दाग़ ए दिल
दाग़-ए-दिल,ज़ख्म-ए-जिगर तुमको दिखाऊँ क्या क्या,
रु-ब-रु जो हूँ,वो क्यूँ हूँ ऑ क्या हूँ ...बताऊं क्या क्या,
तुमने इलज़ाम अभी मुझ पे लगा डाले बिना सोचे हुए,
अपनी जानिब से बिना पूछे तुम्हें दर्द सुनाऊँ क्या क्या,
कभी काला तो कभी लाल ...कभी रंग रंगा है गंदुम
सारे रंगों से अलग हटके बनाऊं तो बनाऊं क्या क्या,
कितने शिकवा-ओ-शिकायत का ज़खीरा है मेरे दामन में
बरसरे बज़्म तमाशा है कहो किसको जताऊँ क्या क्या...
#उर्मिलामाधव....
7.4.२०१५...
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