यूँ ब-ज़ाहिर दोस्त भी कहते रहे, आस्तीं के सांप, डसते भी रहे, हर हिमाक़त सामने आती रही, हम मगर कसदन ही फंसते भी रहे, थी हमारी ही रज़ा वो साथ हों, सब पड़ोसी बनके बसते भी रहे..... उर्मिला माधव... 16.4.2014..

ख़ुद को ख़ुदा समझना हो तो

ख़ुद को ख़ुदा समझना हो तो अपना एक मंदिर बनवा लो, मुंह से जो कुछ कह नईं पाओ,उसके शिलालेख लगवा लो, कोई बातों पर ध्यान न दे तो ,बस फ़ौरन बन्दूक उठालो, इस पर भी ग़र होश न आये,तड़ से एक गोली चलवा लो, अगर पडोसी रोता हो तो,गीतों की महफ़िल सजवा लो , ये ही परिभाषा इस युग की,तुम भी परचम हाथ उठा लो... #उर्मिलामाधव .... 16.4.2015

याद क्या करना ग़मों का

याद क्या करना ग़मों का, आते-जाते ...मौसमों का, ख़ैर मक़दम ही किया है, ज़ह्र से उन आलमों का, क्यूं रहे शिकवा किसीसे, उम्र भर के मातमों का, डर कहां बाक़ी रहा अब, गोलियों का और बमों का सामना करते रहे जब, कैसे-कैसे रुस्तमों का, उर्मिला माधव, 16.4.2017

इतना समझ रहे थे

इतना समझ रहे थे कि अब थक गए हैं हम, पर ज़िन्दगी की आख़री हद तक गए हैं हम, रुसवाइयों का शोर ही इस दरजा लद रहा क्यूं अजनबी से शह्र में नाहक गए हैं हम, हम अपने तौर पर तो बहुत चुप ही थे मगर, अंदाज़ा हो रहा था कि कुछ बक गए हैं हम, उर्मिला माधव

मेरे बेटे मधुवन की ग़ज़ल

मेरे बेटे मधुवन का कलाम... ऐसा लगता है कि कुछ होगा मगर होता नहीं, रास्ता वा है मगर अपना सफ़र होता नहीं, वक्त की उन साअतों का भूलना पूरी तरह, उस तरफ़ तो हो गया है पर इधर होता नहीं, इन हवाओं में वही आवाज़ है उसकी निहाँ, वो कहीं कुछ बोलता है पर नज़र होता नहीं, है कमाल-ए-वक़्त जो है आज चर्चा आपका, वरना कोई भी यहाँ पर बाहुनर होता नहीं, इश्क़ में उसके ये दिल बेदार है अब इस क़दर  होश खो देता है लेकिन बेख़बर होता नहीं, दार पे चढ़के भी उसका ज़िक्र है दर ख़ासो आम,  वो फ़ना तो हो गया है, बेअसर होता नहीं.... Madhuvan Rishiraj

कैसे बतलाएं क्या गुज़रती है

कैसे बतलाएं क्या गुज़रती है  ये अजब ज़िंदगी है, डरती है, जब उदासी तुम्हारी आँखों की, मुझसे मिलती है ऑ सिहरती है, इक है आवाज़ मेरी दुनिया की, तुमको देखे तो आह भरती है, मुझपे इल्ज़ाम मत लगाया करो, रूह बिस्मिल है ग़म से मरती है, उर्मिला माधव

तक़लीफ़ दी सभी ने

तकलीफ दी सभी ने.... बस ढंग मुख्तलिफ़ थे, ------------------------ कभी बज़्म में बुलाकर, कभी बज़्म से हटा कर... कभी आसमां दिखा कर, कभी मुंह के बल गिरा कर, कभी दिल से दिल मिला कर, कभी दिल से कुछ जुदा कर. कभी अंजुमन सजा कर, कभी आशियाँ जलाकर, कभी ज़ख्म फ़िर बढ़ा कर, कभी झूठ ही दुआ कर, कभी मुझसे रुख छुपा कर, कभी रुख नया दिखा कर, कभी खुद ही इब्तेदा कर, कभी खुद ही इन्तहा कर, कभी हाले दिल सुना कर, कभी चिलमनें गिरा कर, अच्छा चलो हटाओ, लानत नहीं किसी पर, अय मेरे दिल दुआ कर, बस शुक्रिया अदा कर बस शुक्रिया अदा कर... उर्मिला माधव... 14.4.2015

