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Showing posts from August, 2024

ख़ुदी से दूर ले आए

सिसकती हसरतों के दाग़ कितनी दूर ले आये, रहीं मजबूरियां तारी खुदी से दूर ले आये, उजालों की हक़ीक़त से ज़माना ख़ूब वाकिफ है, लो अब हमने जलाया दिल हवा में नूर ले आये उर्मिला माधव

हम सज़ा की हद में बतलाए गए हैं

हम सज़ा की हद में बतलाये गए हैं ,  और यहाँ तक खींच कर लाये गए हैं , किस सजा के मुस्तहक हम होगये हैं,  जाने क्या-क्या जुर्म बतलाये गए हैं ?? मोहमल इलज़ाम हैं हम मुत्मइन हैं,  दर हकीक़त हम तो झुठलाये गए हैं, उफ़ पस-ए-पर्दा रखे गम छिल रहे हैं  और अदालत में वो दिखलाए गए हैं , इससे बढ़कर और क्या मायूस होंगे , हर तरह बे-ईमान जतलाये गए हैं ... उर्मिला माधव... २९.८.२०१३

ये हमारी ज़िंदगानी और हम

ये हमारी ज़िन्दगानी और हम, उम्र भर ही नातवानी और हम, हम अकेले और इतने !!मरहले, रोज़ इक बनती कहानी और हम, वक़्त लाया बाम पर हम आगये, उफ़ हमारी बे-ज़बानी और हम, बे-अदब जुमले निशाने साध कर, शोहदों की लनतरानी.....और हम.......    ये अजब से हादसे हर ग़ाम पर, आँख जैसे पानी-पानी और हम, उर्मिला माधव... 29.8.2014...

देखा किये

फानी बदायूँनी सा'ब की ज़मीन पर--/ हम बहुत मजबूर होकर दर-ब-दर देखा किये, जाने वाले राह तेरी उम्र भर देखा किये देखते ही देखते हर रंग किस्मत ले उड़ी,  कुछ नहीं था फिर भी जाने क्या उधर देखा किये, है अजब सी दास्ताँ पर सच यही है क्या करें, रौशनी को तीरगी से पुर असर देखा किये दिल कहाँ राज़ी हुआ और ये तड़पता ही रहा, पर बहुत मायूस होकर इक नज़र देखा किये। बदहवासी का वो आलम और कुछ जोशे जुनूँ, किसको इतना होश था,बस बेख़बर देखा किये जाने कितनी मुश्किलों का सामना हमने किया, उम्र भर के हादसों को मुख़्तसर देखा किये, Urmila Madhav.. 29.82016

सिलसिले हो तुम

यक़बारगी तो ग़म हुआ कि क्यों मिले हो तुम, फिर यूँ लगा कि ज़िन्दगी के सिलसिले हो तुम, तूफां में घिर के चल रही थी, उम्रे ना तमाम, बस ऐन उसके तौर ही के इक गिले हो तुम, अच्छे बुरे हो जैसे भी सब ठीक ही तो है, अपनी किसी भी ज़िद से भला कब हिले हो तुम, उर्मिला माधव

आईना देखा बहुत

रात हमने आईना देखा बहुत, और तब अपने तईं सोचा बहुत, इस क़दर हावी हुईं कमज़ोरियाँ ? अपने जी पै तीर,ख़ुद साधा बहुत? पाँव पर है धूप,सर पर आफ़ताब, दिल अबस ही शबनमी,भीगा बहुत, रफ़्ता-रफ़्ता राह भी कट जायेगी, हमसफ़र क्यों बेवज्ह चाहा बहुत? अपनी सारी ख़ूबियों को भूल कर, यार का दर्ज़ा किया ऊंचा बहुत, उसके बिन जीना हुआ मंज़ूर अब, एक दामन जो कभी थामा बहुत, क्या हुआ जो रात भर सोये नहीं, पर सहर में ख़ुद को तो पाया बहुत... #उर्मिलामाधव, 26.8.2015..

हकीकत बबा जू समझनी परैगी

हकीकत बबा जू,समझनी परैगी, मजा की सजा तौ,भुगतनी परैगी, न बैय्यर की इज्जत है मिसरी कौ ढेला, जि गोली कुनैनी,गटकनी परैगी, घड़ी तुमनें बांधी है,सोने की मन भर, तौ लोहेउ की तुमकूँ पहरनी परैगी, बो सोने के बिस्तर,ऑ चांदी के तकिया, न मिलने ऐं, आदत बदलनी परैगी, जुआँ तेरी डाढ़ी में डोलिंगे बाबा, जे दाढ़िउ तौ दारी, कतरनी परैगी, न पहलें उतारौ जे कारौ सौ चश्मा, तौ चश्मा बिगर, गैल चलनी परैगी, जे फंदा लहैं कौ, दहैं ते कटैगौ, जो करनी करी ऐ तौ,भरनी परैगी.. उर्मिला माधव, 26.8.2017

देख लूँ क्या?

इक ज़रासा,रुख़ बदल कर देख लूं क्या, फिर तुम्हारे साथ चल कर देख लूं क्या? आंधियों का ज़ोर तो है मंज़िलों तक, फिर ज़रा गिर कर संम्भल कर देख लूँ क्या? ज़िंदगी का तो चलन हरदम वही है, फिर नए सांचे में ढल कर देख लूँ क्या ? छा गए आ कर अंधेरे रूह पर भी, फिर ज़रा ख़ुद से निकल कर देख लूँ क्या? उर्मिला माधव

किसलिए जज़्बात का सौदा करूँ

किसलिए जज़्बात का सौदा करूँ, झूठ से भी कब तलक बहला करूँ, जो मेरी बुनियाद का हिस्सा नही, उसपे नीयत किस लिए ज़ाया करूँ,   यूँ भी तो तनहा है हर इक आदमी, बे-सबब ही इतना क्यूँ सोचा करूँ, कौन किसका हो सका है उम्र भर, कौन से हक़ से मैं भला दावा करूँ, कोई भी हो,ग़म ही दे कर जाएगा, जानके ग़म किसलिए ओढ़ा करूँ   जब अनल हक़ पै टिकी है ज़िन्दगी, दर-ब-दर फिर किसलिए घूमा करूँ....  उर्मिला माधव ....
तस्वीरें खिंचवाते हैं और लोग खड़े राह जाते हैं, अर्थी के उठ जाते ही सब ख़्वाब पड़े रह जाते हैं, बड़ी-बड़ी दीवारों वाले भीतर-भीतर घुटते हैं कोई क़ीमत नहीं किसी की बड़े-बड़े रह जाते हैं,

