5 ग़ज़लें

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हे सदाशिव आपका आभार है,
शून्य ही तो सृष्टि का आधार है.

कितनी सारी शक्तियां ब्रह्माण्ड की,
कुछ निरापद है तो ये संसार है,

ह्रास चारित्रिक हुआ मानव का अब,
हर किसी मस्तिष्क में व्यभिचार है,

जो करोगे,लौट कर मिल जाएगा,
अवतरित है और ये साकार है,

दिग्भ्रमित होना तो निश्चित है यहाँ,
इस तरह संसार का आकार है....
#उर्मिलामाधव...
15.7.2015...

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अपनी ख़ुद्दारी के दम पर जी रहे हैं,
इस लिए हम ज़ह्र लाखों पी रहे हैं,

बारहा होते मुख़ातिब ज़ख्म अक्सर,
हम मुसलसल साथ इसके ही रहे हैं.

ये अनादारी है आदत के मुताबिक,
हम न ज़ाती रंग में तरही रहे हैं,

आपसी रिश्ते निभाने के चलन में,
यूँ समझ लो एकदम सतही रहे हैं,

जब जहाँ धोखा धड़ी का दौर आया,
इक निशाने इसके बस हम ही रहे हैं....
#उर्मिलामाधव ...
9.7.2015...
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-------------------३----------------------
पुराने पन्नों से-----

लफ़्ज़ लिखे और टांग दिए दीवारों में,
अपनी गिनती रखी नहीं फनकारों में,

ख़ुद पढ़ते हैं ख़ुद ही खुश हो जाते हैं,
नाम हमारा छपा नहीं अख़बारों में,

हमने अपने दर्द सुनाये क़ातिल को,
रुसवा उसने किया खुले बाज़ारों में,

घर को फूँका और तमाशा देख लिया,
कितना ऊंचा नाम हुआ दिलदारों में,

दिए जला कर रखा किये दीवारों पर,
रस्ता चलते रहे मगर अंधियारों में ,

इतने दानिशमंद कहाँ दुनिया वाले,
वफ़ा ढूंढने निकले हम गद्दारों में,
#उर्मिलामाधव 
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जब याद तुम्हारी आती है तो घर सावन हो जाता है,
स्वर मुखर तुम्हारा होते ही मन वृन्दावन हो जाता है,

क्या ह्रदय वेदना बतलाऊँ,अनुपस्थित रहना ठीक नहीं,
जब मेरे सम्मुख नहीं हो तुम,एक सूनापन हो जाता है,

तुमसे ही दीप्ति ह्रदय की है,तुम मेरे जीवन धन केवल,
आभास तुम्हारा होते ही,घर,घर आँगन हो जाता है ...

छवि मधुर तुम्हारी इतनी है,क्या जानूं कितनी है सीमा,
जब प्रेम सहित वंदन करलूं यह घर पावन हो जाता है...

बस गली-गली मैं घूम सकूँ,मुख चन्द्र तुम्हारा चूम सकूँ,
यह ह्रदय कल्पना करले तो,सब मन भावन ह
नाम--- उर्मिला माधव 
जन्मस्थान--- आगरा 
एम.ए.---संगीत (तबला)
25अक्टूबर...
किताब--- बात अभी बाक़ी है...
द्वारा--- बोधि प्रकाशन....

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