राह जो चलनी है

अहसास----- राह जो चलनी है इसमें खूबियाँ कोई नहीं, रूह-ए-खुद को छोड़ के वक़्त-ए-गिरां कोई नहीं, पथ्थरों के आदमी हैं और दहर जलता हुआ, चिलचिलाती धूप है ऑ आशियाँ कोई नहीं, और कितना आज़माना,जो हुआ वो खूब है, तुम वही हो,हम वही राज़-ए-निहां कोई नहीं, है नया कुछ भी नहीं क्यूं इस क़दर हैरां हुए, साथ चलने को हमारे ,अय मियाँ कोई नहीं, सामने मक़्तल हुआ लो फ़िक़्र से खारिज़ हुए बस यही रस्ता है...जिसके दरमियाँ कोई नहीं..... उर्मिला माधव, 7.10.2014

इज़्ज़त

Meri izzat hai,aapki izzat, Ye hii kah-kah ke saaf kii izzat, Hamne jab khaas hii sanbhaalaa ise, Ahle duniyan ne kha'aq kii izzat, Apna darza hii kuchh nahin thahraa, Sabse aalaa thii sa'ab kii izzat,

सहल होकर हम मिले थे

सह्ल होकर हम मिले थे, आज के इनसान से, खौफ़ से पीछे हटे हम, सच है ये, ईमान से, अपना सच हाथों में लेकर, मर गए कितने शफ़ी, झूठ की बुनियाद के परचम खड़े हैं, शान से, ख़त्म होती ही नहीं,कितनी बड़ी तन्हाई है, ताकते रहते हैं दुनिया, हम महज़ नादान से, उर्मिला माधव 14.4.2019

ज़िक्र लापरवाही का

क्या करूँ मैं ज़िन्दगी में ज़िक्र ला-परवाही का, दिल किन्हीं रंगीनियों से पुरअसर होता नहीं, जिसको देखो दौड़ता फिरता है अपने ढंग से, मरहलों का रास्ता पर मुख़्तसर होता नहीं, उर्मिला माधव ...

राहबर ख़ुदा

दुश्वार रहगुज़र में हुआ राहबर, ख़ुदा, जब जिस्म से थके तो हुआ डाक्टर, ख़ुदा, तन्हाई में तड़पते हुए रो रहे थे जब, मिलने की जुस्तजू में हुआ कारगर ख़ुदा उर्मिला माधव

आपको याद करते रहे

आपको याद करते रहे, उम्र भर आह भरते रहे, दरम्यां जो हैं मजबूरियां, मिट सकें, चाह करते रहे, आपसे मिल सकें इक घड़ी, चाह थी फिर भी डरते रहे, आपको देखकर ग़म ज़दा, टूट कर हम बिखरते रहे.. अपने हाथों में कुछ भी न था, दिल ही दिल में सिहरते रहे, उर्मिला माधव

हमको क्या क्या नहीं मुहैया है

हमको क्या क्या नहीं मुहैया है, फिर भी तुमको ख़ुदा बना डाला, तुमको देखा मगर बहकते हुए, तुमने सबको गदा बना डाला.. अपनी इज़्ज़त गिराई महफ़िल में  दिल को ग़म की सदा बना डाला.. उर्मिला माधव  गदा....,भिखारी मुहैया...उपलब्ध

जमीं हमें निगल गई

क्या ज़मीन हमको निगल गई या सितारे आगे निकल गए, जो चराग़ अपनी नज़र में थे, कहीं सारे के सारे थे जल गए, कोई होश तक भी रहा नहीं कि हम अपने तईं भी सोचते, क्या मनाज़िरों के रंग थे जो नज़र फिरी तो बदल गए.. उर्मिला माधव 

