जोशे उल्फ़त में
जोशे उल्फ़त में सू ए दिलबर चली जाती हूँ मैं,
उनके अन्दाज़-ए-तग़ाफ़ुल से बिखर जाती हूँ मैं,
सब जमाल-ए-इश्क़ और जज़्बे अना को भूल कर,
वो सुनें या ना सुनें,दस्तक दिये जाती हूँ मैं,
ख़ूब है ये वाक़या इस दिल पै हँसने के लिए,
कि तोड़ते जाते हैं वो और जोड़ती जाती हूँ मैं।...Urmila Madhav
24.4.2013
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