बे परिवाहियां

दिल ने लीं अब ओढ़ बे-परवाहियाँ,
रूठ जाए रब .....या रूठे माहियां,

वक़्त वो कुछ और था सुनिये ज़रा
जब डराती थीं हमें ......तनहाइयां,

ख़ुद अकेले ....माद्दा रखते हैं हम,
क्या बिगाडेंगी ये अब रुसवाइयां,

देख पाए जो न एक बारात तक,
वो बजायें आजकल शहनाईयां,

जिनकी आधी बात में भी दम नहीं,
नापते हैं दिल की ....वो गहराइयां .....
उर्मिला माधव...
5.4.2018

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