ख़ुद आईने के आगे ज़रा पड़ के देखिए

खुद आईने के आगे ज़रा पड़के देखिये, चेहरा किताब है तो ज़रा पढ़के देखिये, गैरों पे हंस रहे हैं मियाँ बे-वज्ह ही आप , ख़ुद की भी फितरतों से ज़रा लड़के देखिये, ख़ुरशीद के तले जो जला दूर है वो दश्त, छत पर ही नंगे पाँव ज़रा चढ़के देखिये, होती है कारगर भी दुआ दिलसे हो अगर होगा यकीन जिद पे ज़रा अड़के देखिये, बनती है बिगड़ी बात ज़रा कोशिशें करें अपनी तरफ से खुद भी ज़रा बढ़के देखिये.. रख लीजिये तो दिलपे ज़रा हाथ साहिबान, बाबस्ता अपने किस्सा कोई गढ़के देखिये, कोई चला जो साथ में मुश्किल मुकाम तक, ता-उम्र उसके प्यार को बढ़-चढ़के देखिये... #उर्मिलामाधव.. 7.4.2015

चुभा दे जो खंजर

नज़र नीची करके चुभा दें जो ख़ंजर, ज़माने में उन सा न कोई सितमगर  अगर दिल भरा हो हज़ारों ज़हर से, वहां अपने सर को न हरगिज़ कलम कर, जो मुश्किल में,बढ़कर सहारा नहीं दें, तो मिलना, मिलाना, हर इक शै से कम कर  #उर्मिलामाधव... 7.4.2015

दाग़ ए दिल

दाग़-ए-दिल,ज़ख्म-ए-जिगर तुमको दिखाऊँ क्या क्या, रु-ब-रु जो हूँ,वो क्यूँ हूँ ऑ क्या हूँ ...बताऊं क्या क्या, तुमने इलज़ाम अभी मुझ पे लगा डाले बिना सोचे हुए, अपनी जानिब से बिना पूछे तुम्हें दर्द सुनाऊँ क्या क्या, कभी काला तो कभी लाल ...कभी रंग रंगा है गंदुम सारे रंगों से अलग हटके बनाऊं तो बनाऊं क्या क्या, कितने शिकवा-ओ-शिकायत का ज़खीरा है मेरे दामन में  बरसरे बज़्म तमाशा है कहो किसको जताऊँ क्या क्या...  #उर्मिलामाधव.... 7.4.२०१५...

तेरा साथ उल्फ़त की शबनम रहेगा

तेरा साथ उल्फ़त की शबनम रहेगा, बशर्ते के ता-उम्र बाहम रहेगा, ख़ुसूसी मुहब्बत मिली ज़िन्दगी को, तो यूँ मौत का फिर किसे ग़म रहेगा तजरिबों ने जो कुछ सिखाया है हमको, वो हो चाहे जितना, मगर कम रहेगा, जुबां से उन्हें आफ़रीं हम कहेंगे, जहाँ तक भी इस जिस्म में दम रहेगा, नहीं फ़िक़्र हमको ज़माने की हरगिज़, ज़माना हमेशा ही बरहम रहेगा, दिल-ओ-जां है क़ुर्बान जिस पे हमेशा, वो हमदम है और सिर्फ़ हमदम रहेगा, उर्मिला माधव ... 7.4.2016

हमें रेखते से मुहब्बत बहुत है

हमें रेख्ते से मुहब्बत बहुत है,  ब-अलफ़ाज़ मानी,उसूलात इसके, असल बात ये है के दिक्क़त बहुत है

क्यूं ये दिल में अजब उदासी है

क्यूँ ये दिल में अजब उदासी है? मुझमें हिम्मत तो अच्छी ख़ासी है, कैसे शिद्दत में कुछ कमी आई ? रूह तो अब तलक भी प्यासी है, ख़ूब लंबी है ज़िन्दगानी भी, लोग कहते हैं ये ज़रा सी है, एक अरसा है,एक लम्हा भी, इसकी बस बानगी हवा सी है, राह क्या देखना मसर्रत की? गो के सदियों से ग़म शनासी है.... उर्मिला माधव। .....

