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Showing posts from March, 2020

इल्ज़ाम थे

खून के रिश्ते जो मेरे नाम थे, ज़िन्दगी के वास्ते इल्ज़ाम थे, हक़ अदा करते रहे रुसवाई का, अश्क़ मेरे जा-ब-जा बदनाम थे, फासलों की बढ़ गयी रस्सा-कशी, जो तग़ाफ़ुल का लिए पैग़ाम थे, था मुहब्बत का जिन्हें दावा बहुत, मुश्किलों के वक़्त वो नाकाम थे, एक तिनका जो मिला सौग़ात में, कीमती था और उसी के दाम थे,  आज उसके नाम से जिंदा हूँ मैं, जिसके छोटे हाथ छोटे ग़ाम थे... उर्मिला माधव... 1.4.2014...

बिता देते हैं

लोग गफ़लत में बहुत उम्र बिता देते हैं, अपने जज़्बों को बहुत ख़ूब सज़ा देते हैं, हमसे दिलदार ही दुनियां में धुआं होके भी, खाक़ लेते हैं ज़मीं पर से, उड़ा देते हैं,  ग़म ख़ुशी,मौत दुआ और हजारों मसले,  कुछ भी लिखते हैं हथेली पै,मिटा देते हैं, बात का रंग,ज़ुबां शीरीं,शहद के माफ़िक, अपने लफ़्ज़ों में मिला कर ही दुआ देते हैं, वक़्त आता है जबीं छू के निकल जाता है, हम ज़माने को फ़क़त हंस के दिखा देते हैं, #उर्मिलामाधव ... 1.4.2015...

तार-तार हुए

ऐसी नज़रों के परस्तार हुए, जिस्मों जाँ दोनों तार-तार हुए, आज दिल ये सवाल करता है, बे सबब ऐसे क्यूँ निसार हुए, फूल बन कर क़रीब आए थे, दूर जाके वो कैसे ख़ार हुए, लोग कहते हैं तजुर्बा अक्सर, नादाँ दिल कब किसीके यार हुए।।  उर्मिला माधव... 1.4.2015

हरगिज़

दिल मेरा लग नही रहा हरगिज़, कोई दिल पर मिरे हुआ क़ाबिज़, ख़ुद ही ख़ुद को मनाती रहती हूं, भीग जाते हैं हर दफ़ा आरिज़, नज़्र अंदाज़ लाख़ करती रहूँ, दिल मुझे रोज़ कर रहा आजिज़ उर्मिला माधव, 1.4.2017

देखती हूँ मैं तुम्हें

ख़्वाब में नहीं, देखती हूँ मैं तुम्हें इन सूखते हुए दरख्तों में, तुम सुब्ह की धूप से हो, कुछ बसंती रूप से हो, इन फ़ज़ाओं में  तुम्हारी खुशबुएँ,बिखरी हुईं हैं, ज़र्द पत्ते इन दरख्तों की हदें कहते हुए, तुम मगर इनमें नहीं हो, सब्ज़ पत्तों में लिखा है, रंग तुम्हारा, तुम हरे परचम से लगते हो मुझे, ख़ूब हो पर कम से लगते हो मुझे, इक धुंधलके में भी तुमको देखती हूँ, तुम सलेटी रंग में लिपटे हुए से, रात की गहरी सियाही ला रहे हो, जब सुब्ह होगी तो पत्ते फिर गिरेंगे, फिर सुब्ह की धूप सा तुमको, निकलना है यहाँ, और तुम इक ज़र्द परचम से  लगोगे फिर मुझे, और फिर इस धूप को देखेगा कौन? उर्मिला माधव.. 1.4.2017

आसमां में

कुछ सितारे टांक दूं क्या आसमां में ? या कहीं चस्पां करूँ हुस्न-ए-जवां में ? ग़र कोई ख़ुशबू सुंघाई दे कहीं तो, प्यार की दुनिया लुटा दूं क्या जहां में ? खूबरू हैं सैकड़ों चेहरे ज़मीं पर, सोचती हूँ,वो कहाँ हैं और कहाँ मैं ? हौसले परवाज़ के दिल में बहुत से, दिल नहीं करता करूँ हरगिज़ अयां मैं, मुन्तज़िर खामोशियाँ कहने लगीं अब, वक़्त आने पर करूँ सब कुछ बयां मैं.... #उर्मिलामाधव... 31.3.2015..

बांसुरी

पुराने पन्नों से---- ------------------ बाँसुरी तुमको बनाना चाहती हूँ, अपने होठों से लगाना चाहती हूँ, और कोई गीत चाहे गा न पाऊँ, सिर्फ तुमको गुनगुनाना चाहती हूँ, सपने जो भी मेरी आँखों ने सजाए, वो मैं सब तुमको सुनाना चाहती हूँ, मुझको इतनी दूरियाँ जँचती नहीं हैं, तुमसे मिलने को बहाना चाहती हूँ।।... #उर्मिलामाधव... 31.3.2015

नातवानी देखिए

आप हर इक ज़िन्दगी की नातवानी देखिए, अब न तहरीरें ज़रूरी, मुंहजबानी देखिए,

मुहब्बत

आपके चेहरे की रौनक उड़ गई है, क्या किसी से फिर मुहब्बत हो गई है ? उर्मिला माधव

अधूरा लगता है

सखियाँ कहतीं,साजन के बिन प्यार अधूरा लगता है, अम्मां कहतीं काजल बिन....सिंगार अधूरा लगता है, चाहे जितनी बिजली चमके,घर की सभी मुंडेरों पर, बारिश के बिन बादल का...हर वार अधूरा लगता है, हीरे मोती जड़े रहें और धार भी हो.....तलवारों पर,   युद्ध वीर के हाथों बिन...हथियार अधूरा लगता है, भारी भरकम दरवाजों पर.......सजी हुई मेहराबें हैं, बेटी की बारात बिना......हर द्वार अधूरा लगता है,  सदियों से कुछ नाम लिखे हैं जगह-जगह दीवारों पर, सत्य सनातन,शिव के बिन विस्तार अधूरा लगता है, उर्मिला माधव... 30.3.2014...

आशियाँ हमारा

Rahi aarzoo ke hota koii hamzubaaN hamaaraa, Hame raah bhi dikhaata koii hai kahaN hamara,  Game izne guftgu se, jahan dar rahe hain ham sab, WahaN kaise ham banaa len  Koii aashiyaN hamaara, यहीं इक क़फ़न में शामिल कई लोग हो गए थे, तनहा सा अब खड़ा है यहीं आशियाँ हमारा,

चाक पर

Zindagi kab kab huii hai motar, Ek pal hazir hai, ik pal khhaak par, Ye to kuzagar ki marzee hai mahaz, Jab talak chaahe, ghumaae chaak par. ज़िंदगी कब-कब रही है मोतबर, एक पल हाज़िर है, इक पल ख़ाक पर, ये तो कूज़ागर की मर्ज़ी है महज़, जब तलक चाहे घुमाए चाक पर, उर्मिला माधव

ऊपर रखो

चार शेर.. पार करना है तुम्हें दरिया अगर, पाँव अपने, आब से ऊपर रखो मंज़िलों की दूरियां  क्यों नापना, ख़ुद को बस गिरदाब से ऊपर रखो, नींद अपनी ख़्वाब में आ जाएगी, आंख लेकिन ख़ाब से ऊपर रखो, गुफ़्तगू अनहद से भी हो जायेगी, उंगलियां मिज़राब से ऊपर रखो, उर्मिला माधव 29.3.2018

मतला-- देखा किये

जाने वाले तुझको हम,...बस,दूर से देखा किये, कह सके कुछ भी नहीं...मजबूर से देखा किये, #उर्मिलामाधव... 29.3.2015..