ग़म सुनाया है

कभी शेर-ओ-सुखन अपना कभी नगमा सुनाया है, असल में इन तरीकों से ब-मुश्किल ग़म छुपाया है, रखा पास-ए-अदब मैंने,सभी अहबाब की खातिर, कलेजा देख लो मेरा,....नशेमन तक जलाया है, हज़ारों रंग देखे हैं मेरी नज़रों ने घबरा कर, मगर दिल ने मुझे जबरन बहकने से बचाया है... अजब ये दोगली दुनियां,ग़ज़ब है दिल का भोला पन बहुत कुछ फैसले करके ........क़दम पीछे हटाया है... किसीके साथ क्या चलना,मैं तनहा ही भली हूँ बस ये मेरा ख़ास मुस्तक़बिल है .....मैंने ख़ुद बनाया है।।। #उर्मिलामाधव.... 24.8.2015...

आजमाना क्या

छोड़ दो दिल से दिल मिलाना क्या ? अब किसी को भी आज़माना क्या ? जो हुआ उसको ख़ूब होने दो, बेवज्ह अपना दिल दुखाना क्या ? तयशुदा बात ही तो गुजरी है, इसलिए यूँ भी अचकचाना क्या? अपने मुंह से कहो,"मुबारक हो" अश्क आँखों में झिलमिलाना क्या? किस क़दर हादसात झेले हैं, इस तरह आज डगमगाना क्या? उर्मिला माधव..

ग़ैर वाजिब हो उनके घर जाएं

जितनी भरनी हों आँखे भर आयें इतनी ज्यादा कि दरिया कर जायें , चाहे मरने जीने पे बात जा पहुंचे , गैर मुमकिन है उनके घर जाएँ , जितने दावे किये हैं बढ़-बढ़ के , आज साबित वो आके कर जाएँ, हैं परेशान वो अगर मेरी तरहा, घर से निकले तो बस इधर आयें, जो मुहब्बत की रहगुज़र मैं हैं , उनको वाजिब नहीं कि डर जाएँ... !! ............उर्मिला माधव............. २३.८.२०१३

पसे मंज़र नहीं

अब कोई मंज़र पसे मंज़र नहीं, हम फ़क़ीरों का कोई भी घर नहीं, जो मुक़द्दर में लिखा मिल जायगा, बे-सबब हम घूमते दर -दर नहीं, हम जमा करते नहीं है कौड़ियाँ, इक क़फ़न ही चाहिए,बिस्तर नहीं, कर रहे आपस में सब पंजःकशी, ये मिरा है,वो तिरा पत्थर नहीं, इसको अपनी क़ब्र में लगवाएंगे, इससे बढ़कर और कुछ बदतर नहीं, उर्मिला माधव

उसने कल चेहरे को देखा ग़ौर से

एक मतला तीन शेर--- उसने कल चेहरे को देखा ग़ौर से, मुझको हैरत सी हुई इस तौर से, रुख़ पै माज़ी की लिखी है हर लकीर, वक़्त ये गुज़रा है जिस-जिस दौर से, उसको अपना जानके बांटा था ग़म,  कौन कहता है वगरना और से, इससे पहले ये हिले बुनियाद भी, तर्क करना है त-आल्लुक ठौर से... #उर्मिलामाधव... 23.8.2015...

आप कहते हैं ये सच है

आप कहते हैं के ये सच है तो सच ही होगा, सबका लजपाल फ़क़त रब है तो रब ही होगा, लोग कहते हैं ....मेरा क़त्ल सरे महफ़िल हो उसपै होना है अगर अब तो ये अब ही होगा, उर्मिला माधव

मुरदार तो तू भी नहीं

--फ़िल बदीह का हासिल - Main agar mazboot hoon murdaar to tu bhi nahin, Raasta roke mera wo haar to too bhi nahin, Barq aaii thi kabhi girne, dabistaaN ki taraf, Maine hans ke kah diya, gulzaar to tu bhi nahin, Khud ba khud to jal rahi hai,tu sarapa aag hai, Ghar jala kar hans saki,har baar to tu bhi nahin, Muddaton se jal rahe hain ham to sehra ki tarah, Par samandar saA kahin kirdar to tu bhi nahin Bewafai ka abas,ilzaam kyun mere taiiN, Saahib-e-kirdaar saa gham khwaar to tu bhi nahin, ZindagI ko jaa-b-jaa ruswa kare hai kisliye, Sach to ye hai pyar se, bezaar to tu bhi nahin.... Urmila Madhav.. 23.8.2017

देते हैं जवां पहरे

हमारे मुल्क़ की सरहद पे देते हैं जवां पहरे,   लो देखो रात हो आई, हुए सब नींद के तालिब, रहें सरहद से वाबस्ता, हों चाहे मीर या ग़ालिब, खड़े रहते हैं जो पहरों रखे बंदूक कांधों पर, जगे रहते हैं वो नज़रें टिका कर घर की मांदों पर, कई जलसे, कई शादी, कई फंक्शन गुज़रते हैं, बिला शिकवा बिला आहों के इस गुलशन पे मरते हैं, जहान-ए-ज़िन्दगी सबकी बमुश्किल ही गुज़र पाती, किसी भी शख़्स की दुनियाँ, अचानक ही ठहर जाती, दहानों पर खड़े सैनिक ज़बां से गर मुकर जाते, हर इक राखी, दिवाली और होली पे घर जाते, मगर है आफ़रीं उनको, ये दुनियाँ जिनके दम से है, ओ मेरे भाई, मेरे घर के जान- ओ-तन के रखवाले, यहां मैं सर-ब-सजदा हूँ, तुम्हें आदाब करती हूँ, तुम्हारी याद के दम पर ये घर मेहराब करती हूँ, तुम अपने क़ीमती लम्हों से कुछ लम्हे चुरा लाना, ये बहना मुनहसिर तुझ पर, ज़रा इक बार आ जाना, दर-ओ-दीवार तुमको याद करके, मुन्तज़िर हरदम, यहां हर साल इक राखी के धागे हो रहे हैं नम.. तुम्हारी बहन के आंसू जो बहते हैं कहाँ ठहरे, हमारे मुल्क की सरहद पे देते हैं जवां पहरे, हमारे मुल्क़ की सरहद पे देते हैं जवां पहरे, उर्मिला माधव 22.8.2018

