जीते हैं हम

मरते-मरते जीते हैं हम,
रोज़ाना ग़म पीते हैं हम.

हमदर्दी हम क्यों चाहेंगे,
क्या ऐसे गए बीते हैं हम?

हार नहीं मानी है हमने,
रोज़ लड़े ऑ जीते हैं हम.
उर्मिला माधव

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