मंज़र मुझे
इस क़दर भारी पड़ा, दुनियां का हर मंज़र मुझे,
दश्त सा लगने लगा मेरा ही अपना घर मुझे,
हादसों की हर नफ़स बरपा हुईं सर गर्मियां,
क्या बताऊँ किस क़दर लगने लगा था डर मुझे,
गर ख़ुशी को वक़्त कम था,ग़म भी तो मसरूफ़ थे,
अब बचा इक चैन जो दरकार था ,पल भर मुझे,
यक़-ब-यक़ हंगामा-ए-ग़म, ख़ुद में पिन्हा हो गया,
कर दिया घबराहटों ने बद से भी बदतर मुझे,
उर्मिला माधव।।
17 .8 .2017
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