कम देखा होगा

आधा ही ग़म देखा होगा,  इसीलिए कम देखा होगा, बारिश का जलवा नींदों में,  खूब झमाझम देखा होगा, बड़े दरख्तों की शाख़ों पर,  पत्तों को नम देखा होगा, बिना पंख जब उड़ा तखैयुल,  चाँद को मध्धम देखा होगा, पुर सुकून आँखों का मंज़र ??  आब-ए-जमजम देखा होगा...  ------------------------------------- aadhaa hii gam dekhaa hogaa,  isiliye.......kam dekhaa hogaa, baarish ka jalwaa niindon main,  khoob jhamaajham dekha hogaa, bade darakhton kii shaakhon par,  patton ko nam dekhaa dekha hogaa, binaa pankh jab udaa takhaiul,  chaand ko madhdham dekhaa hoga, pur sukoon aankhon ka manzar ?? aab-e-jamjam dekhaa hogaa...  #उर्मिलामाधव... 29.3.2015

मिला नहीं है

लो तुमने ख़ुद ही तो कह दिया, है सफ़र अकेले भी ख़ूब मुमकिन, तो फिर क्यूँ उससे शिकायतें हैं,जो तुमसे अब तक मिला नहीं है, ज़माने भर को नसीहतें हैं,बस एक अपने जुनूँ की ख़ातिर ? मगर ये पथ्थर तो मील का है जो आँधियों में हिला नहीं है.. उर्मिला माधव 29.3.2016

एहतराम करना है

सुब्ह उठना है काम करना है, वक़्त का एहतराम करना है, जब गिनी जाती यौम-ए-पैदाइश, मौत का ही क़याम करना है, उठती-गिरती,हज़ार साँसों को, आख़िरी एक सलाम करना है, ज़िंदगी तेरे कुछ तकाज़े हैं, उम्र को तेरे नाम करना है, हमको दोज़ख़ हराम हो आख़िर, इसका भी इंतज़ाम करना है  ------------------------------------------------ ------------------------------------------------ Subh uthn'a hai kaam karn'a hai, Umr ko tere na'am karn'a hai, jab gini'i jati yaum-e-paidaish, maut ko hi'i qayaa'm karna hai, uth'ti,gir'ti haza'ar sans'on ko, aakh'ri ek sala'am,karn'a hai, zindag'i tere kuchh taqaze hain, unk'a bhi'i ehatra'am karn'a hai' hamko dozakh hara'am ho aakhir, isk'a bhi'i,intza'am karn'a hai, Urmila Madhav.... 29.3.2017 qaya'm--- thikana

पड़ी लगती है

सबकी तक़दीर सितारों से जड़ी लगती है, अपनी सुनसान चनारों में पड़ी लगती है, उर्मिला माधव.. 27.3.2013

क्या करते हैं हम

एक मतला दो शेर--- -------------------- बे-वज्ह इस जीस्त पे मरके भी क्या करते हैं हम, मरके जीने के इलावा.......और क्या करते हैं हम ?? चश्म-ए-गिरियाँ,टूटते दिल,और फ़क़त,तन्हाइयां, दर्द पीने के इलावा..........और क्या करते हैं हम ?? चाक़ दामन,हाल खस्ता........और कुछ पैबंद बस , ज़ख्म सीने के इलावा.......और क्या करते हैं हम ?? उर्मिला माधव... 27.3.2014...

सफ़ेदी है

ये तो क़िरदार की सफेदी है, इसको एक उम्र मैंने देदी है , गोकि हर सम्त ख़ून रिसता है,  ज़िंदगी इस तरह से छेदी है, तह में चिंगारी इक सुलगती सी,  बुझने वाली थी,.. फिर कुरेदी है, उर्मिला माधव ... 27.3.2015..

शिकस्ता जिस्म

ग़ज़ल----- शिकस्ता जिस्म लेकर ही जो चलना है तो चल लेंगे, अगर मुमकिन नहीं होगा तो दुनियाँ से निकल लेंगे, ज़रुरत क्या हमें सोचें कोई माज़ी ऑ मुस्तकबिल, दुआ के वास्ते हरगिज़ न हाथों में रहल लेंगे, क़दम दो चार भी चलना अगर हमको हुआ मुश्किल, किसी चिकनी सतह पर पाँव रख्खेंगे फिसल लेंगे, कभी जब ला मकां से लाएगा कासिद तलब नामा, करेंगे दस्तखत फ़ौरन, कहेंगे क्यूँ कि कल लेंगे, कहीं ख्वाहिश बची होगी, पलट कर लौट आने की,  किराया ज़िंदगी देकर नया फिर घर बदल लेंगे, ----------------------------------------------------------- shiqastaa jism lekar hii jo chalnaa hai to chal lenge, agar mumkin nahin hogaa,to duniyaan se likal lenge, zaroorat kya hamen sochen,koi maazii o mustaqbil, duaa ke waaste hargiz n haathon main rahal lenge, qadam do chaar bhii chalna agar hamko huaa mushkil, kisi chiknii satah par,paanv rakhhenge......phisal lenge, kabhii jab la-makaan se laayegaa qasid talabnaamaa, karenge dastkhat fauran,kahenge,kyun....ki kal lenge, kahiin khwaahish bachii hogi,palat kar laut aane kii, kiraayaa zindag...

हुआ ही चाहती है

मुझपे बस काबिज़ हुआ ही चाहती है, एक शै जो सिलसिला ही चाहती है, मैं खरी उतरूं अबस ,उम्मीद पर, वो मेरा हरदम बुरा ही चाहती है, मैं कड़े फिकरों से गुजरूँ,रात दिन, अपने हक में बस दुआ ही चाहती है, मैं गुज़रती हूँ,.........हज़ारों तन्ज़ से, ज़ख्म दिल के वो छुआ ही चाहती है, मैंने भी बाज़ी रखी,उस ज़ीस्त पर, खेलना जो बस जुआ ही चाहती है... उर्मिला माधव ... ========================== Mujh pe bas qabiz hua hi chahti hai, ek shai ab silsila hii chahti hai, main khari utrun abas ummid par, wo mera hardam bura hi chahti hai, main kade fikron se guzrun,raat din, apne haq main bas duaa hii chahti hai, main guzarti hun,hazaaron tanz se, zakhhm dil ka wo chhua hi chahti hai, maine bhi baazi rakhi us ziist par, khelna jo bas juaa hii chahti hai... #उर्मिलामाधव... 26.3.2016

ज्योतिर्गमय

पंछी खोजते हैं  हरे जंगल, पानी के स्रोत, हरे तिनके, रिमझिम बरसात, छोटे छोटे पानी में स्नान, किलोल करते हुए पंछी लेकिन कैसे? वृक्षों की नियति कट जाना, मनुष्यता से गिरना ही  आधार है विनाश का, प्यास से मरते हुए  छोटे से प्राणी, सूखी हुई धरती, तेज़ हवाएं, सूखे पत्तों की चरमराहट, पक्षियों का भय बनी हुई, क्या है अंतर, श्मशान और  साधरण जन जीवन  एक सा ही तो है, म्रत्यु पर्यंत आपा धापी, और सब समाप्त ... काश कोई सत्य की ओर लेजाता, तमसो मा ज्योर्तिगमय: उर्मिला माधव

गुलशन है

दुनिया तो कहती है, दुनिया रौशन है, पर मेरी दुनिया से बिल्कुल अनबन है, अपना चेहरा, अपनी बातें, अपना दिल, अपने ही घर को कहते हैं, गुलशन है उर्मिला माधव

कसम से

हमको लगता है कि तुम एक चाँद हो, चाँद ही तो दूर रहता है सनम से  सच, कसम से, चांदनी आती है मेरे घर के दर तक, तुम कहीं आजाओ तो मर जाएँ धम से  सच, कसम से, शर्म की पाजेब पांवों में है मेरे हो सके तो आके तुम मिल जाओ हमसे  सच, कसम से, एक दिन दुनियां से हम उठ जायेंगे बस, बाद उसके रोओगे तुम दर्द-ओ-ग़म से  सच कसम से, वो तुम्हारे आंसुओं से कम रहेगी, जो सहन में होगी बारिश,खूब,झम से  सच कसम से, अब भी तुम आ जाओ अब भी वक़्त है, सांस रुक जायेगी इक दिन एकदम से  सच,कसम से, उर्मिला माधव... 16.3.2016

पढ़े ही कब थे

ख़्वाब तुम्हारे गढ़े ही कब थे, तुम इस दिल में,चढ़े ही कब थे ? ख़ुद खींची जो लकीर हम ने, उस से ज़्यादा बढ़े ही कब थे? तुम से प्यार का शिकवा कैसा', तुम ये लफ़्ज़, पढ़े ही कब थे ? उर्मिला माधव 26.10.2017

