देखती हूँ मैं तुम्हें
ख़्वाब में नहीं,
देखती हूँ मैं तुम्हें
इन सूखते हुए दरख्तों में,
तुम सुब्ह की धूप से हो,
कुछ बसंती रूप से हो,
इन फ़ज़ाओं में
तुम्हारी खुशबुएँ,बिखरी हुईं हैं,
ज़र्द पत्ते इन दरख्तों की
हदें कहते हुए,
तुम मगर इनमें नहीं हो,
सब्ज़ पत्तों में लिखा है,
रंग तुम्हारा,
तुम हरे परचम से लगते हो मुझे,
ख़ूब हो पर कम से लगते हो मुझे,
इक धुंधलके में भी तुमको देखती हूँ,
तुम सलेटी रंग में लिपटे हुए से,
रात की गहरी सियाही ला रहे हो,
जब सुब्ह होगी तो पत्ते फिर गिरेंगे,
फिर सुब्ह की धूप सा तुमको,
निकलना है यहाँ,
और तुम इक ज़र्द परचम से
लगोगे फिर मुझे,
और फिर इस धूप को देखेगा कौन?
उर्मिला माधव..
1.4.2017
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