फ्री वर्स
मैं अपने बिस्तर पे,
तेज़ बुख़ार की नीम बेहोशी,
उस पर भी कानों ने सुना एक शोर,
" राम नाम सत्य है "
और मन दहल गया
विदेशी मित्र,
शब्दों से अनजान,
" व्हाट इज़ दिस नॉइज़ "?
एक यंत्रवत अवस्था में
उठ कर चलते हुए पांव,
सब समझते हुए भी देखने को
पता नहीं क्या देखने को आतुर मन, आंखे,
जिज्ञासु हृदय...
कौन है, जो चला गया,
किसके हृदय में हाहाकार छोड़ गया ,
किसको दुनियां के कठिन रास्ते
एकाकी पार करने होंगे,
कौन, ज़रूरत के वक़्त पर भी
तन्हा ही रहेगा..
कौन है जो नाहक़ ही बुरा भला सुनेगा
अर्थी--- श्मशान में
पुरुष की है, मृत्यु के बाद,
पीछे रह जाने वाली,
जीते जी,
मौत का आवाहन करते हुए
मैं
स्तब्ध, मौन,
अतीत को समेटते हुए,
वापस बिस्तर पर ...
उर्मिला माधव
Comments
Post a Comment