क्या–क्या न दर्द ढोते थे
पहले क्या-क्या न दर्द ढोते थे,
ख़ूब हम दिल ही दिल में रोते थे,
जाने कितनी अदाएं,देखी हैं,
लोग भी क्या टशन में होते थे!!
बात इतनी है अय जहां वालो,
ग़लतियां सारी,हम ही बोते थे,
चोट खाकर फ़िज़ूल बातों की,
दिल ऑ दामन बहुत भिगोते थे,
बेअसर है हर इक अदा अब तो,
सोचते हैं के हम क्या होते थे !!
फाइनल ये समझ में आया है,
बात कुछ भी हो हम ही खोते थे...
😊 (खोते--गधे)
उर्मिला माधव...
23.4.2016
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