मंज़र मुझे

इस क़दर भारी पड़ा, दुनियां का हर मंज़र मुझे, दश्त सा लगने लगा मेरा ही अपना घर मुझे, हादसों की हर नफ़स बरपा हुईं सर गर्मियां, क्या बताऊँ किस क़दर लगने लगा था डर मुझे, गर ख़ुशी को वक़्त कम था,ग़म भी तो मसरूफ़ थे, अब बचा इक चैन जो दरकार था ,पल भर मुझे, यक़-ब-यक़ हंगामा-ए-ग़म, ख़ुद में पिन्हा हो गया, कर दिया घबराहटों ने बद से भी बदतर मुझे, उर्मिला माधव।। 17 .8 .2017

बल खाते हो

इतनी सारी आग कहाँ से लाते हो, बात-बात पे बेजा ही बल खाते हो कितनी सारी भीड़ भरी है दुनिया में, बे-मतलब तुम तनहा ही चिल्लाते हो, जो दुनिया ने किया, वहीं तुम आ पहुंचे, यार ग़ज़ब हो, अपना-अपना गाते हो 🤔 दुनिया भर का प्यार तुम्हीं को बख़्शा है, लौट-लौट कर तुम आंखें दिखलाते हो, उर्मिला माधव

डरो हो

पारसाई की नुमाईश क्यों करो हो ? ख़ामियाँ ख़ासी नहीं तो क्यों डरो हो ? वो मुसलसल पीठ दिखलाता रहा है, ग़ैर की चाहत में नाहक़ क्यों मरो हो ? #उर्मिलामाधव.... 24.3.2015

फ्री वर्स---बिखरी हुई पत्तियां

समेटना, बिखरी हुई पत्तियों का, सरल नहीं, तोडना, टूटी हुयी टहनियों का, बहुत सरल है, पर आवाज़ का क्या करोगे? जो तोड़ने से हुई, पर हाँ, किसीके टूटने-जुड़ने से, कोई आहत नहीं होता, ये निजता की बात है, कभी किसी वृक्ष की छाया, भली लगती है, क्यूंकि उसमें हरियाली जो है, कभी किसी वृक्ष का खड़े रहना, भी सालता है, दूषित मन को, क्यूंकि सूखा हुआ वृक्ष किस काम का? पत्तियां तो सूख गईं, और उनका हरा होना  मुमकिन नहीं, अब मुक्त आकाश, में जीवन है  क्यूंकि  क्षितिज के पार भी कोहरा हो सकता है, पर अंतर्दृष्टि चाहिए होती है, एक गहरी अंतर्दृष्टि, पंछियों को आज़ाद रहना भाता है, बंदी होकर कोई सृजन नहीं होता... सिर्फ रुदन होता है, और रोना कौन चाहता है....?? पर तुम्हें कौन समझाए.....?? उर्मिला माधव.. 24.3.2016

चलते रहे

साथ मेरे तुम ही तुम चलते रहे, ख़ाब बन कर आँख में पलते रहे, नींद में झपकाईं पलकें जो कभी, हाँ ये सच है,आँख तुम मलते रहे, है मुझे हैरत रहे तुम बे-वफ़ा !! और अदू के साथ भी चलते रहे! क्या सुकूं पाया जला कर आग में, ख़ुद भी अपनी आग में जलते रहे, ग़र समझते हो अगर खुर्शीद हो, शाम को अंजाम है.....ढलते रहे, उर्मिला माधव... 24.3.2017..

ठहरी रही हैं

एक मतला --दो शेर... --------------------------- जिन दरख्तों की जड़ें,गहरी रही हैं, आँधियों के बाद भी....ठहरी रही हैं, शोर करतीं बिजलियाँ हैं जो उफ़क पर, ख़ुद शजर के साए में बहरी रही हैं, सब्ज़ दुनियाँ में ठुमक जाती हैं अक्सर, जो हवाएं अब तलक शहरी रही हैं.... उर्मिला माधव... 23.3.2016

मीज़ान तो देख

घर कितना वीरान तो देख, क्या-क्या है,सामान तो देख, क्या पैमाना सही ग़लत का, अय दुनियां मीज़ान तो देख, जिस पर बोझा लाद रहा है, उसकी पहले जान तो देख, लिए आईना फिरता है तो, ख़ुद अपना ईमान तो देख, किसे सज़ा दी,किसको बख्शा, भला-बुरा ...इनसान तो देख, फ़िक़्र करे है दुनियां भर की, पहले .....हिंदुस्तान तो देख, उर्मिला माधव, 23.3.2017

नापा करते हैं

उल्टे सीधे राग अलापा करते हैं, हम अपनी तन्हाई नापा करते हैं दबी-दबी एक बर्फ लबों पे जमी हुई, लोग तबस्सुम देखके स्यापा करते हैं, उर्मिला माधव... 22.3.2015

अच्छा है

Tujhko tera ghuruur achha hai, Mera apna fituur achha hai, Koii khwahish nahiN muhabbat kii, Aisa lagta hai, door achha hai Umr guzriI bahot tajariboN me Mujhko itna zuruur achcha hai, Urmila Madhav 22.3.2018

देख के बता

एक मतला दो शेर.... क्या-क्या निहां है मुझमें ज़रा देखके बता, वक़्त-ए-गिराँ है मुझमें ,ज़रा देख के बता पैवंद से ढके हैं,बहुत ज़ख़्म और सुराग, अब भी निशाँ है मुझमें ज़रा देख के बता, उर्मिला माधव, 21.3.2016

अजनबी हो तुम

कैसे शिनाख़्त हो के वही आदमी हो तुम, मैं जानती कहाँ हूँ तुम्हें,अजनबी हो तुम, उर्मिला माधव

ज़माने में बहुत

maine aahon se guzar kii hai zamaane men bahut, phir bhi uljhan hai mujhe bas ghum bataane men bahut, maine har chand hatheli se dhaka palkon ko, dil bhi halkaan hua,ashq chhupaane men bahut, उर्मिला माधव

हुनर पर आ गईं

जब हमारी खूबियां बढ़कर हुनर पर आ गईं, रंजिशें सारे ज़माने की .....उभर कर आ गईं, झूठ में माहिर थे जितने,तह तलक,घबरा गए, बात कहने की अदाएं, बन संवर कर आ गईं, उर्मिला माधव, 21.3.2017

आलम में रहूंगी

आज मैं ......रंगों के मौसम में रहूंगी, आप की दुनियां में बाहम....मैं रहूंगी, क्या गुज़िश्ता रंजिशों को याद रखना, फिर कभी ..जंगों के आलम में रहूंगी.. उर्मिला माधव

घर न मिलेगा

अब भी संभल सको तो संभल जाओ वक़्त है, वरना तुम्हें जहां  में......कोई घर न मिलेगा.... उर्मिला माधव... 20.3.2014....

संगिनी जब

आँधियों के वेग से प्रताड़ित होकर, वृक्ष अपनी डालियाँ कब बांधते हैं, कब स्वयं चिंतित हुआ है, पत्तियों का टूटना देखा है जिसने, फिर हरी कोंपल पनपती हैं वहीँ पर, धैर्य और ममता सतत हों संगिनी जब, #उर्मिलामाधव... 20.3.2015...

संभल पाया नहीं

क्या किया जाता अगर ये दिल संभल पाया नहीं, रूह पर लिख्खा हुआ कुछ भी बदल पाया नहीं, टूट कर ये जिस्म-ओ-जां, लडखडाते रह गए, उसपे फिर ये दर्द -ए-दिल कुछ निकल पाया नहीं, Urmila MadhavMadhav 20.3.2016

अंधेरे उजाले

इन आँखों ने देखे अंधेरे-उजाले, मुझे अब सभी रंग लगते हैं काले, भले चांदनी नूर छलकाए अपना, दिए रु-ब-रु चाहे जितने जला ले, नहीं रंग दूजा कोई अब समझना, मिरी आंख तू चारागर को दिखा ले, ज़माने को देदी खुली जब इजाज़त, चला ले कोई तीर तू भी चला ले, तो अब मैंने रब से भी ये कह दिया है, के तू भी चला जा, न मेरी बला ले, उर्मिला माधव 21.3.2018

मज़ाहिया

दिल पै मत ले यार----- ----------------------- जो चाहो तरकीब निकालो, किसी तरह दिल को बहला लो, अगर कोई कन्या मिल जाए, उसको बातों से फुसला लो, भले शेर चाहे जिसका हो, अपने नाम से उसको डालो, फिर देखो तुम रंग इश्क़ का, जिसको चाहो उसे फंसा लो, जब तक चले चलाओ उसको, फिर दूजा रस्ता अपना लो , नए सिरे से क्रम दोहरा लो, अपनी ढपली आप बजालो... उर्मिला माधव... 19.3.2014...

