नज़्म कोरोना के वक़्त
नज़्म
अजीब वहशत सी हो रही है,
के घर के कोने झिझक रहे हैं,
मुसीबतों के अलम खड़े हैं,
सो अब ये कोने भी बच रहे हैं
हमारी सूरत से ऊबते हैं,
ये सोचते हैं हमारी बाबत,
के घर के लोगों को क्या हुआ है,
ये सब कभी भी कहीं न जाते,
अजब है घर में पड़े हए हैं,
खुली हवाएं कहाँ गई हैं,
न कोई मेहमान आए घर में,
ये सब जो आपस में हंस रहे हैं,
मगर ये झूठी हंसी है सब की,
हवाई चेहरों पे उड़ रही है,
अजीब उलझन से लड़ रही है,
दुआएं करता हर एक कोना,
के ख़त्म हो जाए ये कॅरोना,
उर्मिला माधव
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