मेरे बेटे मधुवन की ग़ज़ल

मेरे बेटे मधुवन का कलाम...

ऐसा लगता है कि कुछ होगा मगर होता नहीं,
रास्ता वा है मगर अपना सफ़र होता नहीं,

वक्त की उन साअतों का भूलना पूरी तरह,
उस तरफ़ तो हो गया है पर इधर होता नहीं,

इन हवाओं में वही आवाज़ है उसकी निहाँ,
वो कहीं कुछ बोलता है पर नज़र होता नहीं,

है कमाल-ए-वक़्त जो है आज चर्चा आपका,
वरना कोई भी यहाँ पर बाहुनर होता नहीं,

इश्क़ में उसके ये दिल बेदार है अब इस क़दर 
होश खो देता है लेकिन बेख़बर होता नहीं,

दार पे चढ़के भी उसका ज़िक्र है दर ख़ासो आम, 
वो फ़ना तो हो गया है, बेअसर होता नहीं....

Madhuvan Rishiraj

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