कर गए

उफ़ ज़िन्दगी के मरहले बीमार कर गए, ऐसा लगा कि ग़म का परस्तार कर गए   दामन में सिर्फ खार हैं.....पैरों में आबले, रस्ता बहुत कठिन था मगर पार कर गए , कुछ आरज़ू थी...कुछ थे इरादे बहुत बड़े , कुछ रास्ते के गम मुझे खुद्दार कर गए , सब लोग क्या कहेंगे......यही डर बहुत रहा, क्या-क्या सुनेंगे हम जो अगर हार कर गए, किसको अज़ीज़ होगी कहो ये अज़ल की राह, हम से ही सिर फिरे हैं...जिगर वार कर गए ...  उर्मिला माधव ... १४.९.२०१३

जुबां तलक

लाते नहीं हैं क़ुफ्र का चर्चा ज़ुबां तलक, मिलता नहीं था यार के दिल का निशां तलक, जज़्ब-ए-जुनूं में पूछते फिरते थे हाल हम, था होश तक नहीं,है मेरी हद कहाँ तलक, वहशत थी चश्म-ए-नम थी,दिल-ए-ख़ाकसार था, जाती ही कब थी मेरी सदा भी वहाँ तलक, ----------------------------------------------------------- laate nahin hain qufr ka charchaa zabaan talak, miltaa nahin thaa yaar ke dil ka nishaan talak, jazb-e-junoon main poochhte phirte the haal ham, thaa hosh tak nahin, hai merii had kahaan talak, vahshat thi chashm-e-nam thii ,dile khaaqsaar tha, jaati nahin thi merii sadaa bhi wahaan talak, उर्मिला माधव... 19.3.2016

आते रहना

श्रद्धांजलि आदरणीय केदार नाथ सर को ... आते रहना, मैंने उसको जाते हुए कहा था, लेकिन वो जा रहा था, नहीं आने के क्रम में आभास तक न होने दिया, बस वो जा रहा था, जाते हुए हाथ हिला रहा था, बुद्धिमान दिखाई देते हुए, समझा रहा था,हमें हम मूर्ख हैं, निरंतर विष पीते हैं, कितनी आशाओं में जीते हैं, यही खेल है करतार का, जीत और हार का, हार गए थे हम,जाने वाले से, वो जो जाते हुए हाथ हिला रहा था, कभी नहीं आने के लिए... उर्मिला माधव 19.3.2018

आते रहना--फ्री वर्स

श्रद्धांजलि आदरणीय केदार नाथ सर को ... आते रहना, मैंने उसको जाते हुए कहा था, लेकिन वो जा रहा था, नहीं आने के क्रम में आभास तक न होने दिया, बस वो जा रहा था, जाते हुए हाथ हिला रहा था, बुद्धिमान दिखाई देते हुए, समझा रहा था,हमें हम मूर्ख हैं, निरंतर विष पीते हैं, कितनी आशाओं में जीते हैं, यही खेल है करतार का, जीत और हार का, हार गए थे हम,जाने वाले से, वो जो जाते हुए हाथ हिला रहा था, कभी नहीं आने के लिए... उर्मिला माधव 19.3.2018

बेसबब

बे-सबब जिस्म पे....कितना इतराओगे, इतनी खुद्दारी लेकर....किधर जाओगे,  जिस्म किसका हुआ...इस जहां में कहो, हम भी मर जायेंगे,तुम भी मर जाओगे, एक रक्क़ासा बोली ये..........गिरते हुए, इब्न-ए-मरियम नहीं जो संभल जाओगे, रूह मरती नहीं.........जिस्म मर जाते हैं, जिस्म से आशिकी करके......पछताओगे, इसका जुगराफिया....जब बिगड़ता है तब, दो क़दम.......साथ इसके न चल पाओगे, उर्मिला माधव... 18.3.2014...

बंदापरवर है तू

तू है बन्दानवाज़ बन्दापरवर है तू, बात रखले मेरी पास-ए-मंज़र है तू, मेरी राहों को थोड़ा तो आसान कर, मैं हूँ मुश्किलज़दा, न सितमग़र है तू, चश्म-ए-गिरया गुज़ारिश में पैवस्त हैं, मैं इक इन्सान हूँ और पयम्बर है तू, तेरी कारीगरी क्या बयाँ कर सकूँ ? मैं लिखावट हूँ बस और सुखनवर है तू, अपने दिल से लगाले इस नाचीज़ को, कर निगाहे क़रम एक सिकन्दर है तू... उर्मिला माधव.. 18.3.2016

भरी हुई थी

दिलों में नफ़रत भरी हुई थी, मैं दुश्मनों से घिरी हुई थी, यही समझने में दिन गए सब, के चोट फिर से हरी हुई थी, जिसे ख़ुशी हम समझ रहे थे, वो जाने कब की मरी हुई थी, नहीं असीरी,मुझे मुआफ़िक, मैं अपनी ज़िद से बरी हुई थी, वो अपनी दुनियां बचा रही हूँ, जो मुश्किलों से मिरी हुई थी, उर्मिला माधव, 18.3.2018

नई हो गई हूं

मैं ख़ुद से गुज़र कर नई हो गई हूं, सो ख़ुद के मुक़ाबिल खड़ी हो गई हूं, मैं इतनी मशक़्क़त से गुज़री हूँ आख़िर मुहब्बत की ख़ुद रौशनी हो गई हूं, ज़माने से लड़ना जो आया है मुझको, तो ये मत समझना बड़ी हो गई हूं, मगर ये भी सच है ग़लतियां बहुत थीं, सो अब थोड़ी-थोड़ी सही हो गई हूं, जो हो पारसा, बढ़ के आगे को आए, मैं गंगा सी पावन नदी हो गई हूं, उर्मिला माधव 18.3.2018

करें हैं

खूब कारोबार लफ़्ज़ों का करें हैं, दूसरों के घर में,जो झाँका करें हैं तीलियां रख्खें हैं मुठ्ठी मैं दबाकर, राख़ में चिंगारियां झोंका करें हैं, कांच की दीवार वाले घर जिन्हों के, वो ही पत्थर रात-दिन फेंका करें हैं, दाग़ दामन में छुपाये डोलते हैं , दूसरों के गम पे जो थूका करें हैं, खोल कर हैं दिल करें छींटाकशी जो, वो ही अपनी बेर को रोका करें हैं  उर्मिला माधव... 17.1.2014...

मशक़्क़त है

ज़ब्त करना भी एक मशक्क़त है, वास्ते दिल के यूँ ही मेहनत है, जाने किससे किधर ये टकराये, आँख उठना भी एक क़यामत है, जो भी ठुकराए उसपै मर जाए, दिल की बेजा हक़ीर हरक़त है, उर्मिला माधव... 17.3.2014

क्या करेंगे

अपनी आंखों में ज़रा भी दम नहीं है, जिस्म गिर के मर गया तो क्या करेंगे, सोचते हैं रु-ब-रु ......जाना है उनके, दिल धड़क के रुक गया तो क्या करेंगे 🤔 उर्मिला माधव 17.3.2018 🤔 17.3.2018

खटकने लगता है

जब रात बहुत बढ़ जाती है,तब दर्द खटकने लगता है, आँखों में नींद के आने का अन्दाज़ भटकने लगता ह, यादों के बिखरे खण्डहर में एक आह सुनाई पड़ती है, दीवार में तेरे साये का कोई अक्स चटकने लगता ह।।    उर्मिला माधव.. 16.3.2013

शैतान पंछी

एक बहुत शैतान पंछी डाल पर, जाने कब आया,गया जाना नहीं, जब उड़ाया हमने उसको डाल से, जम गया आकर वहीं माना नहीं, हंस गया वो ज़ोर से,कहने लगा, आपसे माँगा है क्या खाना,नहीं, आप शायद इसलिए अनजान हैं, सुन सके शायद मेरा गाना,नहीं? मैं यहाँ हूँ जब तलक है दिल मेरा,   चल दिया तो मुड़ यहाँ आना नहीं, उर्मिला माधव... 16.3.2014...

