हसरतों के साथ

एक मतला दो शेर---
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अब बस मुक़ाबला है मेरा हसरतों के साथ,
लिखते रहे न भेजे कभी,उन खतों के साथ,

खोली दराज़ जब भी नज़र आये वो ही ख़त,
रख्खे हुए हैं कब से बड़ी वुसअतों के साथ,

जिस आग में जला वो कभी खुश हुए बहुत,
ख़ुद भी सुलग रहे हैं,उन्हीं फितरतों के साथ,
उर्मिला माधव...
7.3.2014....

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