दिल सख़्त होना चाहिए

चोट खाने के लिए दिल सख़्त होना चाहिए,  ख़ुद संभलने के लिए कुछ वक़्त होना चाहिए, बात गर कहनी रहे तो हौसला रख्खें ज़रूर, हक़ बुलंदी के लिए बस ख़ब्त होना चाहिए, एक दिन का काम तो ये है नहीं सुनिए जनाब, इस हुनर में बा-अदब बा रफ़्त होना चाहिए, चाल अपनी,ढंग अपना,रंग भी अपना रखें, बद-गुमानी नईं रखें,ये ज़ब्त होना चाहिए, चाहे अनचाहे हज़ारों लानतें मिल जायेंगी, दह्र की नज़रों में बस कमबख्त़ होना चाहिए, उर्मिला माधव...

दामन ए दश्त से बाहर

दामन-ए-दश्त से बाहर क्या निकल पाएंगे, बात इतनी सी है क्या फिर न इधर आएंगे? आते-जाते हुए लोगों को यहाँ देखा बहुत, सोचती हूँ के यहाँ आ के किधर जाएंगे? रूह-ए-ज़िंदान तो रह-रह के सदा देती है, है कशिश दश्त की हर बार फिसल जाएंगे, लाख़ कोशिश हो मगर है ही नहीं,रद्दो बदल, सांसें जितनी भी हैं गिनती की हैं,मर जायेंगे, आबले,ज़ख़्मी जिगर,और न जाने क्या-क्या, ये वो असबाब हैं, घर भर में नज़र आएंगे, अब रही साथ की कोई साथ कहाँ होता है ? देखना सिर्फ़ ये है,कब ये बदल जाएंगे... उर्मिला माधव... 22.8.2016

बड़ी दूर तलक

जिस्म ही बार नज़र आया,बड़ी दूर तलक, के जहां ख़ार नज़र आया ,बड़ी दूर तलक, हर कलेजे को बहुत देर ठहर छान लिया, गर्द-ओ गुब्बार नज़र आया,बड़ी दूर तलक, जो निगाहों से परखने की कभी जुरअत की, सिर्फ अग्यार नज़र आया,बड़ी दूर तलक, ये नहीं था कि समझ कुछ न कभी आया हो, हर तरफ़ दार नज़र आया,बड़ी दूर तलक, एक भी दिल न फरेबों से कभी खाली रहा, झूठा गमख्वार नज़र आया,बड़ी दूर तलक, ख़ुद को सरताज बनाने की बड़ी कोशिश में, बन्दा अय्यार नज़र आया बड़ी दूर तलक, उर्मिला माधव... 21.8.2014... अग्यार--- प्रतिद्वंदी...

कोई रिश्ता निभाना हो

किसीको .घर बुलाना हो, कोई ..रिश्ता निभाना हो, क़दम दिल में जमाना हो, तो दिल में पेच मत रखना.. उर्मिला माधव.. 21.8.2017

मुझको याद आता है

कड़े फिकरे कोई कह कर, चला जाता था जो अक्सर, तग़ाफ़ुल उसकी नज़रों में, कभी देखा था जो मैंने, वो मुझको याद आता है।। ज़मीं जब ज़ख़्म धोती थी, फ़लक़ रह-रह के रोता था , कहीं तन्हाई में जाकर, कोई दामन भिगोता था वो मुझको याद आता है।। कहीं पर माँ बिछुड़ जाना, न ये दुनियां समझ पाना, किसी बच्चे की आँखें थीं कहीं जब मुन्तज़िर माँ की, वो मुझको याद आता है।। कोई मय्यत के आगे बैठकर, रोया नहीं हरगिज़, मगर आरिज़ की सुर्खी, कह रही थी,हाल अश्कों का, वो मुझको याद आता है।। कोई मंज़िल न थी फिर भी, मुसलसल,चल रही थी मैं, निशां क़दमों के दुनियां को, नहीं दिखते थे,जाने क्यूँ, वो मुझको याद आता है।। उर्मिला माधव, 20.4.2016

हर नफ़स फ़ुज़ूल हो गई

इक ज़रा सी भूल हो गई, ज़िन्दगी ही धूल हो गई, फूल सारे झड़ के गिर गए, शाख़-ए-गुल ही शूल हो गई, मश्क़ हमने बे पनाह की, हर नफ़स फ़िज़ूल हो गई, द्वार घर के बंद कर लिए, जब ख़ला उसूल हो गई, हादिसे का रंग क्या कहें, बात-बात तूल हो गई, हम बहुत ही सादा दिल रहे, सादगी, मलूल हो गई, उर्मिला माधव, 21.8.2018

बाहर निकल के देख

आजकल बादल बरसते ही कहाँ हैं, सब्र कर कुछ आगे चल कर देख ले, जो नहीं तुझको यकीं तो ऐसा कर कि  अपने क़दमों पर उछल कर देख ले  ऐसे मौसम मैं हवा किस रंग मैं है, जिद है तो बाहर निकल कर देख ले, उर्मिला माधव ... २०.८.२०१३

तुम याद आ रहे हो मुझे

तुम याद आ रहे हो मुझे कितने साल से, वाकिफ़ कराऊँ कैसे मगर अपने हाल से, तक़दीर में लिखा है फ़क़त मुन्तज़िर रहूं दिन गिन रही हूँ शाम सहर बस मलाल से, उर्मिला माधव