दर्द कांधे पे डाल रक्खा w

Maine khud ko sambhaal rakhkha hai, Dard kaandhe pe daal rakhkha hai, Gam sabhi zindagi men pinhaaN hain, Kya kahi arz-e-haal rakhkha hai? मैंने ख़ुद को संभाल रख्खा है, दर्द ....कांधे पे डाल रख्खा है, ग़म सभी ज़िन्दगी में पिनहां हैं, क्या कहीं अर्ज़-ए-हाल रख्खा है? उर्मिला माधव,

कसम न खाया करो

देखो झूटी कसम न खाया करो, सच को सच की तरह बताया करो, गर चे ख़ुद पर यकीं नहीं हो कभी, सच की क्यूं धज्जियां उड़ाया करो हम भी हर इक अदा से वाकिफ़ हैं, कम ही कुछ दून की उड़ाया करो, हम से इतना उलझना ठीक नहीं यूँ ही घर की तरफ़ न आया करो, जैसे गलियों में शोहदों की तरहा, गर चे मुमकिन है, घूम आया करो उर्मिला माधव

ख़ुद से खफ़ा हैं

बात है दरअस्ल हम ख़ुद से खफा हैं, जो हुआ करते थे हम अब वो कहाँ हैं, हम नहीं बोलेंगे ख़ुद से तब तलक अब, जब तलक दिल में जहाँ के ग़म निहाँ हैं, हमने अपने वास्ते सोचा न कुछ भी, उस पे ये इल्ज़ाम हम पर,बदज़ुबां हैं, #उर्मिला_माधव

ये जो लावा सा

ये जो लावा सा बह निकलता है, पहले सीने में ख़ूब जलता है, सारी ये क़ारसाज़ी दिल की है, वर्ना शोलों पै कौन चलता है ? ऐसा एक दर्द ही है जो हरदम, वक़्त के साथ रुख़ बदलता है।।.... #उर्मिलामाधव.... 6.4.2015

बच्चों के नाम

बच्चोँ के नाम --❤️❤️ बच्चे, कितने प्यारे-प्यारे होते हैं, सारे जग की आंख के तारे होते हैं, बीच में लेकिन बड़े खड़े हो जाते हैं, जिनसे किस्से बड़े बड़े हो जाते हैं, फिर भी ये तो राज दुलारे होते हैं, सारे जग की आंख के तारे होते हैं.. प्यार हमारा सब बच्चों को पहुंचा दो, तितली वाला रंग अलग से दिखला दो, साथ से इनके दर्द किनारे होते हैं, क्यूंकि दिल के ये उजियारे होते हैं.. उर्मिला माधव 6.4.2018

सिंदूर की डिब्बी

बाज़ार में मात्र चार रुपयों की आती है, वो सिंदूर की डिब्बी, जो बाबू ने मेरे लिए लाखों रुपयों में खरीदी थी, सिंदूर की डिब्बी और  जीवन भर की गुलामी का अनुबंध, मुझसे वो घर भी छीना था जिसे मैं अपना समझने की भूल करती रही थी, जहाँ अम्मा थीं,स्नेह शीला, एक सिंदूर की डिब्बी ने उनको भी छीना था, पराई हो जाने का ठप्पा  लगाया गया था मेरे ऊपर , जहाँ से आई थी वो मेरा घर नहीं था, जहाँ आई थी वो पराया घर था, बचपन ने यही सुना कर जवानी पर  धकेला था,तुम्हें पराये घर जाना है, मेरा मन कभी समझ नहीं पाया, कौन सा घर पराया था ? अम्मा वाला या सिंदूर की डिब्बी वाला ? कितनी बड़ी हो गई हूँ, पर ये दोहरा विषय अभी तक समझ में नहीं आया, मुझे लगता है औरत का कोई घर ही नहीं होता  उसकी अपनी कोई पहचान होती ही नहीं  यदि है भी तो एक औरत  सिर्फ एक औरत, #उर्मिलामाधव

नज़्म। जिंदगी जब कभी थका दे तो

ज़िन्दगी जब कभी थका दे तो, चल न पाओगे ये बता दे तो, आह भरने का कोई काम नहीं, ख़ुद ब ख़ुद ही उठें ऑ चलते रहें, क़ुदरतन कोई जब जगा दे तो, राह का एहतराम करते रहें, ये न सोचें कि कोई साथ नहीं, साथ देने को कोई हाथ नहीं धीरे धीरे ही सही, चलते रहें, गाहे गाहे ब ख़ुद संभलते रहें, भूल जाएं, किसीने कुछ भी कहा.. सिर्फ़ सोचें कि कोई बात नहीं, सांस जब तक है, कोई रात नहीं, धुन्ध कैसी भी हो, सवेरा है, दह्र में जब तलक बसेरा है... उर्मिला माधव