नाम होते हैं

अभी थोड़ी देर पहले मेरे शेर का जवाब ---- अपने अख़लाक पै नज़र ही नहीं  दाग़ लोगों के नाम होते हैं, जो हैं दिल से दिमाग़ से शातिर, उनको झुक के सलाम होते हैं.. इसके बदला भी सिर्फ़ इतना है, सिर्फ़ रिश्ते तमाम होते हैं.... #उर्मिलामाधव... 16.3.2015

तनहा रही है ज़िन्दगी

भीड़ में चलते हुए तनहा रही है ज़िन्दगी, क्या बताएं कब कहाँ,क्या क्या रही है ज़िन्दगी, जाने कितनी मुश्किलों से,रु-ब-होते रहे, थक गए हैं अब क़दम,घबरा रही है ज़िन्दगी, एक मिटटी का दिया तूफ़ान से लड़ता रहा, बेखबर था क़ह्र से टकरा रही है जिन्दगीं, ये कभी ख्वाहिश न थी के भीड़ मेरे साथ हो, क्यूँ भला माज़ी को फिर दोहरा रही है ज़िन्दगी, दो क़दम आगे चले और एड़ियां कटने लगीं, इसके मानी,ज़िन्दगी को खा रही है ज़िन्दगी, भीड़ से तो बच गए अब क़ब्र ऑ तन्हाई है, ज़िंदगी को बे-वफ़ा ठहरा रही है ज़िन्दगी... उर्मिला माधव, 16.3.2016

कसम से

हमको लगता है कि तुम एक चाँद हो, चाँद ही तो दूर रहता है सनम से सच, कसम से, चांदनी आती है मेरे घर के दर तक, तुम कहीं आजाओ तो मर जाएँ धम से सच, कसम से, शर्म की पाजेब पांवों में है मेरे हो सके तो आके तुम मिल जाओ हमसे सच, कसम से, एक दिन दुनियां से हम उठ जायेंगे बस, बाद उसके रोओगे तुम दर्द-ओ-ग़म से सच कसम से, वो तुम्हारे आंसुओं से कम रहेगी, जो सहन में होगी बारिश,खूब,झम से सच कसम से, अब भी तुम आ जाओ अब भी वक़्त है, सांस रुक जायेगी इक दिन एकदम से सच,कसम से, उर्मिला माधव... 16.3.2016

ईद है?

एक मतला एक शेर--- अय मियाँ,पागल हो ? या फिर ईद है ? दुश्मनों से क्यूँ .......तुम्हें उम्मीद है ? तुमने खुशियों में भी की है ताज़ियत, गलतियाँ समझो तुम्हें......ताक़ीद है.... उर्मिला माधव... 4.7.2016 .. ताज़ियत--- मिज़ाज पुरसी  ताक़ीद--- ज़रूरी

आगरे का ताजमहल

आगरे का ताजमहल और मैं बेटी वहां की, और गली कूचे वहां के, कुछ हसीं मंज़र वहां के, दौड़ कर मथुरा कभी तो दौड़ के लखनऊ कभी हाथ में कुछ रेवड़ी, जो ख़ास लखनऊ में बनी हाथ में कंचे लिए बचपन की वो यादें सभी थीं कड़ी ताक़ीद अम्मा की मगर भाती थी मन को प्यार करना सीख लो भाई बहन को कुछ समझ आया नहीं था भोले मन को क्योंकि अम्मा कह रही थीं इसलिए करना था सब कुछ पर लड़कपन वो कुलांचे मारता था, लड़कियों के खेल मुश्किल से ही खेले हाथ में मंजा,पतंगें,भाई का सामान लेकर, दौड़ कर जीने पै चढ़ना बेसबब दीदी से लड़ना सिर्फ़ अपनी ज़िद पै अड़ना और गली के बालकों संग ख़ूब गिल्ली और डंडे दुश्मनी या दोस्ती से कोई मतलब ही कहाँ था जम गए बस खेल देखा, क्या सबब,क्या था कहाँ था दोस्त कुछ थे आगरा के और कुछ थे लखनऊ के जब जहाँ मौक़ा मिला के बस वहीँ खुशियाँ सजालीं पर मेरी एक ख़ास गुईंयां वो मेरी बहना निराली वो अजब सा एक रंग था, हर समय बहना का संग था एक ज़ालिम रस्म है दुनियां की जो शादी कहाती हो गई बहना से दूरी मैं हुई तनहा अधूरी वो बहन जिसकी बिदाई पर बहुत गिरते थे आंसू औरतें सब कह रही थीं कोई बन्नी गाओ धांसू थाप ढोलक की सुना कर हौसला सब दे रहे थे औ...

फ्री वर्स

मैं अपने बिस्तर पे,  तेज़ बुख़ार की नीम बेहोशी,  उस पर भी कानों ने सुना एक शोर, " राम नाम सत्य है " और मन दहल गया  विदेशी मित्र, शब्दों से अनजान, " व्हाट इज़ दिस नॉइज़ "? एक यंत्रवत अवस्था में  उठ कर चलते हुए पांव, सब समझते हुए भी देखने को  पता नहीं क्या देखने को आतुर मन, आंखे, जिज्ञासु हृदय... कौन है, जो चला गया, किसके हृदय में हाहाकार छोड़ गया , किसको दुनियां के कठिन रास्ते एकाकी पार करने होंगे, कौन, ज़रूरत के वक़्त पर भी तन्हा ही रहेगा.. कौन है जो नाहक़ ही बुरा भला सुनेगा अर्थी--- श्मशान में  पुरुष की है, मृत्यु के बाद, पीछे रह जाने वाली, जीते जी, मौत का आवाहन करते हुए मैं  स्तब्ध, मौन, अतीत को समेटते हुए, वापस बिस्तर पर ... उर्मिला माधव

ये मुश्किल

समझ आया तो येआया, मुहब्बत एक मुश्किल है नहीं होजाए तो मुश्किल, कहीं होजाए तो मुश्किल, निकल तो आये हैं घर से, कि हम करलें..मुलाकातें, नहीं हो जाए तो मुश्किल, कहीं हो जाए तो मुश्किल, यही बस एक मुश्किल है, मुहब्बत..कैसे ज़ाहिर हो, नहीं हो जाए तो मुश्किल. कहीं हो जाए तो मुश्किल, उर्मिला माधव ... 15.3.2015

अम्माजी की रचना होली पर

मेरी माँ की रचना होली के ऊपर----    माँ याद आईं :'( ----------------------------------- बनवारी चुन्दरिया पै......डारि गयौ रंग, ऎसी मारी पिचकारी मैं तो देख भई दंग, कैसा नटखट अनोखा है तेरा नन्द लाल, बरजोरी कपोलन.........मले वो गुलाल, मैं तो जाके यशोदा से.....कहूं सारा हाल, बरजो मोहन कूँ,कैसो...बिगरि गयौ ढंग, दीन बन श्याम सुन्दर से..हंस कर कही, ज़रा रुकजा घनश्याम...मैं हूँ भीगी भई, कर पकड़ कर कहे करके...चितवन नई, नहीं जाने दूं आज...होली खेलूँ तेरे संग,  ब्रिज भूषण से लाखों........करीं प्रार्थना, ऐसा ब्रिज में खिलाड़ी......न देखा सुना, रह गयी मौन.......मुंह से न कहते बना, गिरधारी ने आज सखी..खूब किया तंग..... ..........