अब नहीं आने के हम

रास्ता बदला है हमने, अब नहीं आने के हम, पहले जाते थे कहीं, पर अब नहीं जाने के हम.. अब जहां की रौशनी से मुत्मइन हर्गिज़ नहीं, क्या सबब है ये ज़ुबाँ तक बस नहीं लाने के हम.. कब से गिनती कर रहे हैं ज़िन्दगी की चढ़ उतर, अब नहीं ख़ाहिश कोई और कुछ नहीं पाने के हम.. अब न कुछ भी फ़र्क़ है, रोने या हंसने का हमें, झूटी कसमों को बिरादर अब नहीं खाने के हम.. इक करीमी ने तुम्हारी अब तलक ज़िंदा रखा, तेरे दर को छोड़ कर भी अब नहीं जाने के हम... उर्मिला माधव

ख़ुद ब ख़ुद

पैदा किया है आलमे तनहाई ख़ुद बख़ुद, देखी है हमने वहशते रुसवाई ख़ुद बख़ुद जो-जो हुआ है वो ही तो होना था दोस्तो, जब ज़िन्दगी के हो गए शैदाई ख़ुद बख़ुद, इक फ़ासले के साथ ही चलने की ज़िद हुई, मशहूर ख़ुद को कर दिया, हरजाई ख़ुद बख़ुद, बेलौस चलते-चलते भी डरने लगे थे हम, धड़कन हज़ार हादिसे ले आई ख़ुद बख़ुद, दानिशवरों की भीड़ का हुज्जूम इक तरफ़, हद-हद से बढ़ के आ गई दानाई ख़ुद बख़ुद, इस उम्र भर की दौड़ का हासिल था एक दिन, महशर के रोज़ बढ़ गई रानाई ख़ुद बख़ुद, उर्मिला माधव 7.12.3018

शरमाते हुए

दम ब दम चलते रहे हम यूं ही घबराते हुए, हर समां देखा किये आते हुए जाते हुए, हमने जाना ही नहीं इक जलवा अफ़रोज़ी का तौर जब कहीं पहुंचे भी तो  बस ठोकरें खाते हुए, हमने हर इल्ज़ाम को सुन कर कभी टाला नहीं, सब हमीं को देखते थे हमको सिखलाते हुए, इक अजब सी कैफ़ियत से रु ब रु होते थे हम, लोग जब जब देखते थे हमको शरमाते हुए हम ज़बानी हर ज़मा ख़र्चे पा क्या करते यक़ीन, झूट सर चढ़ बोलता था, सच को झुठलाते हुए उर्मिला माधव

अना ही अड़ी है जगह जगह

कहते हैं जिसको राह-ए- मुहब्बत कमाल है , इस राह पर अना ही अड़ी है जगह-जगह , हम उँगलियों पै गिन के बता पायेंगे नहीं, बिखरी वफ़ा की लाश पड़ी है जगह-जगह , हम हैं फकीर दिल से हमें कुछ गिला नहीं , इस से भी एक बात बड़ी है जगह-जगह ,  सर को झुकाया ज्यूँही इबादत की शक्ल मैं,  हरदम खुदा की ज़ात खड़ी है जगह-जगह  उर्मिला माधव.. १८.८.२०१३

मुंह को कलेजा आ गया

शबनमी रातों से दिल घबरा गया, और ज़ेहन पर एक कुहासा छा गया, दूरियां हमने मुक़म्मल कर तो लीं, दम-ब-दम मुंह को कलेजा आ गया, Urmila Madhav

बेपरवाहियां

दिल ने लीं अब ओढ़ बे-परवाहियाँ, रूठ जाए रब या रूठे माहियां, वक़्त वो कुछ और था सुनिये ज़रा  जब डराती थीं हमें तन्हाईयाँ, ख़ुद अकेले माद्दा रखते हैं हम, क्या बिगाडेंगी ये अब रुसवाइयां, देख पाए जो न एक बारात तक, वो बजायें आजकल शहनाईयां, जिनकी आधी बात में भी दम नहीं, नापते हैं दिल की वो गहराइयां ..... #उर्मिलामाधव... 18.8.2017..

मक़बरे ख़ाली रहे

जाने कितने मद्फ़नों में मक़बरे ख़ाली रहे, ज़िन्दगी भर हाफ़िज़ों के मश्वरे जाली रहे, देने वाला ज़िन्दगी पर इस तरह हावी रहा,  ज्यों अकेला दह्र में ख़ुद अख़्तरे आली रहे, 18.8.2017

घर है, पर्दे नहीं

घर है  पर्दे नहीं हैं, कालीन से ढका, फर्श नहीं है, एक बड़ा फर्श है , बैठ जाते हैं, सब उसी पर  एक जगह, बातें भी हैं, जाने कहाँ-कहाँ की, रसोई में एक गैस का चूल्हा, जिसपे बन जाती है चाय  पूरे कुनबे की एक ही बार में, चाय के साथ, समोसे नहीं, खाई जाती हैं गप्पें, प्राइवेसी शब्द कोई नहीं जानता, या जानना नहीं चाहता, एक भरपूर सुकून, सब चेहरों पर, खाना बनाती हैं, घर की महिलाऐं,, बांट लिए हैं काम, क्षमताओं के मुताबिक, स्वयम ही, बिना किसी दबाव के, सब अपने कामों को  देते हैं अंजाम, क़ाबिलियत से, कोई नहीं चाहता सोने का  खूबसूरत पिंजरा, खुले आसमान की खूबसूरती दिलों का सुकून, चेहरों की ख़ुशी, एक लम्हा आज़ादी, इससे बढ़कर कैसे हो सकता है, कोई सोने का मक़बरा, चुनने में भूल हो गई, सोने के नाम पर जिसने भी  मक़बरा चुना, उसके साथ चुन ली, एक अंतहीन क़ैद,खामोश आंसू , बहुत कुछ अनकहा सा...... उर्मिला माधव्..... 18.8.2017

कहाँ से सदा दूं?

