इनसान पर बनी है

चंद अशआर 

नज़रें झुका के देखा जी जान पर बनी है 
कहते भी नहीं बनता अरमान पर बनी है 

एहसास मर रहे हैं तनहाइयों से घुटकर,
इंसानियत की ज़द में इन्सान पर बनी है,

चलना है ग़ैर मुमकिन इस राहे बेख़बर में,
दुश्वारियाँ हैं इतनी, ईमान पर बनी है।।
उर्मिला माधव..

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