क्या करते हैं हम

एक मतला दो शेर---
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बे-वज्ह इस जीस्त पे मरके भी क्या करते हैं हम,
मरके जीने के इलावा.......और क्या करते हैं हम ??

चश्म-ए-गिरियाँ,टूटते दिल,और फ़क़त,तन्हाइयां,
दर्द पीने के इलावा..........और क्या करते हैं हम ??

चाक़ दामन,हाल खस्ता........और कुछ पैबंद बस ,
ज़ख्म सीने के इलावा.......और क्या करते हैं हम ??
उर्मिला माधव...
27.3.2014...

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