हज़ार होते हैं

दर्द दिल में .........हज़ार होते हैं, हम ही को .......बार-बार होते हैं, आँख जब-जब भी डबडबाती है, दिलजलों में ........शुमार होते हैं.. तेरा मिलना भी ग़म का वाइस है, हर नफ़स ........तार-तार होते हैं, ख़ुद संभलते हैं,कुछ भी होता हो, दोस्त .......कब ग़म गुसार होते हैं, जब कभी .....ग़म शदीद होता है, हम ही हम ........सोगवार होते हैं.. उर्मिला माधव, 15.3.2017

ग़म अभी हैं

तुमने चाहा हम न हों पर हम अभी हैं, हमने चाहा ग़म न हों पर ग़म अभी हैं, जाने कब से अपनी थी बस इक तमन्ना, अब ये पलकें नम न हों पर नम अभी हैं, इक गुज़ारिश है हमारी धड़कनों की, बस हवाएं कम न हों पर कम अभी हैं... उर्मिला माधव 15.3.2018

तुमने क्या किया

तुमको पसंद हमने किया तुमने क्या किया?? दिल को बुलंद हमने किया तुमने क्या किया?? तनहाइयों में रोया किये.......ज़ार-ज़ार खूब, दिल दर्द मंद हमने किया तुमने क्या किया?? तुमने तवज्जो हम पे किसी तौर जब न की, दिल दस्त-बंद हमने किया तुमने क्या किया ?? उर्मिला माधव ... 14.3.2015

5 ग़ज़लें

--------1---------- हे सदाशिव आपका आभार है, शून्य ही तो सृष्टि का आधार है. कितनी सारी शक्तियां ब्रह्माण्ड की, कुछ निरापद है तो ये संसार है, ह्रास चारित्रिक हुआ मानव का अब, हर किसी मस्तिष्क में व्यभिचार है, जो करोगे,लौट कर मिल जाएगा, अवतरित है और ये साकार है, दिग्भ्रमित होना तो निश्चित है यहाँ, इस तरह संसार का आकार है.... #उर्मिलामाधव... 15.7.2015... ----------------------------------------- -------------------2--------------------- अपनी ख़ुद्दारी के दम पर जी रहे हैं, इस लिए हम ज़ह्र लाखों पी रहे हैं, बारहा होते मुख़ातिब ज़ख्म अक्सर, हम मुसलसल साथ इसके ही रहे हैं. ये अनादारी है आदत के मुताबिक, हम न ज़ाती रंग में तरही रहे हैं, आपसी रिश्ते निभाने के चलन में, यूँ समझ लो एकदम सतही रहे हैं, जब जहाँ धोखा धड़ी का दौर आया, इक निशाने इसके बस हम ही रहे हैं.... #उर्मिलामाधव ... 9.7.2015... ------------------------------------------ -------------------३---------------------- पुराने पन्नों से----- लफ़्ज़ लिखे और टांग दिए दीवारों में, अपनी गिनती रखी नहीं फनकारों में, ख़ुद पढ़ते हैं ख़ुद ही खुश हो जाते हैं, नाम ...

ताक पर

अब यही हालात हैं,तहज़ीब रक्खी ताक पर, रंग में कालक मिलाई और घुमाया चाक पर  दिल में लाखों मैल लेकर,दिल मिलाने आगये, बे-हयाई का चलन है समझें हैं बेबाक पर.... अब वो रंगा-रंग जैसा होलियों का रंग कहाँ, रंग थे होली के गाढ़े,दिल बहुत शफ्फाक,पर .... वो सुरीले फाग के रंग वो मुग़न्नी अब कहाँ, कौन है बाक़ी मुनक़्क़ीद,ख्वाहिशे,मुश्ताक पर, लोग जो जीते थे,ज़ात-ए-किब्रिया के वास्ते, जान दे जाते हैं आख़िर अब हुजूम-ए- शाक पर.... अब जुबां का बंद रखना,वक़्त को दरकार है, तज़किरा करना ही क्या अब,हालत-ए-नापाक पर, इस तरह दामन बचाना,शोहदों के हाथ से रंग तुम लगने न देना,"महजबीं" पोशाक पर #उर्मिला माधव.... 14,3,2016 शाक़--- मुश्किल  मुनक़्क़ीद---कद्रदान  मुश्ताक़-----अभिलाषी,उत्सुक मुग़न्नी----- गायक

ख़ुदा ख़ुदा करके

जिस्म जां रूह सब जुदा करके, सो गए रस्म हम अदा करके, बोझ था, दिल पे कुछ ख़यालों का, नींद टूटी, ख़ुदा-ख़ुदा कर के, उर्मिला माधव

आने दीजिए

फ़र्क़ क्या है,दिल दुखाने दीजिये, ग़म,ख़ुशी,जो भी हो, आने दीजिये, आप जो हैं,बस हमेशा हों वही, उनको अपनी ज़िद निभाने दीजिये, आप अपनी हद में हों महदूद बस, वक़्त को ही आने-जाने दीजिये, ख़ुद पे जो तनक़ीद हो,सुनते रहें, सबको अपना मुंह थकाने दीजिये, मुद्दआ कोई भी हो बस चुप रहें, दूसरों को सर खपाने दीजिये, हो बहुत बर्दाश्त से ज़ियादः अगर, दिल को जबरन मुस्कराने दीजिये... क्यों उलझना,दुश्मनों से रायगाँ ? महफ़िलें उनको सजाने दीजिये, जो बेचारे अक़्ल से मजबूर हैं, उनको अपना मन लगाने दीजिये, उर्मिला माधव...

एक मतला

Hai razamandi hai ki ik mahboob hona chahiye, par usse phir aql se bhi khoob hhona chahiye... Urmila Madhav है रज़ामंदी के इक महबूब होना चाहिए, पर उसे फिर अक़्ल से भी ख़ूब होना चाहिए

करामत नहीं है

चार शेर--- ---------- मुहब्बत किसीसे अगर हो ही जाए , वो बस हादसा है करामत नहीं है , जो दिल आगया ग़र तुम्हारा किसीपे , तो फिर एक दिन भी सलामत नहीं है , अभी तक तो एक घर भी ऐसा न देखा , जहां दिल पे लानत मलामत नहीं है , फकीरी की चादर अगर मुंह पे ढक ली , तो कुछ भी ,गुज़रना क़यामत नहीं है.. '''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''' muhabbat kisise agar ho hii jaaye, wo bas haadsaa hai niyaamat nahin hai, jo dil aagayaa gar tumhaara kisiipe, to phir ek din bhi salaamat nahin hai, abhi tak to ek ghar bhi aisaa na dekhaa, jahaan dil pe laanat,malaamat nahin hai, faqirii ki chaadar agar munh pe dhak lii, to kuchh bhi guzarnaa qayaamat nahin hai.. उर्मिला माधव ... 25.8.2013

नज़्म कोने ऐसे हैं

दिल के कुछ कोने ऐसे हैं, जो बहुत...सलोने जैसे हैं, कुछ यादें बिलकुल ऐसी हैं, अब क्या बतलाऊं कैसी हैं, वो दामन बहुत सजीला था, मेरे अश्कों से.....गीला था, जो रूठ अगर वो गए कभी, लगते उदास तब फूल सभी, सब तार मिलन के टूट गए, अब जीवन भर को रूठ गए, उर्मिला माधव... १३.3.२०१४ ...

मंसूब हो जाएं

हमारी डायरी से---- इबादत से अगरचे हम.....बहुत मंसूब होजाएं, तो लाज़िम है ज़माने की नज़र में ख़ूब हो जाएं, किसी दिल में क़दम रखना भी कार-ए-पुख्ता कारा है, ज़रा नज़र-ए-इनायत हो......कि बस महबूब हो जाएं, हज़ारों जान से कुरबान होने पर भी क्या हासिल, मज़ा तो तब है जब हम .....दर्द के उस्लूब होजाएं, हम अब भी आज भी अपने जिगर में ताब रखते हैं, अगर जो ज़िदपे आजाएं...तो बस मतलूब हो जाएं... उर्मिला माधव 11.12.2013.. उस्लूब--- आचरण मतलूब---प्रेमी ibaadat se agarche hum bahut mansoob ho jaayen, to laazim hai zamaane ki nazar main khoob ho jaayen, kisi dil main qadam rakhna bhi kaar-e-pukhtaa kara hai, zara nazar-e-inaayat ho.......ki bas mahboob ho jaayen, hazaaron jaan se qurbaan hone par bhi kya haasil ?? maza to tab hai jab ham dard ke usloob ho jaayen, hum ab bhi,aaj bhi apne jigar main taab rakhte hain, agar jo zid pe aajaayen to bas.....matloob hojaayen... Urmila Madhav... 11.12.2013..

