कितना खोना होता है
इस दुनियां में आकर सबको, कितना खोना होता है,
पहले यार बतादे मुझको, कितना रोना होता है।
दीवारों से लग कर बैठें, नींद न आए रातों को,
तब फिर सूरज के उगने पर, कितना सोना होता है।
आंखें मल कर थक जाते हैं,कब तक आरिज़ सुर्ख़ रखें
तक़लीफ़ों का बार भी आख़िर कितना ढोना होता है।
उर्मिला माधव
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