बड़ी बेखबर हूँ, हक़ीक़त बता दूं, तुझे ज़िन्दगी अब कहाँ से सदा दूँ, चमकती है बिजली सी ख़ामोशियों में, अभी मैं भला कैसे घर को सजा दूँ बहुत उम्र गुज़री अजब तीरगी में, ये जी चाहता है कि दामन जला दूँ, यहां मेरा अंदाज़ सब से जुदा है, तो अंदाज़ तुझको नई क्या हवा दूँ, तबीयत भी अंदर से कहने लगी है जो हैं तीर खंजर वो सारे चला दूँ, कभी मैंने दिल की सुनी ही कहाँ है, जहान-ए-ज़ेहन को कहां तक दगा दूँ, उर्मिला माधव

दामन ए दश्त से बाहर

दामन-ए-दश्त से बाहर क्या निकल पाएंगे, बात इतनी सी है क्या फिर न इधर आएंगे? आते-जाते हुए लोगों को यहाँ देखा बहुत, सोचती हूँ के यहाँ आ के किधर जाएंगे? रूह-ए-ज़िंदान तो रह-रह के सदा देती है, है कशिश दश्त की हर बार फिसल जाएंगे, लाख़ कोशिश हो मगर है ही नहीं,रद्दो बदल, सांसें जितनी भी हैं गिनती की हैं,मर जायेंगे, आबले,ज़ख़्मी जिगर,और न जाने क्या-क्या, ये वो असबाब हैं, घर भर में नज़र आएंगे, अब रही साथ की कोई साथ कहाँ होता है ? देखना सिर्फ़ ये है,कब ये बदल जाएंगे... उर्मिला माधव

प्यार अधूरा लगता है

मेरी एक बहुत पसंदीदा रचना... सखियाँ कहतीं,साजन के बिन प्यार अधूरा लगता है, अम्मां कहतीं काजल बिन....सिंगार अधूरा लगता है, चाहे जितनी बिजली चमके,घर की सभी मुंडेरों पर, बिन बरखा के बादल का...हर वार अधूरा लगता है, हीरे मोती जड़े रहें और धार भी हो.....तलवारों पर, युद्ध वीर के हाथों बिन.....हथियार अधूरा लगता है, भारी भरकम दरवाजों पर.....सजी हुई मेहराबें हैं, बेटी की बारात बिना......हर द्वार अधूरा लगता है, सदियों से कुछ नाम लिखे हैं जगह-जगह दीवारों पर, सत्य सनातन,शिव के बिन विस्तार अधूरा लगता है, उर्मिला माधव... 29.6.2o14...

दुनिया का हर मंज़र मुझे

इस क़दर भारी पड़ा, दुनिया का हर मंज़र मुझे, दश्त सा लगने लगा मेरा ही अपना घर मुझे, हादसों की हर नफ़स बरपा हुईं सर गर्मियां, क्या बताऊँ किस क़दर लगने लगा था डर मुझे, ग़र ख़ुशी को वक़्त कम था ,ग़म भी तो मसरूफ़ थे, अब बचा इक चैन जो दरकार था ,पल भर मुझे, यक़-ब-यक़ हंगामा-ए-ग़म, ख़ुद में पिन्हा कर गया, कर दिया घबराहटों ने बद से भी बदतर मुझे, उर्मिला माधव

बात ज़रा सी

है मिरी आंखों की यही ख़ास उदासी, लोगों को लगा करती है ये बात ज़रा सी, रहने को हम भी रह रहे हैं, ख़ाके जहां में  प ज़िन्दगी जो लगती है  दिन रात सज़ा सी उर्मिला माधव

धसक जाती है

हिलती नहीं धसक जाती है,कितनी रखती है गुंजाइश, रहे सलामत ज़मीं जहां में,यही है बस रब से फरमाइश, कहीं कोई जागीर बसाये,.....कोई सियासी रंग जमाये, हर दिन मकीं लड़ा करते हैं,जगह-जगह करते पैमाइश, गिनती जिनको याद न होगी,आज़ादी के परवानों की, वही ठसक से गिनवा देंगे,अपनी पुश्तों की पैदाइश, मुर्दा दिल क्या ख़ाक लड़ेंगे,वतन परस्ती के जज़्बे से, वतन के शाहिद परवानों की याद नहीं,जिनको आराइश, हिन्द के बच्चे आशुफ़्ता हैं,दुनियांदारी बोझ है इनको, कौन मुहैय्या करवाएगा,इनके दिल को भी आसाइश्... #उर्मिलामाधव

मेरे इन्तज़ाम से

जनाब राहत इन्दौरी जी के शेर पर फिल्बदीह में  लिखे गए अशआर... @@@@ जो मुतमईन नहीं थे मेरे इंतजाम से, चर्चे हज़ार करते रहे.....मेरे नाम से, दिल में चुभन हुई तो मेरा रुख़ बदल गया, मैंने नवाज़ डाला उन्हें ख़ाली जाम से, आखिर मुझे भी हक़ था कहीं ऐसा कुछ करूँ, कुछ तो निजात पाऊं,ज़रा गम की शाम से, कहते थे लोग मुझको बहुत ख़ूब मेजबान, करदीं गुज़ारिशात हर इक ख़ास-ओ-आम से, कैसा ख़ुलूस,कैसा अदब,कैसी इल्तिजा, चिलमन गिराके बचती रही एहतिराम से, अजदाद पुर ख़ुलूस रहे,उम्र भर जनाब, इज्ज़त जुड़ी हुई थी,बहुत इस कयाम से, ग़ैरत कचोटती थी मुझे दिल ही दिल में ख़ूब, शर्मिंदा ज़िंदगी थी बहुत अपने काम से, उर्मिला माधव

गहराइयों की आस है

जा तुझे ऊंचाइयों की प्यास है, और मुझे गहराइयों से आस है, रंग है वीरानियों का आसमां, ये ज़मीं रानाइयों में ख़ास है, ये चमन है और इस का रंग-ए-बू, हाथ में बीनाइयों की रास है, मैं ज़मीं पर हूँ मगर तनहा नहीं, दिल मेरा शहनाइयों के पास है, ख़स,हिना और मश्क़-ए-अम्बर,ख़ूब हैं, इन में कुछ तन्हाइयों की बास है.... ------------------------------------------ jaa tujhe oonchaaiyon kii pyaas hai, or mujhe gahraaiyon se aas hai, rang hai viiraaniyon ka, aasmaan, ye zamiin raanaaiyon main khaas hai, ye chaman hai or iskaa rang-e-boo, haath main beenaaiyon kii raas hai, main zamiin par hun magar tanhaa nahiin, dil mera shahnaaiyon ke paas hai, khas,hinaa or mashq-e-ambar khoob hai, inmain kuchh tanhaaiyon kii baas hain.. उर्मिला माधव...  14.8.2014