ख़ुद आइने के आगे ज़रा पड़ के देखिए

खुद आईने के आगे ज़रा पड़के देखिये, चेहरा किताब है तो ज़रा पढ़के देखिये, गैरों पे हंस रहे हैं मियाँ बे-वज्ह ही आप , ख़ुद की भी फितरतों से ज़रा लड़के देखिये, ख़ुरशीद के तले जो जला दूर है वो दश्त, छत पर ही नंगे पाँव ज़रा चढ़के देखिये, होती है कारगर भी दुआ दिलसे हो अगर  होगा यकीन जिद पे ज़रा अड़के देखिये, बनती है बिगड़ी बात ज़रा कोशिशें करें  अपनी तरफ से खुद भी ज़रा बढ़के देखिये.. रख लीजिये तो दिलपे ज़रा हाथ साहिबान, बाबस्ता अपने किस्सा कोई गढ़के देखिये, कोई चला जो साथ में मुश्किल मुकाम तक, ता-उम्र उसके प्यार को बढ़-चढ़के देखिये... #उर्मिलामाधव... 5.4.2015

कोई रिश्ता नहीं

अब मेरा अपना कोई रिश्ता नहीं, है भी तो वो ख़ास कुछ अच्छा नही, हम अगर खूं भी बहा दें प्यार में, वो किसीको ख़ास कुछ लगता नहीं, उर्मिला माधव, 5.4.2017

बे परिवाहियां

दिल ने लीं अब ओढ़ बे-परवाहियाँ, रूठ जाए रब .....या रूठे माहियां, वक़्त वो कुछ और था सुनिये ज़रा जब डराती थीं हमें ......तनहाइयां, ख़ुद अकेले ....माद्दा रखते हैं हम, क्या बिगाडेंगी ये अब रुसवाइयां, देख पाए जो न एक बारात तक, वो बजायें आजकल शहनाईयां, जिनकी आधी बात में भी दम नहीं, नापते हैं दिल की ....वो गहराइयां ..... उर्मिला माधव... 5.4.2018

जज़्बात कहां से लाएंगे

मुर्दे हैं, जज़्बात कहाँ से लाएंगे, फिर बीते लम्हात कहाँ से लाएंगे, ख़ाक हो गए वीराने में जलके जो, रंग रंगीली, रात कहाँ से लाएंगे, ख़ुश्क हो गए, आंसू जिनकी आंखों में, ख़ुशियों की बरसात कहाँ से लाएंगे, कभी हुजूमे मेहमाँ था इस आंगन में, फिर से वो सौगात कहाँ से लाएंगे, चाहे जो तूफ़ान उठा दें लफ़्ज़ों से, उल्फ़त की इफ़रात कहाँ से लाएंगे, जड़े हुए थे चांद सितारे चूनर में, वो जगमग, बारात कहाँ से लाएंगे, तुम अपनी मीज़ान पे रखके मत तौलो, घातों के इलमात कहाँ से लाएंगे, उर्मिला माधव,

चांद गोरा लग रहा है

मेरी दोस्त के लिए.... :) ------------------------- बदलियों में चाँद गोरा लग रहा है, कोई अन्ग्रेजन का छोरा लग रहा है, चल सखी चंदा उतारें आसमाँ से, ठीक है पर जायेंगे बोलो कहाँ से ? बाग़ में झूला लगायेंगे शजर पर , बैठ कर दोनों उड़ेंगे साथ उस पर, जो ज़रा सी पींग भर लेंगे हवा में, झट्ट से पहुंचेंगे दोनों आसमाँ में, एक सिरा थोडा ज़रा सा थाम लेना, मेरी खातिर काम को अंजाम देना , उर्मिला माधव.. 4.4.2014...

