दिल्ली के कनॉट प्लेस के भिखारियों को देख कर
भीगी आँखें,दामन मैला और बहुत दुखियारे लोग,
गली-गली धक्के सब खाते फिरते मारे-मारे लोग,
दिन बीता दामन फैलाते,रातों को,पुरज़ोर शराब,
लाल सुर्ख आँखें जब देखीं,होगए एक किनारे लोग,
जिस्म झूलता पैरों पर ऑ वहशत तारी आँखों पै,
गिर कर बिलकुल ढेर होगये,बेबस हारे-हारे लोग,
मायूसी जब देखी इनकी पीर उठ गई दिल में खूब,
खुदपै हमें रहम हो आया,निकले जब नाकारे लोग,
ख़ुद को ही बर्बाद कर रहे,दुनिया के फटकारे लोग,
ठोकर पै रखते दिल सबका,यही बहुत बेचारे लोग,
उर्मिला माधव...
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