दिन रात बस

हम निरे अहसास से जूझा किये दिन रात बस, आपने जारी रखे,....अपने मुकम्मल घात बस, अब्र भी कुछ आदतन बस बर्क बरसाया किया, जानो दिल तनहा रहे कुछ था भी तो हालात बस, हम कभी समझे नहीं क्यूँ कर हसद था आपको, तज़किरा करते रहे क्यूँ बात और बेबात बस आप भी जब दोस्ती के नाम पर धब्बा रहे , झूठ सच के बलबले थे गम की थी इफरात बस कम जगह पड़ने लगी तो होगया हलकान दिल, दम-ब-दम बढ़ती रही सैलाब की तादात बस, इन बलाओं से .....कभी बचना हमें आया नहीं, झोंकते ही रह गए हम अपने सब जज़्बात बस, उर्मिला माधव... 13.3.2016 --------------------------------------------------- ham nire ahsaas se joojhaa kiye din raat bas, aapne jaari rakhe apne mukammal ghaat bas, Abr bhi kuchh aadatan bas barq barsaaya kiya, jism-o-jaan tanha rahe,kuchh thaa bhi to haalaat bas, ham kabhi samjhe nahin,kyunkar hasad tha aapko, Tazkiraa karte rahe kyun baat or be-baat bas, aap bhi jab dosti ke naam par dhabba rahe, jhuth sach ke balbale the,gam ki thi ifraat bas, in balaaon se kabhii bachna nahin aaya hamen, jhonkte hii rah gaye ham apne sab jazbaat...

दवा होकर

वो भी मजरूह दिल छुपाया किये, हम भी पहुंचे नहीं दवा हो कर, पिछली गलियों को हमने छोड़ दिया, गर चे गुज़रे भी तो हवा हो कर, उर्मिला माधव  29.1.2018

ज़िंदा बचे हैं

हम कहां ज़िंदा बचे हैं, आपके जाने के बाद,  ग़म का इक हिस्सा बने हैं  आपके जाने के बाद, गर कोई मिल जाये तो  हम मुस्कुरा लेते हैं बस, अश्क का दरया बने हैं  आपके जाने के बाद, उर्मिला माधव

कम बोलते हैं

हम बड़ों के सामने कम बोलते हैं, गर ज़रूरत आए तब हम बोलते हैं, अपनी जानिब से तो हम ख़ामोश हैं, जब अना पर आए, उस दम बोलते हैं उर्मिला माधव

रिसाले देखना

ग़ज़ल--- जब कभी पिछले रिसाले देखना, हंसने वालों के भी छाले  देखना, मुस्कुराहट पर फ़क़त जाना नहीं, हो सके तो आह-ओ-नाले देखना, महफ़िलों औ-क़ह्क़हों के शोर में, आंसुओं वाले......निवाले देखना, कुछ फ़सीलें तो झड़ी होंगी मगर, रंग पर्दों के निराले.........देखना, बिन चरागों के वहीँ मिल जायेंगे, जाके उनके घर के आले देखना.... jab kabhii pichhle risaale.........dekhna, hansne waalon ke bhii chhaale dekhna, muskuraahat par...faqat jaanaa nahiin, ho sake to aah-o-naale naale dekhnaa, mahfilon awe qahqahon ke...shor main, aansuon waale niwaale..........dekhnaa, kuchh faseelen to jhadii hongii magar, rang pardon ke.........niraale dekhnaa, bin charaagon ke wahiin mil jaayenge, jaake unke ghar ke aale.......dekhnaa... उर्मिला माधव.... 12.3.2014... फसील---- दीवार  रिसाले--- पत्रिकाएं  निवाले--- गस्से,या कौर

क्या करूं

दश्त जब हो ही गया मेरा कलेजा क्या करूँ, वहशतें या हसरतें जो भी हैं लेजा, क्या करूँ , दिल हथेली पै रखा और साथ में इक ख़त दिया, कुछ नहीं बाकी बचा है क्यों ये भेजा, क्या करूँ, हर घड़ी हलकान रहना और न सोना रात भर, और जो तनहाई दी थी,वो भी है ,जा क्या करूँ, उर्मिला माधव... 12.3.2015..

कब हुई हमसे

हम अना को न छोड़ पाए कभी, जब भी दुनिया अलग हुई हमसे, हमने पर्दा दुई का रहने दिया, कोई ख़िदमत भी कब हुई हमसे उर्मिला माधव

सयाने हो गए

इस क़दर गम के निशाने होगए, वक़्त से पहले.....सयाने होगए, हम थे,गम था,और थीं तन्हाइयां, इस तरह कितने ज़माने होगये, ऐसा लगता है क़फ़स है रात दिन, किस तरह के आशियाने होगये, उर्मिला माधव .... 11.3.2014...

इज़्ज़त उछाल कर

एक मतला तीन शेर----- ---------- वो जा चुके हैं बज़्म से,इज्ज़त उछाल कर, मैंने भी रख दिया है अभी गम संभाल कर, ख़ुद ही जवाब दूं ये कहाँ फिक्र है मुझे, हालात इसको लायेंगे बाहर निकाल कर  कारीगरी अजब है मगर वक़्त की जनाब, कितनों को इसने पी लिया शीशे में ढाल कर, Wo jaa chuke hain bazm se izzat uchhaal kar, maine bhii rakh diyaa hai abhi gam sanbhaal kar, khud hii jawaab doon ye kahaan fiqr hai mujhe, haalaat isko laayenge ..........baahar nikaal kar, kaariigarii ajab hai magar.......waqt kii janaab, kitnon ko isne pee liyaa shiishe main dhaal kar... उर्मिला माधव.... 11.3.2014...

juda karke

Jism-jaan-rooh sab juda karke, So gaye rasm sab adaa karke, Bojh tha sar pe kuchh khayalo ka, Neend tooti,khuda-khuda karke, Jii chura ke chal diye asbab-e-jism, Thak gaye ham bhi ibteda karke, Bebasi jab meri shadiid huyi Roya dil mujhko,gamzada karke, Waqt-e-rukhsat the khaali hath mire Khush hua mujhko wo gada karke,

ढोती रही

जाने क्या-क्या मैं दर्द ढोती रही, उम्र भर अश्क बार होती रही, ख़ार करते थे बस क़दमबोसी, ख़ून से रह्गुज़र भिगोती रही, आह-ओ-नाले थे,इक धुंआ सा था. जिसमें हसरत ग़ुबार होती रही, जानेअब तक भी कैसे जिंदा हूँ, क्यूंकि मैं ज़ख्म ही संजोती रही, एक छोटा सा ख़ुश्क बादल था, उसकी बारिश में दाग़ धोती रही, मैंने सजदे किये मुहाफ़िज़ को, हाज़िरी दर्ज फिर भी होती रही, किस ज़बां से करूँ मैं शुकराना, राह-ए-ख़ालिक को भूल,सोती रही... उर्मिला माधव... 11.3.2016

कमाल की

मुझको कहाँ है फ़िक़्र किसी देखभाल की, मेरी बला से, होगी, .ये दुनियां कमाल की, मैंने ज़माने भर को दिया,अपने दिल का प्यार मेरे तईं, किसी ने, ख़ुशी ......कब बहाल की ? उर्मिला माधव.. 11.3.2017

फ्री वर्स

भूत को वर्तमान नहीं किया जा सकता, दोहराया जा सकता है अनुकरण इतिहास दोहरा देगा, बंधु, अनुकरण हो, अपनी भावनाओं का, जागृति पैदा हो, जन जीवन निर्मल हो, पुनरावृति उचित नहीं, भूतकाल यदि पीड़ामय है, नीरवता, मन की है, हम स्वयं को छलते हैं, गर्वोक्तियों को जन्म देता है, स्वयम में रहना, भूत को दोहराना नहीं, यदि सुखद नहीं, उर्मिला माधव 11.3.2018

उतर गए होते

इतने ज़्यादः घबराते तो,डर कर गुज़र गए होते, ख़ुद अपनी ही पाक़ नज़र से,कबके उतर गए होते, इसका-उसका हाथ मांगते,कोई राह गुजरने को, इनकारों की साज़िश से हम,कितने बिखर गए होते.. उर्मिला माधव..