कमाल किया है

एक मतला,दो शेर--- ----------------------- तुमने यार कमाल किया है, क्या-क्या इस्तेमाल किया है, इश्क़ लड़ाया,माल भी ऐंठा  गरदन काट हलाल किया है?? जिसको कहा हक़ीर किसीने, उसका इस्तक़बाल किया है.... उर्मिला माधव... 4.4.2014..

नहीं सा’ब जी

एक मतला दो शेर .... ------------------- ज़ख्म दिल के छुपालो कहीं सा'ब जी, गर है हिम्मत चुका लो यहीं सा'ब जी, कुछ मुझे भी बता दो,ग़मों की दवा, जो अगर दिल संभालो कहीं सा'ब जी, खूब आंसू ये आहें,ये गम के धुंए, क्या ज़हर जाके खालो, ?नहीं सा'ब जी... उर्मिला माधव... 4.4.2015

ग़म कुछ

हमसे देखा नहीं गया ग़म "कुछ", इसलिए फ़ासला किया कम "कुछ" अब जरा छुपके हमसे फिर देखो, तब ये जानोगे अब गया दम "कुछ" पर्दा दारी के हम भी क़ायल हैं, कम न रखते हैं जी हया हम "कुछ" क्या है अब हाल हमको बतलाओ, दिल कहीं अब ज़रा गया थम "कुछ"? उफ़ ग़ज़ब है अजीब फितरत है फिर से आँखों में है नया नम "कुछ".. #उर्मिलामाधव.... 4.4.2015

क्या है ख़ूबी

क्या है ख़ूबी बता तेरे किरदार में? चारागर देखियो,क्या हूं बीमार मैं? न तो नज़ला है और न तपैदिक मुझे, क्यों भला तुझको पूछूँ भी हर बार मैं? उर्मिला माधव, 4.4.2017.

तस्वीर तक दिखाते नहीं

लोग तस्वीर तक दिखाते नहीं, उसपे कहते हैं आप आते नहीं..... पर है अंदाज़ कुछ जुदा अपना, हम भी ऐसे हैं कुछ छुपाते नहीं, हाँ मुहब्बत की बात दीगर है, दिल में तूफ़ान है जताते नहीं, उर्मिला माधव....

यही तो बात है सईयो

यही तो बात है सइयो, ...हमें झुकना नहीं आता, अगर हम सर झुकाते तो हमारी जां निकल जाती, तो फिर जीने के क्या मानी, कहानी ही बदल जाती, हमें तसलीम करने का .......सलीक़ा ही नहीं आया, अगर आता तो हर मुमकिन, तबीयत भी संभल जाती, उर्मिला माधव

कह गए

उनको जो कहना था खुल के कह गए, हम तो बस दूरी बनाते रह गए, हमने जिनके वास्ते छोड़ीं कभी ख़ुद्दारियाँ, वो हमें नश्तर चुभा कर मुस्कुराते कर रह गए.. उर्मिला माधव

सब कुछ ढोना पड़ता है

बिल्कुल तनहा सब कुछ ढोना पड़ता है, इस दुनियां में क्या-क्या खोना पड़ता है, हैरत है ये किसकी कारगुज़ारी है, जो काटा है, फिर फिर बोना पड़ता है, ख़ास मशक़्क़त करते हैं सब हंसने को, और यकायक, हंस के रोना पड़ता है, ख़ास मनाज़िर सामने आते रहते हैं, ख़ाली दिल को रोज़ भिगोना पड़ता है थक जाते हैं, लोग वजाहत देते हुए, मीज़ानों पे जब जब सोना पड़ता है उर्मिला माधव

भला उसको क्या कहेंगे

भला उस को क्या कहेंगे, जो तिश्नगी न समझे, ये जुनून-ए-इश्क आखिर,गया रायगां हमारा, उसे कमसिनी में देखा, कभी भूल ही न पाए, रहे इश्क में झुलसता रहा आशियां हमारा उर्मिला माधव

