ब्यूटी की ग़ज़ल
मेरी भतीजी विजयश्री उपाध्याय की बहुत सुन्दर रचना...
रुह पे भरपूर छाले हो गए हैं
देख सारे रंग काले हो गए हैं।।।।
जो हुआ अच्छा हुआ ,कहते रहे हम
वक़्त के हम भी हवाले हो गए हैं।।।
किस तरह मिल पायेगा भी रास्ता अब
हर तरफ मकड़ी के जाले हो गए हैं।।
कुछ गलत करते नहीं हैं जान के हम
कोठरी में हाथ काले हो गए हैं।।
क्या करें,जाएँ तो अब जाएँ कहाँ हम
हम भी तो घर से निकाले हो गए हैं।।
VijayShree Upadhyay...
19.5.2015...
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