पूछ रहे हैं

कितने सारे सवाल पूछ रहे हैं... दोस्त सब मेरा हाल पूछ रहे हैं, पहले तुम अश्कबर न होते थे !! कैसे गुज़रे हैं साल ...पूछ रहे हैं, किसने हालत तुम्हारी ये की है?? किसका वो था जमाल पूछ रहे हैं, हर समय रंजबर क्यूँ लगते हो ?? क्या है मुझको मलाल पूछ रहे हैं?? उर्मिला माधव... 14.8.2013

रूह हिंदुस्तान की

दास्तां हम गा रहे हैं ख़ूब ....हिंदुस्तान की, किसलिए पुर सोज़ है फिर रूह हिंदुस्तान की , हर दरीचे पर लिखी हैं दर्द और दुश्वारियां, ग़म ज़दा क्यूँ हो गई ख़ातून हिंदुस्तान की, यौमे आज़ादी का दिन है कह रहे हैं मरहबा कर गई ग़ारत सभी को फूट हिंदुस्तान की, हिल नहीं सकती कभी बुनियाद इसकी दोस्तों, पायदारी हो अगर मजबूत हिंदुस्तान की, उर्मिला माधव, 14.8.2017

जब वक़्त बदलता हो

जब वक़्त बदलता हो,  कोई साथ न चलता हो, बेजा ये ज़माना है, बस इसको हटाना है ख़्वाबों से परे हट कर, अल्लाह से ज़िद मत कर, ये ख़ाक ज़माना है, इसमें तो न जाना है, बस दर्द इबादत है, हमको यही आदत है, हम छोड़ चुके सब को, बस याद करें रब को, जो फांस चुभी दिल में, अब तक न निकाली है, चेहरों के तमाशे हैं, दुनिया भी तो जाली है, सड़कों पे हैं चौराहे, सो जाए जहां चाहे, उर्मिला माधव

संवारा जाएगा

आख़िरश इस जिस्म को कितना सँवारा जाएगा और कहाँ तक इसको शीशे में उतारा जाएगा इसकी हस्ती कुछ नहीं बस इन्तिहाई ख़ाक है, एक दिन काँधों पै रख कर ये ख़ुदारा'जाएगा' है अगर अहले नज़र,नज़रें झुकाके जलवा देख, ला-मकाँ से इस तरह सबको पुकारा जाएगा... --------उर्मिला माधव--------------------- 13.8.2013

दिल पे दस्तक जो सुबहो शाम दिए जाती हूँ

दिल पै दस्तक जो सुबह शाम दिए जाती हूँ, तेरी नज़रों का एहतराम किये जाती हूँ, तेरे सीने में मेरा दिल भी धड़कता है कहीं, अपनी तक़दीर तेरे नाम किये जाती हूँ, मुझको आता ही नहीं देख नज़ाक़त का चलन, प्यार करना है मेरा काम,किये जाती हूँ, उर्मिला माधव

जाने कैसे मिज़ाज वाले हैं

जाने कैसे मिज़ाज वाले हैं, जिनके होठों पे अब भी ताले हैं, जिसने सेहरा में रौशनी देखी, अपनी किस्मत से वो निराले हैं पूछना अपने घर की बेटी से, कितने अनचाहे ग़म सम्हाले हैं, हव्वा आदम की बेटी रोती है, क्या ये इंसाफ़ करने वाले हैं? जब से जन्मे हैं तब से देखा है, हम "तिरंगे की शान" वाले हैं, मुल्क के रहबरों ये बतलाओ, क्यूँ रिआया के झंडे काले हैं ? क्यूँ रिआया के झंडे काले हैं ?.. #उर्मिलामाधव... 14.8.2015

हाथों से जोड़ते हैं हम ज़िंदगी को ऐसे

हाथों से जोड़ते हैं, हम ज़िन्दगी को ऐसे, रेशम की डोरियों से, रस्सा कशी हो जैसे, ये सोचते थे आख़िर,किस्सा तो ख़त्म होगा, इस मोड़ पे कहानी रुक भी गई, तो कैसे, सीखा है ज़िन्दगी से, ख़ामोशियों में जलना, और ज़िन्दगी धुआं बन, उड़ती रही हो नै से, इक शोर उठ रहा है, रौशन शमअ भी होगी, ऐ रौशनी बताओ, कब की चली हो वैसे? उर्मिला माधव

हस्सास होना चाहिए

दिल मिलाने को भी कोई ख़ास होना चाहिए, मिलने वाला भी ज़रा बिंदास होना चाहिए वो कि जिसको आपने बख़्शी मुहब्बत हर नफ़स उसको भी जज़्बे का कुछ एहसास होना चाहिए, उम्र भर करते रहे जब आप हिफ़्ज़े आबरू आपकी इज़्ज़त का उसको पास होना चाहिए.. पत्थरों की आंख से देखे नहीं जाते हैं दिल, सामने वाले को कुछ हस्सास होना चाहिए कोई कुछ समझे नहीं तो पीठ कर लीजे हुज़ूर, आपका मज़बूत दिल बे आस होना चाहिए... उर्मिला माधव

तलातुम में खड़े हैं हम

तलातुम में खड़े हैं हम, हमें गहराई दिखती है, कहाँ पर बज रही है आपकी शहनाई दिखती है, गुनहगारी का इक सिक्का, उन्हीं के नाम रख्खा है, कि जिन मैली निगाहों को फ़क़त रानाई दिखती है, कभी महफ़िल जमेगी तब ये किस्सा फिर निकालेंगे हर इक दिल को लगेगा अबके शामत आई दिखती है हमें जब नींद आती है तो सब कुछ भूल जाते हैं, कि नीयत होगई है ख़ाब की हरजाई दिखती है. कभी हंसने को जी चाहा, तो जा कर देख लेते हैं कहाँ किस-किसने की है हौसला अफ़ज़ाई दिखती है.. #उर्मिलामाधव