कुत्सित प्रणय की

भावनाएं होगईँ, कुत्सित प्रणय की, आस्था के पांव पीले पड़ गए, वृक्ष की शाखाएं विचलित हो गईं और हरे पत्ते सिकुड़ कर झड़ गए, एक मुट्ठी छांव भी मिलने न पाई, और पथिक अविराम गति से लड़ गए, अनवरत ही आज कृन्दन चल रहा, कंटकों के जाल अविरल गड़ गए, होगया दूषित विषम, वातावरण, हर हृदय के घाव इतने सड़ गए... उर्मिला माधव, 3.4.2017

सदमे झेले बेशुमार

सदमे झेले, बेशुमार पर तनहा चलना सीख गए, सूरज के अंदाज़ में हम भी सीधा ढलना सीख गए दिल पर जब-जब ठेस लगी, दिल टूट गया और सहम गया, पर ख़ामोशी से आरिज़ पर हम गिरया मलना सीख गए, उर्मिला माधव

किससे कितनी कहां निभानी है

किससे,कितनी,कहाँ निभानी है, फ़िक़्र क्या,ज़ीस्त आनी-जानी है, ये तो रिश्ते हैं, ग़म गुसारी के, इसमें दुनियां कहाँ सुहानी है? तुम समझते हो हम ही नादाँ है? दिल तजुर्बों की राजधानी है जितनी निभनी थी निभ गई हमसे, अब ये गुज़री हुई कहानी है, ज़िन्दगी हमसे सिर्फ़ वाबस्ता, ये समझना भी बे मआनी है... उर्मिला माधव....

दिग्भ्रमित मानव जगत में

दिग्भ्रमित मानव जगत में, सत्य है सम्पूर्ण अविदित, झूठ केवल उच्चरित है, आस्था के पांव टूटे, प्रेम के सब भाव रूठे, आवरण खोले न जाएं शब्द कटु बोले न जाएं जब हृदय ही हो अबोला भाव भी तोले न जाएं... उर्मिला माधव

दिल नवाज़ो से रहेगी

ख़ास दूरी दिल नवाज़ों से रहेगी, दोस्ती अब बे नियाज़ों से रहेगी, लफ़्ज़ ही तो दिल हमेशा तोड़ते हैं, अब मुहब्बत सिर्फ़ साज़ों से रहेगी, सादगी में ज़ुल्म के क़िस्से बहुत हैं, बरहमी क्या ख़ाक बाज़ों से रहेगी  जो भी हमको चाहिए वो आपसे क्यों? सारी हसरत कारसाज़ों से रहेगी.. ये बुलंदी और ख़ुदी जो भी है यारब, ज़िंदगी के साथ नाज़ों से रहेगी.. उर्मिला माधव 

आशियां हमारा

भला उस को क्या कहेंगे, जो तिश्नगी न समझे, ये जुनून-ए-इश्क आखिर,गया रायगां हमारा, उसे कमसिनी में देखा, कभी भूल ही न पाए, रहे इश्क में झुलसता रहा आशियां हमारा उर्मिला माधव 

रुतबा दिखा रहे हैं

रुतबा दिखा रहे हैं,इल्म-ओ-ख़िताब वाले, हैरत में पड़ गए हैं,इज़्ज़त-ओ-आब वाले, कितनी मुख़ालफ़त है, आए हुजूम लेकर, आंखें मिला रहे हैं, ईमान-ओ- ख़ाब वाले, जज़्बात मांगती है, हर्फ़-ओ-अदब की दुनियां, गिनती सिखा रहे हैं,कागज़ किताब वाले, दावा ही कब किया है,फ़नकार हम हैं यारब, फिर भी सवाल लेकर,आए हिसाब वाले, सबको है ये तअज्जुब,ज़िंदा हैं हम अभी तक, तूफां से लड़ सके हैं, बस इज़तराब वाले बाद-ए-सबा में हर सू कीलें उछल रही हैं, सूली से कब डरे हैं , ईसा की ताब वाले, उर्मिला माधव,

बदलते रहते हैं

दुनिया के हालात बदलते रहते हैं, दुनिया वाले बात बदलते रहते हैं, बेचैनी में कोई कहां कब सोता है, सब करवट दिन रात बदलते रहते हैं, कोई फ़ैसला कहीं नहीं ले पाता है, अब सबके जज़्बात बदलते रहते हैं, कोई भरोसा नहीं रहा अब मौसम का  जब तब ये बरसात बदलते रहते हैं,