दिल नहीं मिलता, नहीं मिलता

दिल नहीं मिलता,नहीं मिलता किसीसे क्या करें?
क्यों ज़रूरी है किसीके सामने सजदा करें,

दिल दबाकर गैर से मिलना-मिलाना है अबस,
इससे बेहतर ख़ुद का अपना रास्ता ही वा करें,

मुख़्तलिफ़ लोगों से मिलके दिल का वो आलम हुआ,
ख़ुद-ब-ख़ुद मर जाएँ ख़ुद को रोज़ ही ज़िंदा करें,

फ़िक्र क्या, हो जाये ग़र सारा जहाँ अहदे शिकन
सब का है अंदाज़ अपना इसपे क्या चर्चा करें,

आज़माइश की भी आख़िर हद तो होती है कोई,
ख़ैमे बाज़ों के जहाँ में राबिता भी क्या करें,

अहले हिम्मत,अहले दिल ज़िंदा हैं अपने ज़र्फ़ से,
ख़ुद-ब-खुद चलना है तो क्या बैठ कर सोचा करें,
उर्मिला माधव..
10.8.2017

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