डर गया होता

एक मतला दो शेर----- अगर ये वक़्त कभी हम से डर गया होता, ये समझो ज़ोर-ओ-ज़बर ग़म भी मर गया होता, सदा-ए-रंज-ओ अलम, हमसे डर गई होती, बहार-ओ-गुल का चमन रक्स कर गया होता, अगर वफ़ा की नज़र,हमसे मिल गई होती,  पुराना ज़ख्म-ए-जिगर कबका भर गया होता, #उर्मिलामाधव ... 9.3.2015...

बिखर जाऊंगी

तार दिल के न छेड़ो,बिखर जाऊंगी, हादसों से थकी हूँ ....मैं मर जाऊंगी, गो कि जिसने है बख्शी मुहब्बत मुझे नाम उसके .ये अशआर कर जाऊंगी.. अय मुसव्विर मुझे फिर से तैयार कर, कूज़ागर तोड़ कर मुझको फिर से बना, यूँ मैं आधी,अधूरी .....न घर जाऊंगी, तुझसे उम्मीद रखती हूं आक़ा बहुत, तू खरा तो उतर वरना डर जाऊंगी, ज़िन्दगी,मौत .....यकसां हैं मेरे लिए, या इधर जाऊंगी ...या उधर जाऊंगी.. उर्मिला माधव.. 93.2017

अच्छी ख़ासी है

एक ग़ज़ल हाज़िर है ... क्यूँ ये दिल में अजब उदासी है? मुझमें हिम्मत तो अच्छी ख़ासी है, कैसे शिद्दत में कुछ कमी आई ? रूह तो अब तलक भी प्यासी है, ख़ूब लंबी है ज़िन्दगानी भी, लोग कहते हैं ये ज़रा सी है, एक अरसा है,एक लम्हा भी, इसकी बस बानगी हवा सी है, राह क्या देखना मसर्रत की? गो के सदियों से ग़म शनासी है.... उर्मिला माधव। ..... 9 .3 .2017

अच्छी ख़ासी है

एक ग़ज़ल... क्यूँ ये दिल में अजब उदासी है? मुझमें हिम्मत तो अच्छी ख़ासी है, Kyun ye dil me ajab udaasi hai, mujhmeN himmat to achhi khaasi hai, कैसे शिद्दत में कुछ कमी आई ? रूह तो अब तलक भी प्यासी है, Kaise shiddat me kuchh kamii aayi, Ruuh to ab talak bhi pyasi hai, ख़ूब लंबी है ज़िन्दगानी भी, लोग कहते हैं ये ज़रा सी है, Khoob lambi hai zindagani bhii, Log kahte hain ye zaraa sii hai, एक अरसा है,एक लम्हा भी, इसकी बस बानगी हवा सी है, Ek arsaa hai ek lamhaa bhii, Iskii bs baangi hawaa sii hai, राह क्या देखना मसर्रत की? गो के सदियों से ग़म शनासी है.... Raah kya dekhna masarrat kii, Go ki sadiyoN se gum shanaasi haI... उर्मिला माधव। ..... 9 .3 .2018

परस्तार हुए

ऐसी नज़रों के परस्तार हुए, जिस्मों जाँ दोनों तार-तार हुए, आज दिल ये सवाल करता है, बे सबब ऐसे क्यूँ निसार हुए, फूल बन कर क़रीब आए थे, दूर जाके वो कैसे ख़ार हुए, लोग कहते हैं तजुर्बा अक्सर, नादाँ दिल ना किसीके यार हुए।।  उर्मिला माधव.. 6.3.2013

हसरतों के साथ

एक मतला दो शेर--- --------------------- अब बस मुक़ाबला है मेरा हसरतों के साथ, लिखते रहे न भेजे कभी,उन खतों के साथ, खोली दराज़ जब भी नज़र आये वो ही ख़त, रख्खे हुए हैं कब से बड़ी वुसअतों के साथ, जिस आग में जला वो कभी खुश हुए बहुत, ख़ुद भी सुलग रहे हैं,उन्हीं फितरतों के साथ, उर्मिला माधव... 7.3.2014....

ठहर गई

एक मतला..एक शेर जहाँ शाम गुज़री थी हिज्र में,वहीँ रात आके ठहर गई, भला हश्र इसका रहेगा क्या जो उधेड़ बुन में सहर गई, जहाँ पथ्थरों के मज़ार हैं,वहीँ आशिकों के मेयार हैं नहीं कोई अहले दयार हैं,हद-ए-राह तक तो नज़र गई उर्मिला माधव... 6.3.2018

आह कर बैठे

हाए ये क्या गुनाह कर बैठे? ख़ुद ही ख़ुद को तबाह कर बैठे, ज़ब्त से काम ले रहे थे हम, जाने क्यूँ एक आह कर बैठे, भूल कर भूल हो गई हमसे, तेरी चाहत की चाह कर बैठे, किस क़दर हमसे ये गुनाह हुआ, ग़लतियाँ बेहिसाब कर बैठे, कितनी चाहत थी हँसके जीने की, फिरभी मरने की राह कर बैठे, ज़िन्दग़ी दूर-दूर होती गई, मौत से जो सलाह कर बैठे।.... उर्मिला माधव.. 5.3.2013

बात क्या करे

एक मतला दो शेर --- गैरों की मिलकियत पे कोई बात क्या करे, वीरान रहगुज़र पे .......कोई रात क्या करे, सूरज निकल रहे हैं कई सम्त से हज़ार, पर तिश्नगी को लेके मुलाक़ात क्या करे, हमको सरापा आग ने जब ख़ाक कर दिया, ज़ख़्मों की ऐसी शक़्ल का बरसात क्या करे, उर्मिला माधव.. 4.3.2017

खूंखार हूँ

एक मतला तीन शेर---- =============  ज़िन्दगी की तल्खियों से इस क़दर बेज़ार हूँ, मारने-मरने की हद तक पुश्त-ओ-पा खूंखार हूँ, आये महफ़िल में चुकाने,आपसे बाकी हिसाब, आपको ख़ामा-ख़याली है कि मैं ग़म-ख़्वार हूँ, वक़्त वो कुछ और था जब घर हमारा था कहीं, आओ इस्तकबाल है कि अब महज इक दार हूँ, फैसला करने की नौबत है तो फिर क्या देर है,  हूँ मुक़ाबिल आपके शम्स-ओ-क़मर,तैयार हूँ, उर्मिला माधव... 2.3.2014..

डूब कर

दिल को भाया तू जो मेरे तुझमें देखा डूब कर, इतनी कालक थी वहां पर,लौट आये,ऊब कर, तेरी दुनियां तेरे हाथों सौंप कर हम चल दिए, और तुझसे कह दिया जो जी में आये ख़ूब कर.... पीठ करदी तेरी जानिब,ज़ख्म आगे कर लिए, दिल को समझाया अना का रास्ता मंसूब कर, पहले भी तू बेवफ़ा था,आज भी वो शक़्ल है, ये तेरे दिल का शगल है,नित नया महबूब कर, ज़िंदगानी उम्र भर ज़द्दोजेहद का नाम है, साहिबे ईमान हो जा,प्यार को उस्लूब कर...  उर्मिला माधव 2.3.2016

ज़लज़ला क्या है

Tum to kahte the ham nahin rote, Fir ye aankhon me zalzala kya hai? Tumko gairon se kuchh nahin lena, Ab ye bolo ke masalaa kya hai ? Bas ke chalna hai chalte rahte hain,  Ilm ye kab hai, marhalaa kya hai? उर्मिला माधव

कम नहीं है

जो ज़िन्दगी में सलामती है, ये कम नहीं है, के सांस अब तक भी चल रही है,  ये कम नहीं है, हमारा ग़म से विसाल होगा हमारी किसमत, जहां की आंखों में बरहमी है ये कम नहीं है उर्मिला माधव