ग़ुलामी ही छोड़ दी
वो इक नज़र कि हमेशा ग़ुलाम थे जिसके,
वो छिन गई तो हमने ग़ुलामी ही छोड़ दी,
उतने सह्ल कहाँ है भला इस जहां के लोग,
हमने कोई भी दुनिया, बनानी ही छोड़ दी,
वो आंख मुद गई तो वहीं वक़्त रुक गया,
हमने वफ़ा की शमअ जलानी ही छोड़ दी,
उर्मिला माधव,
10.5.2019
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