इतना समझ रहे थे
इतना समझ रहे थे कि अब थक गए हैं हम,
पर ज़िन्दगी की आख़री हद तक गए हैं हम,
रुसवाइयों का शोर ही इस दरजा लद रहा
क्यूं अजनबी से शह्र में नाहक गए हैं हम,
हम अपने तौर पर तो बहुत चुप ही थे मगर,
अंदाज़ा हो रहा था कि कुछ बक गए हैं हम,
उर्मिला माधव
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