वो तख़्त पर जो शख़्स था वो नशी रहा, नहीं रहा,
दिलों में एक रोज़ भी मकी रहा, नहीं रहा
गली गली ये हादिसे घड़ी घड़ी के वसवसे
किसीको गली साँस का यकी रहा नहीं रहा
नज़र से लोग गिर गए, ज़रा उरूज क्या मिला,
जहां पे जिसका ज़र्फ़ था, वहीं रहा, नहीं रहा
अहमद ख़लील ख़ान
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