तनहा रही है ज़िन्दगी

भीड़ में चलते हुए तनहा रही है ज़िन्दगी,
क्या बताएं कब कहाँ,क्या क्या रही है ज़िन्दगी,

जाने कितनी मुश्किलों से,रु-ब-होते रहे,
थक गए हैं अब क़दम,घबरा रही है ज़िन्दगी,

एक मिटटी का दिया तूफ़ान से लड़ता रहा,
बेखबर था क़ह्र से टकरा रही है जिन्दगीं,

ये कभी ख्वाहिश न थी के भीड़ मेरे साथ हो,
क्यूँ भला माज़ी को फिर दोहरा रही है ज़िन्दगी,

दो क़दम आगे चले और एड़ियां कटने लगीं,
इसके मानी,ज़िन्दगी को खा रही है ज़िन्दगी,

भीड़ से तो बच गए अब क़ब्र ऑ तन्हाई है,
ज़िंदगी को बे-वफ़ा ठहरा रही है ज़िन्दगी...
उर्मिला माधव,
16.3.2016

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