जीते हैं हम

मरते-मरते जीते हैं हम, रोज़ाना ग़म पीते हैं हम. हमदर्दी हम क्यों चाहेंगे, क्या ऐसे गए बीते हैं हम? हार नहीं मानी है हमने, रोज़ लड़े ऑ जीते हैं हम. उर्मिला माधव

हम जो बारिश में कभी

हम जो बारिश में कभी भीग के घर जाते हैं, यक़ता आँखों की चमक देख के डर जाते हैं, आईना देखें नहीं,इतनी क़सम दी खुद को,  लाख़ बचते हैं मगर फिर भी उधर जाते हैं,  हमने लोगों से कभी कोई भी शिकवा न किया, अपनी आहट से मगर, लोग बिखर जाते हैं, हमको अंदाज़ ख़बर इसका कभी हो न सका, किसकी चाहत के कहीं ख़्वाब से मर जाते हैं, ग़म की रफ़्तार तो ठहरेगी नहीं, ज़ाहिर है, चलते-चलते ही कहीं, हम ही ठहर जाते हैं.... #उर्मिला माधव.... 22.2.2015...

बिखर के

कभी कुछ बिखर के,कभी आह भरके  संभाला है ये दिल मुसलसल सिहर के, किसे क्या बताते अजब मुश्किलें थीं, ख़तरनाक दुनिया में गुजरी है डर के, न जाने वो क्या था समझ में न आया, के ये जिंदगानी मिली हमको मर के, मुक़द्दर था यकता ज़माने में अपना, हरे ज़ख्म लेकर फिरे दर-ब-दर के, मेरे आँसुओं से जो दामन था भीगा - चला भी गया दे के असबाब घर के, उर्मिला माधव... 2.10 2014...

खुली बग़ावत है जिंदगी से

खुली बग़ावत है ज़िन्दगी से, मैं धड़कनों से मुकर रही हूं, के अब न भाती हैं सर्द आहें, मैं सब दहानों से डर रही हूं, यूँ रूह कहती है अब तड़प के, हज़ारों सदियों से मर रही हूं, ये जिस्म जैसे लहद हो मेरी, इसी के अंदर बिखर रही हूं, उर्मिला माधव 25.7.2018

आंसुओं के साथ मैंने ज़िंदगी गुज़ार दी

आंसुओं के साथ मैने,ज़िंदग़ी गुज़ार दी, वक़्त की बला उतारी,सोज़े-ए-ग़म पै वार दी, बेबसी ऑ बेकसी में बेख़ुदी का आसरा, जब हुई ज़ियादती तो मग्ज़ से उतार दी.. किसलिए क़ुबूल हों दह्र तेरी नेमतें, कहीं कोई ख़ुशी मिली तो हाथ से बुहार दी, रास्ते बिखर गए तो होंठ अपने सीं लिए पर तड़प के रूह ने सदा भी बार-बार दी यूँ भी तो जिया है इसको बाज़ियों की शक्ल में, ज़िंदग़ी जुआ लगी तो ज़िंदग़ी भी हार दी, उर्मिला माधव...

घर जाऊंगी

तार दिल के न छेड़ो,बिखर जाऊंगी, हादसों से थकी हूँ ....मैं मर जाऊंगी, गो कि जिसने है बख्शी मुहब्बत मुझे नाम उसके .ये अशआर कर जाऊंगी.. अय मुसव्विर मुझे फिर से तैयार कर, यूँ मैं आधी,अधूरी .....न घर जाऊंगी, तुझसे उम्मीद रखती हूं आक़ा बहुत, तू खरा तो उतर वरना डर जाऊंगी, ज़िन्दगी,मौत .....यकसां हैं मेरे लिए, या इधर जाऊंगी ...या उधर जाऊंगी.. उर्मिला माधव.. 93.2017

साहिल नहीं हैं

अपनी क़श्ती के कोई साहिल नहीं हैं फ़िर भी जो दरिया हैं वो हाइल नहीं हैं हमको हिन्दू या मुसलमां मत कहो जी, हम किसी भी ज़ात में शामिल नहीं हैं, नफरतों के बोझ से टूटा है ये दिल, ये हकीक़त है कि हम जाहिल नहीं हैं, हमको तन्हाई गवारा उम्र भर की, हम ज़माने के क़तई क़ाबिल नहीं हैं, अलविदा है चल ज़माने नाप रस्ता , अब तेरी हस्ती पै हम माइल नहीं हैं..... उर्मिला माधव... 10.8.2014

दिल नहीं मिलता, नहीं मिलता

दिल नहीं मिलता,नहीं मिलता किसीसे क्या करें? क्यों ज़रूरी है किसीके सामने सजदा करें, दिल दबाकर गैर से मिलना-मिलाना है अबस, इससे बेहतर ख़ुद का अपना रास्ता ही वा करें, मुख़्तलिफ़ लोगों से मिलके दिल का वो आलम हुआ, ख़ुद-ब-ख़ुद मर जाएँ ख़ुद को रोज़ ही ज़िंदा करें, फ़िक्र क्या, हो जाये ग़र सारा जहाँ अहदे शिकन सब का है अंदाज़ अपना इसपे क्या चर्चा करें, आज़माइश की भी आख़िर हद तो होती है कोई, ख़ैमे बाज़ों के जहाँ में राबिता भी क्या करें, अहले हिम्मत,अहले दिल ज़िंदा हैं अपने ज़र्फ़ से, ख़ुद-ब-खुद चलना है तो क्या बैठ कर सोचा करें, उर्मिला माधव.. 10.8.2017

कारसाज़ों से रहेगी

ख़ास दूरी, दिल नवाज़ों से रहेगी, दोस्ती अब बे-नियाज़ों से रहेगी, लफ़्ज़ ही तो दिल हमेशा तोड़ते हैं, अब मुहब्बत सिर्फ़ साज़ों से रहेगी, सादगी में ज़ुल्म के किस्से बहुत हैं, बरहमी क्या ख़ाक बाज़ों से रहेगी, जो भी हमको चाहिए वो आपसे क्यूं, सारी हसरत कारसाज़ों से रहेगी, ये बुलंदी और ख़ुदी जो भी है यारब, ज़िन्दगी के साथ नाज़ों से रहेगी, उर्मिला माधव

