ठहर गई

एक मतला..एक शेर

जहाँ शाम गुज़री थी हिज्र में,वहीँ रात आके ठहर गई,
भला हश्र इसका रहेगा क्या जो उधेड़ बुन में सहर गई,

जहाँ पथ्थरों के मज़ार हैं,वहीँ आशिकों के मेयार हैं
नहीं कोई अहले दयार हैं,हद-ए-राह तक तो नज़र गई
उर्मिला माधव...
6.3.2018

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