गुल नहीं बुलबुल नहीं
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गुल नहीं बुलबुल नहीं तुम गुलबदन कहदो मुझे,
अपने गुलशन की फ़िज़ाँ का रंग-ए-गुल देदो मुझे,
अपने शाने पर मेरा सर देखना तुम दम ब दम,
अपनी साँसों की तपिश का ज़लज़ला देदो मुझे,
और उसी अन्दाज़ में मर जाऊँ है ख़्वाहिश मेरी,
तुम ज़ुबाँ से हाँ कहो एक सिलसिला देदो मुझे ।।....उर्मिला माधव
25.2.2013
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