सोचा करें

दिल नहीं मिलता,नहीं मिलता किसीसे क्या करें? क्यों ज़रूरी है किसीके सामने सजदा करें, दिल दबाकर गैर से मिलना-मिलाना है अबस, इससे बेहतर ख़ुद का अपना रास्ता ही वा करें, मुख़्तलिफ़ लोगों से मिलके दिल का वो आलम हुआ, ख़ुद-ब-ख़ुद मर जाएँ ख़ुद को रोज़ ही ज़िंदा करें, फ़िक्र क्या, हो जाये गर सारा जहाँ अहदे शिकन सब का है अंदाज़ अपना इसपे क्या चर्चा करें, आज़माइश की भी आख़िर हद तो होती है कोई, ख़ैमे बाज़ों के जहाँ में राबिता भी क्या करें, अहले हिम्मत,अहले दिल ज़िंदा हैं अपने ज़र्फ़ से, ख़ुद-ब-खुद चलना है तो क्या बैठ कर सोचा करें, उर्मिला माधव..

अनजान हैं

आपसे अब तक वही पहचान है, फिर भी आख़िर हम कहाँ हलकान हैं, हिज्र में हैं और खड़े हैं दश्त में, लोग कहते हैं कि हम वीरान हैं, हमको अब आसानियों का साथ है, सब मगर इस बात से अनजान हैं, उर्मिला माधव

क्यों नहीं रहती

मुझको परवाह क्यों नहीं रहती ? लब पे कोई आह क्यों नहीं रहती? कोई इज़हार-ए-इश्क़ करता रहे, दिल में कोई राह क्यों नहीं रहती ? भाते रहते हैं कितने चेहरे मगर, कोई भी चाह क्यों नहीं रहती? अपनी मर्ज़ी से ख़्वाब बुनती हूँ, हस्ब-ए-इस्लाह क्यों नहीं रहती? हुस्न-ए-मंज़र से भी मुतास्सिर हूँ, ज़ेहन में वाह क्यों नहीं रहती ? सबको है फ़िक़्र दीन-ओ-दुनियां की, मुझको लिल्लाह क्यों नहीं रहती? उर्मिला माधव, हस्बे इस्लाह - सलाह के अनुसार, मुतास्सिर-प्रभावित

बनाई दुनिया

जि चों अचानक बदल रही है अबई तौ तुमने बनाई दुनिया, जिही अनहोंतौ है रंग जाकौ तौ हमकूँ चों जे दिखाई दुनिया, अगर जबर की ही यों चलेगी तौ तुमनें कैसें नचाई दुनिया

जीवन पथ पर चलते चलते

जीवन पथ पर चलते-चलते,पाँव मेरे भर आए हैं, अद्भुत शीतल छाँव देखकर हम तरुवर तर आए हैं, हमने चले बहुत लम्बे पथ और दूर कुछ जाना होगा, करने को विश्राम सहज बस तनिक पाँव फ़ैलाए हैं हरे भरे यदि वृक्ष न होंगे,पथिक कहाँ विश्राम करेंगे, बहुत अधिक क्षति हो जाने से थोड़े वृक्ष ही बच पाये हैं.. उर्मिला माधव.. 3.8.2013..

सामने का पार्क

सामने का पार्क अब ,सुनसान है, घर के बायीं सम्त इक शमशान है, वक़्त की मजलिस लगी है देखलो, इससे बचना ही नहीं आसान है, फ़िक़्र से खारिज़ नज़र,इंसान की, दम-ब-दम मस्ती में है,अनजान है, ख़्वाब के गोशे में जाकर सो लिया, जब सहर देखी,महज़ हैरान है, रोज़े महशर मुन्तज़र है ज़ीस्त का, हर घडी सांसत में सबकी जान है, क्या करीने से सजाये बाम-ओ-दर, दौड़ता फिरता है और हलकान है, वक़्त की ताईद हैं शम्स-ओ-क़मर, एक फ़क़त इंसान, बे-ईमान है..... #उर्मिलामाधव.. 3.8.2015...

एक सहेली--नज़्म

मुस्कुराते लब और आँखें गीली लेकर आ गई, एक सहेली,चार दिन में,इश्क़ से घबरा गई, ज़ोर से हंसती थी और आँखों को पोंछे जा रही, और पिछले चार दिन की दास्ताँ बतला रही, क्या बताऊँ किस तरह वो ,ख़ुद को आक़िल कह गया, और सादा दिल मिरा उस गुफ़्तगू में बह गया, कैसेनोवा दिल से था और ज़ाहिरी सूरत ज़हीन, मुत्मईं था कुछ भी कर सकती है ये शक़्ल-ए-हसीन, लफ्ज़ शीरीं और ख़ुद भी था बहुत शीरीं मिज़ाज, बाद उसके क्या हुआ बस वो मैं बतलाती हूँ आज, धीरे-धीरे घूम फिर कर इश्क़ सा फ़रमा गया, यूं समझ लो अय सहेली मुझको भी भरमा गया, ख़ैर अपनी ज़ात से वो बाज़ आता भी तो क्यों, तोड़ डाला दिल को मेरे,पास आता भी तो क्यों, तब अचानक एक दिन आया मगर तनहा नहीं, दिल परेशां हो गया मैं क्या करूँ और क्या नहीं, बेवफ़ाई देखकर दिल जब बहुत बेबस हुआ, सिर्फ़ हंसती ही रही मैं जितना मेरा बस हुआ, बस वही था आख़री लमहा उसे सोचा था जब, मन को यूँ समझा लिया के वो बता,तेरा था कब, हद से ऊपर हो गया तो सब मिटा कर आ गई, और हुजूमे ग़म से मैं दामन छुड़ा कर आ गई.... उर्मिला माधव, 3.8.2016

सोते नहीं हो क्यों?

क्यों जागते हो रात भर, सोते नहीं हो क्यों, हम सोचते थे साथ तुम होते नहीं हो क्यों, उजलत में ज़िंदगी है मगर पांव थक गए, ग़म पूछते हैं यार तुम रोते नहीं हो क्यों, आंखों ने बन्द कर दिए, ख़ाबों के रास्ते, जो हसरतों के दाग़ थे, धोते नहीं हो क्यों, उर्मिला माधव